आकार पटेल: खोखला गठबंधन

पिछले हफ़्ते, 17 जून को, यह ख़बर आई थी कि 'अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर वापस पैसिफिक कमांड कर दिया है.' इस ख़बर की घोषणा अमेरिका के युद्ध विभाग द्वारा कश्मीर के एक ग़लत नक़्शे के साथ की गई थी. उसी दिन, अमेरिका के

राष्ट्रपति ने फ़्रांस में हमारे प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की और कहा कि मोदी 'एक बहुत ही सख़्त वार्ताकार हैं... आप इस आदमी को देखिए. वह सबसे ख़ूबसूरत दिखने वाले इंसान हैं. वह बहुत अच्छे दिखते हैं, बिल्कुल एक फ़रिश्ते की तरह. लेकिन असल में, वह एक क़ातिल (किलर) जितने ही सख़्त हैं... लेकिन वह इतने अच्छे दिखते हैं. इसलिए वह आपको हैरत में डाल देते हैं. ऐसे लोग बहुत कम होते हैं.'

17 जून की ये दोनों कहानियाँ कुछ हद तक आपस में जुड़ी हुई हैं. आइए देखते हैं कैसे.

फ़रवरी 2018 में, डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान, अमेरिका ने उस क्षेत्र के लिए अपनी रणनीति लिखी जिसे उसने इंडो-पैसिफिक कहना शुरू किया था. इसका उद्देश्य 'अमेरिकी रणनीतिक प्रधानता को बनाए रखना ... और साथ ही चीन को प्रभाव के नए, अनुदारवादी क्षेत्र स्थापित करने से रोकना' था. अमेरिकी चाहते थे कि भारत 'चीन के लिए एक प्रतिसंतुलन के रूप में काम करे'. अमेरिका जिस 'वांछित अंतिम स्थिति' की तलाश में था, वह 'सुरक्षा के मुद्दों पर भारत का पसंदीदा भागीदार' बनना था, और यह कि 'दोनों समुद्री सुरक्षा को बनाए रखने तथा चीन के प्रभाव का मुक़ाबला करने के लिए सहयोग करें'. कुछ पन्नों में, अमेरिका ने यह योजना पेश की है कि वह कैसे भारत को एक 'प्रमुख रक्षा भागीदार' बनाएगा और कैसे 'एक मज़बूत भारतीय सेना संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ प्रभावी ढंग से सहयोग करेगी'.

दस्तावेज़ में यह भी बताया गया है कि चीन के साथ क्या करने का इरादा है: उसे 'अमेरिकी प्रतिस्पर्धात्मकता को नुक़सान पहुँचाने' से रोकना और 'चीन को सैन्य तथा रणनीतिक क्षमताएँ हासिल करने से रोकना'.

भारत इसके लिए हस्ताक्षर क्यों कर रहा था? यह अज्ञात है.

संसद में बिना किसी चर्चा के, मीडिया को कोई इंटरव्यू और कोई प्रेस कॉन्फ़्रेंस दिए बिना, अपने घोषणापत्रों में इसका कोई ज़िक्र किए बिना, मोदी भारत को चीन के ख़िलाफ़ृ अमेरिका के साथ एक रणनीतिक साझेदारी और सैन्य गठबंधन में ले गए. फ़रवरी 2020 में, डोनाल्ड ट्रंप की भारत की प्रसिद्ध यात्रा के दौरान और लद्दाख संकट शुरू होने से कुछ दिन पहले, मोदी ने भारत को इस समझौते के लिए प्रतिबद्ध किया जो मूल रूप से चीन के ख़िलाफ़ था और इसे लागू करना शुरू कर दिया.

27 अक्टूबर 2020 को, अमेरिकी रक्षा सचिव माइक पोम्पिओ की यात्रा के दौरान, भारत ने बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA) पर हस्ताक्षर किए. यह भारतीय सेना की मिसाइलों और सशस्त्र ड्रोनों की सटीकता में सुधार करने के लिए भारत को अमेरिकी ख़ुफ़िया जानकारी तक पहुँचने में मदद करेगा.

हस्ताक्षरित एक अन्य समझौता लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट (LEMOA) था. इसने दोनों देशों की सेनाओं को एक-दूसरे के ठिकानों से अपनी आपूर्ति फिर से भरने, और एक-दूसरे की ज़मीनी सुविधाओं, हवाई अड्डों और बंदरगाहों से आपूर्ति, स्पेयर पार्ट्स और सेवाओं तक पहुँचने की अनुमति दी.

दिल्ली में BECA समझौते पर हस्ताक्षर करते हुए, पोम्पिओ ने सीधे तौर पर चीन पर हमला किया: 'मुझे यह कहते हुए ख़ुशी हो रही है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा उत्पन्न ख़तरों, बल्कि सभी प्रकार के ख़तरों के ख़िलाफ़ सहयोग को मज़बूत करने के लिए क़दम उठा रहे हैं.' सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट माइक एस्पर ने कहा: 'हम सभी के लिए एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक के समर्थन में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं, ख़ासकर चीन की बढ़ती आक्रामकता और अस्थिर करने वाली गतिविधियों के मद्देनज़र.'

