धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के आगे की लड़ाई: सीजेपी आंदोलन ने उठाए शिक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल
‘साउथ फर्स्ट’ में अखिलेश कुमार की रिपोर्ट के मुताबिक, जंतर मंतर से शुरू हुए कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन की तेजी, उसका विस्तार और सफलता कई लोगों के लिए अप्रत्याशित रही. व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ यह अभियान जल्द ही नीट विवाद, छात्रों की बेचैनी और देश की शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही के सवालों को उठाने वाला आंदोलन बन गया. रिपोर्ट का तर्क है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा जवाबदेही की दिशा में एक कदम जरूर है, लेकिन छात्रों की लड़ाई किसी एक मंत्री के जाने से खत्म नहीं होती.
सीजेपी की शुरुआत एक व्यंग्यात्मक सवाल, “अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं तो?” से हुई थी. लेकिन इस असामान्य पहचान के पीछे छात्रों का गंभीर सवाल था. वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें पारदर्शिता हो, निष्पक्षता हो और उनकी मेहनत तथा भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो. आंदोलन ने यह भी दिखाया कि लोकतांत्रिक विरोध हमेशा पारंपरिक राजनीतिक दलों और संगठनों के जरिए ही सामने नहीं आता. जब नागरिकों को लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही, तो वे विरोध के नए मंच और नई भाषा तैयार कर सकते हैं.
रिपोर्ट में नीट विवाद को केवल एक परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि छात्रों और शैक्षणिक संस्थाओं के बीच भरोसे का संकट बताया गया है. लाखों युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ दाखिले का जरिया नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य और सामाजिक-आर्थिक बदलाव का रास्ता हैं. छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, परिवार अपनी बचत खर्च करते हैं और कई युवा दूसरे अवसर छोड़कर परीक्षा पर निर्भर हो जाते हैं. ऐसे में परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठना उनके पूरे भविष्य को प्रभावित करता है.
अखिलेश कुमार ने नीट से जुड़ी बहस में तमिलनाडु की 17 वर्षीय छात्रा एस. अनीता को भी याद किया है, जिनकी 2017 में आत्महत्या से मौत के बाद नीट के विरोध और शैक्षणिक समानता की बहस तेज हुई थी. अनीता तमिलनाडु स्टेट बोर्ड से पढ़ी थीं और डॉक्टर बनना चाहती थीं. उनकी कहानी ने यह सवाल सामने रखा कि क्या अलग-अलग बोर्ड, सामाजिक परिस्थितियों और संसाधनों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एक ही परीक्षा में उतार देना वास्तव में समान अवसर कहा जा सकता है.
यही नीट को लेकर केंद्रीय व्यवस्था बनाम भारत की शैक्षणिक विविधता की बहस भी है. राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के समर्थकों का कहना है कि इससे मूल्यांकन का एक समान और पारदर्शी ढांचा मिलता है. दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों के पाठ्यक्रम, भाषाएं और संसाधन अलग हैं. ग्रामीण या सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र और महंगी कोचिंग तथा बेहतर संसाधनों तक पहुंच रखने वाले विद्यार्थी समान परिस्थितियों से परीक्षा कक्ष तक नहीं पहुंचते. ऐसे में सवाल है कि समानता का अर्थ सभी को एक जैसा नियम देना है या सभी को प्रतिस्पर्धा का निष्पक्ष अवसर उपलब्ध कराना.
रिपोर्ट के मुताबिक जंतर मंतर आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीर प्रदर्शनकारियों की व्यक्तिगत कहानियां थीं. कई छात्र वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे और कुछ कई बार परीक्षा दे चुके थे. उनके साथ मौजूद माता-पिता के लिए बच्चों की पढ़ाई में कोचिंग का खर्च, आर्थिक बोझ और वर्षों का भावनात्मक निवेश जुड़ा था. इसलिए प्रदर्शन सिर्फ परीक्षा की तकनीकी खामियों के खिलाफ नहीं था, बल्कि भविष्य को लेकर पैदा हुए अविश्वास की अभिव्यक्ति भी था.
सीजेपी आंदोलन ने डिजिटल लामबंदी को सड़क के आंदोलन में बदलने की क्षमता भी दिखाई. अभिजीत दीपके आंदोलन से जुड़े प्रमुख चेहरों में उभरे. रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे आंदोलनों की ताकत केवल दिखाई देने वाले चेहरों में नहीं, बल्कि उन सैकड़ों स्वयंसेवकों और प्रतिभागियों में होती है जो संगठन, संवाद और निरंतरता बनाए रखते हैं.
भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के छात्रों के समर्थन में आने को भी रिपोर्ट ने सड़क पर उठ रहे सवालों और राजनीतिक संस्थाओं के बीच संवाद की कोशिश के रूप में देखा है. हालांकि आंदोलन की बुनियादी पहचान छात्रों की समस्याओं और परीक्षा व्यवस्था को लेकर उनकी मांगों से जुड़ी रही.
रिपोर्ट पुलिस कार्रवाई के सवाल को भी लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ती है. उसका तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन शांतिपूर्ण सभा और अभिव्यक्ति के नागरिक अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है. शिक्षा में न्याय की मांग कर रहे युवाओं को केवल प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने वाले नागरिकों के रूप में देखा जाना चाहिए.
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी आंदोलन के बाद जवाबदेही का बड़ा राजनीतिक संकेत माना जा सकता है, लेकिन अखिलेश कुमार के मुताबिक असली सवाल व्यवस्था में सुधार का है. परीक्षा प्रणाली में मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, स्वतंत्र निगरानी, प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र और राज्यों तथा शिक्षा से जुड़े पक्षों के साथ व्यापक परामर्श जरूरी है.
इसके साथ ही महंगी कोचिंग पर निर्भरता और सार्वजनिक शिक्षा की असमानताओं को दूर किए बिना परीक्षा में बराबरी का सवाल हल नहीं होगा. छात्रों की मांग केवल व्यक्ति बदलने की नहीं, बल्कि ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनाने की है जिस पर वे भरोसा कर सकें.
सीजेपी का व्यंग्य से आंदोलन तक पहुंचना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने युवा असंतोष को नई भाषा दी. धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस आंदोलन का एक पड़ाव हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता का वास्तविक पैमाना किसी एक इस्तीफे या सरकारी घोषणा से तय नहीं होगा. असली परीक्षा यह होगी कि क्या भारत की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी, समावेशी और जवाबदेह बनती है और क्या भविष्य में छात्रों को उन्हीं विफलताओं का सामना करने से बचाया जा सकता है.
(अखिलेश कुमार जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में पीएचडी रिसर्च स्कॉलर और स्वतंत्र लेखक हैं.)

