पहलगाम में सुरक्षा के लिए आया क्यूआर कोड, सैकड़ों पोनी संचालकों की रोजी-रोटी पर संकट
इल्हाक तांत्रे और उमर फारूक जरगर की रिपोर्ट के मुताबिक, पहलगाम हमले के बाद सुरक्षा मजबूत करने के लिए शुरू की गई क्यूआर कोड आधारित पहचान व्यवस्था सैकड़ों पोनी संचालकों के लिए आजीविका की नई बाधा बन गई है. क्यूआर कोड हासिल करने के लिए पर्यटन विभाग का लाइसेंस, आधार और पुलिस सत्यापन जरूरी है. लेकिन जिन संचालकों के पास लाइसेंस नहीं है, वे क्यूआर कोड नहीं बनवा पा रहे और कई जगहों पर उन्हें काम करने से रोका जा रहा है.
पहलगाम से करीब छह किलोमीटर दूर फ्रिसलान गांव के 34 वर्षीय वकार अहमद लगभग दो दशक से पोनी संचालक हैं. पिछले साल तक वह पर्यटकों को बैसरन, डुनो वैली और कश्मीर वैली ले जाते थे और पर्यटन सीजन में रोजाना 800 से 1,000 रुपये तक कमाते थे. अब कई दिनों में उनकी कमाई सिर्फ 250 रुपये रह जाती है. इसी पेशे से उनकी पत्नी और दो बच्चों का परिवार चलता है.
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद प्रशासन ने 86 पर्यटन स्थलों को बंद कर दिया था. इनमें बैसरन वैली, डुनो वैली, कश्मीर वैली, दयबन, वाटरफॉल साइट और ओल्ड शिकारगाह जैसे रास्ते भी शामिल थे, जिन पर सैकड़ों पोनी संचालकों का रोजगार निर्भर था.
ऑपरेटरों के मुताबिक, हमले से पहले पर्यटन सीजन में उनकी रोजाना कमाई 1,500 से 2,000 रुपये तक होती थी. प्रमुख रास्ते बंद होने के बाद कई लोग सड़क किनारे छोटी सवारी कराने तक सीमित हो गए हैं. पर्यटन वापस लौटने के बावजूद उनका रोजगार पहले जैसा नहीं हुआ है.
हमले के करीब एक साल बाद पुलिस ने पर्यटन सेवा प्रदाताओं के लिए क्यूआर कोड आधारित पहचान व्यवस्था शुरू की. पुलिस का कहना है कि इससे पर्यटक सेवा प्रदाता की पहचान सत्यापित कर सकते हैं और सुरक्षा बेहतर होती है. लेकिन पोनी संचालकों के लिए पहले से मौजूद लाइसेंस व्यवस्था के ऊपर यह एक और अनिवार्य प्रक्रिया बन गई है.
पोनी एसोसिएशन के मुताबिक, पहलगाम में करीब 1,900 पंजीकृत पोनी संचालक और 3,800 पंजीकृत घोड़े हैं, जबकि लगभग 1,500 घोड़े अपंजीकृत हैं. एसोसिएशन का अनुमान है कि 700 से 750 पोनी संचालकों के पास पर्यटन विभाग का लाइसेंस नहीं है और इसलिए उन्हें क्यूआर कोड नहीं मिल सकता. सैकड़ों आवेदन भी लंबित बताए गए हैं.
32 वर्षीय ताबिश भट 14 साल से पोनी संचालक हैं. लाइसेंस और क्यूआर कोड नहीं होने के कारण अब वह कभी-कभार ही काम कर पाते हैं. पांच सदस्यों के परिवार की जिम्मेदारी संभाल रहे ताबिश का सवाल है कि इतने वर्षों तक पहलगाम में काम करने के बावजूद अब उन्हें अपनी पहचान और आजीविका के लिए क्यूआर कोड की जरूरत क्यों पड़ रही है.
क्यूआर व्यवस्था ने निजता की चिंता भी बढ़ाई है. संचालकों का कहना है कि गूगल लेंस जैसे ऐप से कोड स्कैन करने पर नाम, पता, फोन नंबर, आधार से जुड़ी जानकारी और लाइसेंस नंबर जैसी व्यक्तिगत जानकारियां सामने आ सकती हैं. नाम न बताने की शर्त पर एक सरकारी सूचना प्रौद्योगिकी अधिकारी ने भी माना कि ऐसी जानकारियों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना जोखिम पैदा कर सकता है. उनके मुताबिक संवेदनशील डेटा छिपाया जाना चाहिए और पूरी जानकारी केवल अधिकृत लोगों को मिलनी चाहिए.
रोजगार संकट का असर घोड़ों पर भी पड़ा है. पोनी एसोसिएशन के अनुसार, पहलगाम के दो पोनी स्टैंडों पर कभी करीब 5,000 घोड़े थे, जिनमें लगभग 2,000 अब बेचे जा चुके हैं. कई परिवार घोड़ों के चारे और रखरखाव का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं.
पर्यटन विभाग का कहना है कि पर्यावरण और क्षेत्र की वहन क्षमता से जुड़े अध्ययन पूरे होने तक नए लाइसेंस जारी नहीं होंगे. दूसरी तरफ पुलिस क्यूआर व्यवस्था को सुरक्षा और अनधिकृत सेवा प्रदाताओं को रोकने के लिए जरूरी बता रही है.
पहलगाम में पर्यटक लौट रहे हैं, टैक्सियां चल रही हैं और होटल-रेस्तरां फिर आबाद हो रहे हैं. लेकिन वकार जैसे सैकड़ों पोनी संचालकों के लिए पर्यटन की वापसी अभी आजीविका की वापसी नहीं बनी है. उनकी मांग है कि लाइसेंस आवेदन लंबित रहने तक उन्हें काम करने की अनुमति मिले. पहलगाम में सवाल अब यही है कि सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उन लोगों की रोजी-रोटी कैसे बचाई जाए, जिनका जीवन दशकों से पर्यटन पर निर्भर है.
(इल्हाक तांत्रे और उमर फारूक जरगर श्रीनगर स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

