मुकुल केसवन | भाजपा का ‘राजनीतिक खेल’ है एसआईआर
‘द टेलीग्राफ’ में मुकुल केसवन ने लिखा है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया चुनाव आयोग के माध्यम से भाजपा द्वारा अपनी पसंद का मतदाता वर्ग तैयार करने की रणनीति है. हालांकि, 2024 के आम चुनाव में बहुमत खोने, युवाओं के विरोध और आयोग के कामकाज के उजागर होने से यह विवादास्पद चुनावी दांव विफल साबित हो सकता है.
केसवन के मुताबिक, राज्य विधानसभा चुनावों (जैसा कि पश्चिम बंगाल में हुआ) से ठीक पहले भारत निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के माध्यम से बड़े पैमाने पर मतदाताओं का निष्कासन, भारतीय जनता पार्टी के अपनी पसंद का ‘मापदंड-अनुकूल मतदाता वर्ग’ तैयार करने के पुराने लक्ष्य का ही नया चरण है. इससे पहले राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का उद्देश्य भी यही था. एनआरसी के जरिए अपर्याप्त दस्तावेजों वाले भारतीयों को बाहर करना था, जबकि सीएए का काम उन गैर-मुस्लिमों की नागरिकता बहाल करना था जो एनआरसी की प्रक्रिया में ‘सहानुभूतिक क्षति’ का शिकार बने.
हालांकि, एनआरसी बोझिल और धीमा साबित हुआ, तथा 2024 के आम चुनावों में भाजपा द्वारा संसद में पूर्ण बहुमत खो देने से एक नए और अधिक लचीले नागरिक वर्ग के चयन का कार्य और जरूरी हो गया. 2023 में निर्वाचन आयोग के गठन के लिए पारित नए कानून ने चयन समिति में सरकार को दो-तिहाई (2:1) का बहुमत दे दिया, जिसने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. आयोग, जो अब एक 'इनक्विजिशन' (कट्टर जांच संस्था) का रूप ले चुका है, मतदाता सूचियों को अपडेट करने के बहाने सच्चे भारतीयों को प्रमाणित करने और कथित झूठे नागरिकों को बाहर करने का काम कर रहा है.
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में ऋतिका चोपड़ा द्वारा निर्वाचन आयोग के नियम-विरुद्ध आचरण के व्यवस्थित खुलासे से पहले भी यह सर्वविदित था कि पश्चिम बंगाल में पिछले चुनाव में 27 लाख से अधिक मतदाताओं को मताधिकार का प्रयोग करने से रोका गया. उनके नाम पर आपत्तियां स्थानीय निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के बजाय केंद्रीय स्तर पर उत्पन्न की गई थीं. सर्वोच्च न्यायालय भी इसमें एक तरह से सहभागी रहा, जिसने हल्के-फुल्के अंदाज में माना कि सफल अपील वाले मतदाता आगे के चुनावों में वोट डाल सकेंगे. जिन अपीलों का निपटारा हुआ, उनमें से 10 में से 9 को वैध पाया गया. यानी 20 लाख से अधिक मतदाताओं को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के बाहर रखकर एक चुनाव का परिणाम तय कर दिया गया. मौजूदा गति से 37 लाख लंबित मामलों को निपटाने में आयोग को 12 से 13 साल लगेंगे.
इस त्रासदी पर कम जनाक्रोश इसलिए पैदा हुआ क्योंकि पश्चिम बंगाल को एक अस्थिर, घुसपैठ प्रभावित और अप्रत्याशित नेतृत्व वाले राज्य के रूप में देखा गया. देश के संभ्रांत वर्ग में यह भावना थी कि बंगाल को सबक सिखाया जाना जरूरी था. परिणामस्वरूप, असुविधाजनक मतदाताओं के मताधिकार छिनने को भाजपा की जीत के नाटक का मामूली हिस्सा मानकर अनदेखा कर दिया गया.
'इनक्विजिशन' को मौन स्वीकृति देने की समस्या यह है कि जब यह आपके दरवाजे पर आती है, तो कोई रास्ता नहीं बचता. एनडीए सरकार के करीबी अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी खुद को दिल्ली के एसआईआर की चपेट में पाकर आक्रोश जताया था. विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के निष्कासन में तो सुधार हो जाएगा, लेकिन यूपी जैसे बड़े राज्यों को जीतने और अगले आम चुनाव से पहले मतदाता वर्ग का आकार छोटा करने की आवश्यकता को देखते हुए चुनाव आयोग को नियमों को तोड़ने की खुली छूट दे दी गई है.
