“लॉरेंस ही कर्म है”: मोदी के भारत का गैंगस्टर जो आइकन बन गया

लॉरेंस बिश्नोई पिछले एक दशक से अधिक समय से उच्च सुरक्षा हिरासत में है. इस दौरान उसका नाम भारत में और कनाडा तक कई हाई-प्रोफ़ाइल हत्याओं से जुड़ा रहा है. उसकी ताक़त, जो अब तक कमज़ोर नहीं हुई दिखती, उसे क्या समझाती है? लॉरेंस की ज़िंदगी पर ‘द गार्डियन’ में प्रकाशित अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट में अतुल देव ने कहा है कि बिश्नोई आज के उस भारत का प्रतीक बन गया है जहाँ कानून के बजाय ताकत की पूजा हो रही है. वह खुद को 'मुख्यधारा' से बाहर रहकर खुश बताता है, और उसके समर्थक उसे एक ऐसे योद्धा के रूप में देखते हैं, जो वह सब हासिल कर रहा है जो वे केवल सपनों में देख सकते हैं. बिश्नोई केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक बदलती हुई सामाजिक मानसिकता का परिणाम है. पेश है अतुल देव की लंबी रिपोर्ट का सारांश:

देव इस कहानी को बिश्नोई के पैतृक गाँव दुतारांवाली पहुँचकर शुरू करते हैं. बिश्नोई का परिवार गाँव के सबसे धनी परिवारों में से एक है, लेकिन वे मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाकर रखते हैं. अतुल के साथ मौजूद 'हैप्पी बिश्नोई' का डर उस प्रभाव को दर्शाता है जो लॉरेंस ने अपने क्षेत्र में पैदा किया है. हैप्पी का सीसीटीवी कैमरों से बचना और 'लॉरेंस के इलाके' से जल्द से जल्द बाहर निकलने की जल्दबाजी यह बताती है कि जेल में होने के बावजूद लॉरेंस का खौफ जमीन पर बरकरार है.

वह लॉरेंस के उदय को भारत की वर्तमान स्थितियों से जोड़कर देखते  हैं. मणिपुर में सांप्रदायिक हिंसा, कश्मीर के हालात, और उत्तर भारत में गौरक्षकों द्वारा की जाने वाली लिंचिंग जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए अतुल की यह रिपोर्ट एक ऐसे भारत की तस्वीर खींचती है, जहाँ 'कानून का शासन' कमजोर पड़ता दिख रहा है. इस माहौल में बिश्नोई जैसे अपराधी उन युवाओं के लिए 'आदर्श' बन गए हैं जो बेरोजगारी और हताशा से जूझ रहे हैं. उनके लिए कानून का पालन करना 'हारने वालों' का काम है, और बिश्नोई की शून्यवादी विचारधारा—"जो मिले उसे झपट लो"—उन्हें आकर्षित करती है.

लॉरेंस बिश्नोई को मुख्यधारा के मीडिया और उसके समर्थकों द्वारा एक 'हिन्दू डॉन' के रूप में पेश किया गया है. उसके शाकाहारी होने, ब्रह्मचर्य का पालन करने और शरीर पर धार्मिक टैटू होने को उसकी 'हिन्दू साख' के रूप में विज्ञापित किया जाता है.

सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने आरोप लगाया कि बिश्नोई गिरोह भारत सरकार के इशारे पर कनाडाई धरती पर सिख अलगाववादियों (जैसे हरदीप सिंह निज्जर) को निशाना बना रहा है. हालांकि भारत ने इन आरोपों को खारिज किया है, लेकिन यह रिपोर्ट संकेत देती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिश्नोई का नाम अब केवल एक स्थानीय अपराधी नहीं, बल्कि एक 'रणनीतिक मोहरे' के रूप में लिया जाने लगा है.