राजनाथ सिंह और जयशंकर, जो पोम्पिओ और एस्पर के बग़ल में खड़े थे, उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया. राजनाथ सिंह की तैयार की गई टिप्पणियों (जिन्हें बाद में बदल दिया गया था) में इस पंक्ति का संदर्भ था, जिसे बाद में हटा दिया गया: 'महामहिम, रक्षा के क्षेत्र में हमें हमारी उत्तरी सीमाओं पर लापरवाह आक्रामकता से चुनौती मिल रही है.' सामान्य अक्षमता का प्रदर्शन करते हुए, यह बदलाव अंग्रेज़ी में भारतीय अनुवादक को नहीं दिया गया था, जिसने मूल पाठ पढ़ दिया और अमेरिकियों ने इसे जारी कर दिया.

जब तीन महीने बाद अमेरिका की रणनीति के इस क्लासीफाइड दस्तावेज़ को सार्वजनिक किया गया था, तो चीन ने कहा कि 'इसकी सामग्री केवल चीन को दबाने और नियंत्रित करने तथा क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कमज़ोर करने के लिए अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति का उपयोग करने के संयुक्त राज्य अमेरिका के दुर्भावनापूर्ण इरादे को उजागर करने का काम करती है'. और यह कि 'अमेरिकी पक्ष गुटबाज़ी करने, छोटे गुट बनाने और फूट डालने जैसे नीच तरीक़ों का सहारा लेने का आदी हो गया है, जिसने क्षेत्रीय शांति, स्थिरता, एकजुटता और सहयोग को कमज़ोर करने वाले एक उपद्रवी के रूप में इसके असली चेहरे को पूरी तरह से बेनक़ाब कर दिया है'. भारत ने दस्तावेज़ जारी होने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति लिखे जाने के कुछ हफ़्तों बाद हस्ताक्षरित एक अन्य समझौता कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (COMCASA) था. इसने भारत को एन्क्रिप्टेड संचार उपकरणों और प्रणालियों तक पहुँच की अनुमति दी ताकि भारतीय और अमेरिकी सैन्य कमांडर, और दोनों देशों के विमान तथा जहाज़ सुरक्षित नेटवर्क के माध्यम से संवाद कर सकें. BECA, LEMOA और COMCASA ने दोनों देशों के बीच गहरे सैन्य सहयोग के लिए 'बुनियादी समझौतों' की एक तिकड़ी को पूरा किया.

COMCASA पर सितंबर 2018 में हस्ताक्षर किए गए थे, मोदी द्वारा शी से मिलने के लिए वुहान की यात्रा करने के पाँच महीने बाद. वहाँ उन्होंने 28 अप्रैल 2018 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, कि भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं होंगे बल्कि एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगे. वे 'द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को आगे बढ़ाएँगे'.

समस्या, जो किसी के लिए भी स्पष्ट थी, वह यह थी कि, चाहे वह इसे पूरी तरह से समझते हों या नहीं, मोदी शिकारी कुत्तों के साथ शिकार भी कर रहे थे और खरगोशों के साथ भाग भी रहे थे (यानी एक ही समय में दोनों पक्षों को साध रहे थे). उसी समय जब वह शी के साथ हाथ मिला रहे थे, मोदी चीन को नियंत्रित करने की ट्रंप की इंडो-पैसिफिक रणनीति की ओर भी आँख मार रहे थे. शी की सोची-समझी प्रतिक्रिया लद्दाख सीमा को सक्रिय करने की थी ताकि भारत का सैन्य ध्यान और संसाधन ज़मीन पर रहें, न कि समुद्र पर. हमने पिछले छह वर्षों में इसके प्रभाव देखे हैं, एक ऐसी सीमा के साथ जो तनावपूर्ण और सैन्यीकृत बनी हुई है और एक ऐसा व्यापार संतुलन जो पूरी तरह से चीन के पक्ष में है जिसे हम अपने प्रयासों के बावजूद ठीक नहीं कर सकते हैं.

अपने दूसरे कार्यकाल में, ट्रंप ने अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति में दिलचस्पी खो दी. नाम हटाने की घोषणा करने वाली सुर्ख़ी केवल इसका अंतिम, प्रतीकात्मक अंत थी. सवाल यह है: इस अगंभीर साहसिक कार्य के लिए हस्ताक्षर करने से हमें क्या हासिल हुआ जो इतना महँगा था? इसका जवाब, यक़ीनन, 17 जून की दूसरी कहानी है: हमारी पीठ पर थपकी दी गई और हमारी तारीफ़ की गई.

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