रणनीति यह लगती है कि बाहर किए गए लोगों का विरोध चुनावी रूप से बेअसर रहेगा क्योंकि वे वोट ही नहीं दे पाएंगे, जबकि आम जनता को इस असुविधा को 'सार्वजनिक जीवन के भव्य शुद्धिकरण' के रूप में स्वीकार करने के लिए राजी किया जा सकता है. जैसे नोटबंदी ने कथित रूप से अर्थव्यवस्था से काले धन को बाहर निकाला, वैसे ही यह एसआईआर रूपी 'समुद्र मंथन' राजनीतिक व्यवस्था से झूठे नागरिकों को बाहर निकालने का वादा करता है.
एसआईआर द्वारा खडा किया गया दस्तावेजी बाधा-दौड़ का रास्ता 'द हंगर गेम्स' जैसा है. डेटाबेस से जुड़े इस तंत्र के कारण मतदाता सूची में नाम न होने का मतलब यह भी है—जैसा गोवा के लोगों ने देखा—कि वे कीमोथेरेपी जैसे आवश्यक इलाज तक से वंचित हो सकते हैं. भाजपा का गणित यह है कि इस सदमे को इस विश्वास में बदला जा सकता है कि देश को घुसपैठियों से मुक्त कराने के लिए यह दर्द झेलना जायज है.
लेकिन नरेंद्र मोदी के लिए समस्या यह है कि जनता की आत्म-पीड़ा की भावना का दोहन करने का उनका यह प्रयास इस बार विफल हो जाएगा. इसके दो कारण हैं: पहला, यह 2024 में उनका पूर्ण बहुमत और स्थायी वर्चस्व समाप्त होने के बाद आया है; और दूसरा, 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेतृत्व में युवाओं के विद्रोह ने उनकी राजनीतिक अजेयता को चुनौती दी है. आयोग द्वारा नए 18 वर्षीय युवाओं को नियमित रूप से सूची में शामिल न करने की अनिच्छा यह दर्शाती है कि युवा अब इस इनक्विजिशन का हिस्सा नहीं बनना चाहते.
ऋतिका चोपड़ा की रिपोर्टिंग ने साबित किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा नियमों का उल्लंघन इतना गंभीर था कि उनके साथी आयुक्तों को भी विरोध करना पड़ा. इस पूरी प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय की कार्यपालिका के प्रति अधीनता और लोकतंत्र की बुनियादी इकाई—वोट के अधिकार—की बलि देने की तत्परता भी उजागर हुई है. अनुमान है कि निष्कासन की मौजूदा दर से एसआईआर भारतीय मतदाता वर्ग को 15 करोड़ (150 मिलियन) तक कम कर सकता है, यानी हर दस में से एक भारतीय मताधिकार से वंचित हो जाएगा.
'एक राष्ट्र, एक चुनाव' के विचार के तहत सरकार सभी चुनावों को एक साथ कराना चाहती है. यदि यह सफल होता है, तो हर स्तर का चुनाव एक ऐसे केंद्रीयकृत सॉफ्टवेयर से नियंत्रित आयोग द्वारा संचालित होगा, जो एक छांटे गए और छोटे किए गए मतदाता वर्ग को ही दर्ज करेगा.
लेकिन मोदी के पास पूर्ण बहुमत नहीं है. जैसा कि असीम अली ने लिखा था, "भाजपा का बहुमत से नीचे गिरना मोदी के अजेयता के प्रभाव को समाप्त कर देगा." आखिरकार वही हुआ. यदि यह चुनावी झटका न लगा होता, तो सीजेपी का सत्याग्रह, मीडिया द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली पर सवाल उठाना और सुप्रीम कोर्ट से जवाबदेही मांगना संभव न होता.
एसआईआर का यह उथल-पुथल भरा रवैया भाजपा की हताशा का परिणाम है. पूर्ण बहुमत के लिए अब केवल मोदी के करिश्मे पर निर्भर न रह पाने के कारण पार्टी किसी भी चीज़ को किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती. अर्थशास्त्री सब्यसाची दास ने भी चेतावनी दी थी कि 2019 का चुनाव मतदाता पंजीकरण और मतदान के स्तर पर हेरफेर से प्रभावित रहा होगा. यह एसआईआर बड़े पैमाने पर मतदाता पंजीकरण का दुस्साहसपूर्ण दमन है. वोट छीनने की धमकी देना चुनाव लड़ने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन यह कोई जीतने वाली रणनीति नहीं है.
(यह मुकुल केसवन के मूल लेख का हिंदी में अनूदित अंश है)