लॉरेंस का नाम एक ब्रिटिश अधिकारी के नाम पर रखा गया था, जो उसके परिवार की ऊंची आकांक्षाओं को दर्शाता है. संपन्न परिवार से आने के कारण उसे बचपन से ही विशेष उपचार मिला. चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात विक्की मिड्दुखेड़ा से हुई, जिसने उसे छात्र राजनीति के रास्ते अपराध की दुनिया में धकेला. चंडीगढ़ जैसे आधुनिक शहर में अपनी पहचान बनाने की छटपटाहट ने उसे हिंसा के रास्ते पर डाल दिया. 2014 से वह जेल में है, लेकिन वहीं से अपना साम्राज्य चला रहा है.

बिश्नोई समुदाय के लिए वन्यजीव और पर्यावरण पवित्र हैं. 1998 के काले हिरण शिकार मामले में सलमान खान के शामिल होने को लॉरेंस ने अपने पूरे समुदाय का अपमान माना. उसने कसम खाई है कि जब तक सलमान खान बिश्नोई मंदिर में जाकर माफी नहीं मांगते, वह उनका पीछा नहीं छोड़ेगा. बाबा सिद्दीकी की हत्या और सलमान के घर के बाहर गोलीबारी इसी प्रतिशोध की कड़ी के रूप में देखी जाती है. लॉरेंस के लिए यह केवल अपराध नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक बदला' है.

अतुल जब बिश्नोई के समर्थकों और वकीलों से मिलते हैं, तो एक अलग ही पक्ष सामने आता है. कुछ लोग उसे अपराधी नहीं बल्कि 'कर्म' का अवतार मानते हैं—एक ऐसा व्यक्ति जो उन लोगों को सजा दे रहा है जो उनके अनुसार गद्दार या भ्रष्ट हैं.

दूसरी ओर, जयपुर के युवाओं के साथ लेखक की बातचीत यह उजागर करती है कि बिश्नोई की लोकप्रियता का असली कारण 'ताक़त की भूख' है. चमकते हुए मॉल और लग्जरी कारों के बीच रहने वाले लेकिन उन्हें हासिल न कर पाने वाले बेरोजगार युवाओं के लिए लॉरेंस एक ऐसा व्यक्ति है जिसने व्यवस्था को चुनौती दी है. वे उसकी हिंसा में अपनी हताशा का समाधान देखते हैं.

अतुल के अनुसार, “किसी भी प्रमाणित जानकारी के अभाव में, बिश्नोई उन कहानियों और मिथकों में सबसे अधिक जीवंत है जो उसके चारों ओर बुने गए हैं. जब मैं दिल्ली के एक आलीशान इलाके में उसके वकील से मिलने गया, तो मैंने देखा कि अदालतों की छुट्टी के बाद वकील दफ्तर के बाहर बैठे चाय पी रहे थे. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं लॉरेंस बिश्नोई पर एक कहानी लिख रहा हूँ, तो वे मुस्कुराए. उनमें से सबसे अच्छे कपड़े पहने एक वकील ने कहा, "आपको उसके बारे में यह लिखना चाहिए: उसने कुछ भी गलत नहीं किया है. जिन लोगों को मारने का उस पर आरोप है, वे किसी न किसी तरह इसी के लायक थे." उसने विस्तार से बताया: "मूसेवाला, एक जाना-माना गैंगस्टर जिसे सिर्फ औरतें और तेज कारें पसंद थीं; बाबा सिद्दीकी, एक भ्रष्ट राजनेता; सलमान खान, उनके बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा; और खालिस्तानी (जो पंजाब से अलग सिख राज्य की मांग कर रहे हैं), जो गद्दार हैं." उसने मेरी ओर घूरते हुए कहा: "समझे? लॉरेंस कोई गैंगस्टर नहीं है. लॉरेंस 'कर्म' है." उसने बिश्नोई को हिंदू नैतिकता के एक ऐसे दैवीय दूत के रूप में पेश किया जो यह सुनिश्चित करता है कि हर किसी को उसके किए का फल मिले.

Previous
Previous

बंगाल: मछली और झींगा भी मुद्दा; डेल्टा क्षेत्र के बड़े दांव वाले चुनाव में जीविका और वफादारी का असर

Next
Next

‘मर्ज़ लाइलाज है, पूरा भारतीय समाज राघव चड्ढा है’