दो हफ्तों के अंतराल पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी के दो प्रदर्शनों में दिखे अभिजीत दिपके के दो अलग रूप

नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले दो हफ्तों के भीतर हुए दो प्रदर्शनों ने अभिजीत दिपके की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रखी हैं. ताजा प्रदर्शन में दिपके ज्यादातर समय अस्थायी मंच पर बैठे दिखाई दिए. 24 घंटे से अधिक समय तक चले धरने की थकान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी. जब प्रदर्शन शुरू हुआ था तब वह लगातार खड़े होकर नारे लगा रहे थे, गीत गा रहे थे और मीडिया से बात कर रहे थे. लेकिन एक चीज नहीं बदली थी. प्रदर्शन जारी रखने का उनका संकल्प.

‘डेबायन दत्ता’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दो हफ्ते पहले इसी जंतर-मंतर पर हुए पहले प्रदर्शन में दिपके का रवैया अलग था. उस समय उन्हें मंच छोड़कर वापस जाते हुए देखा गया था. बाद में समर्थकों और आयोजकों ने उन्हें लौटकर आंदोलन जारी रखने के लिए मनाया था. इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. दिपके लगातार मंच पर बने रहे और प्रदर्शन स्थल छोड़ने से इनकार करते रहे.

दिपके का कहना था कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा. उन्होंने यह भी कहा कि यदि दिल्ली पुलिस उन्हें किसी दूसरे स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति देती है तो वह वहां जाने को तैयार हैं, लेकिन आंदोलन नहीं छोड़ेंगे.

दो हफ्तों के भीतर दिपके में आया बदलाव केवल उनके बयानों में नहीं बल्कि भीड़ को संभालने के तरीके में भी दिखाई दिया. पहले प्रदर्शन के बाद उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में कई विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने समर्थकों को अपने साथ जोड़े रखने और भीड़ के बीच ऊर्जा बनाए रखने की कला सीखी. जंतर-मंतर पर इसका असर साफ दिखाई दिया.

इस बार उन्होंने अपने समर्थकों के एक हिस्से को प्रदर्शन जारी रखने के लिए तैयार कर लिया. जबकि प्रदर्शन की अनुमति समाप्त हो चुकी थी, पुलिस की भारी मौजूदगी थी और किसी भी समय हिरासत या लाठीचार्ज की आशंका बनी हुई थी, इसके बावजूद कई प्रदर्शनकारी वहीं डटे रहे.

इस बीच लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी घोषणा की कि यदि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते हैं तो वह जल्द ही अनशन शुरू करेंगे.

दिपके लगातार प्रदर्शनकारियों से कहते रहे कि डरने की जरूरत नहीं है. चाहे पुलिस कार्रवाई करे या हिरासत में ले, आंदोलन जारी रहना चाहिए.

दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन खत्म कराने के लिए अपेक्षाकृत संयमित रणनीति अपनाई. शनिवार शाम पांच बजे, जब प्रदर्शन की निर्धारित समय सीमा समाप्त हुई, तब बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान जंतर-मंतर पहुंचे. पहले लोगों से वहां से जाने की अपील की गई. इसके बाद भीड़ को हटाने की कोशिश हुई और बड़ी संख्या में लोग वहां से चले भी गए.

लेकिन लगभग सत्तर लोग वहीं बैठे रहे. कुछ समय बाद पुलिस ने उन्हें हटाने के प्रयास लगभग बंद कर दिए. पुलिसकर्मियों को भरोसा था कि समय के साथ प्रदर्शनकारी खुद थक जाएंगे.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

न खाना था. न बिजली थी. पानी की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी. इसके बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर डटे रहे.

दिपके के पास लंबे भाषण नहीं थे. शनिवार शाम पांच बजे के बाद उनका अधिकांश समय नारे लगाने, गीत गाने, लोगों से रुकने की अपील करने और पुलिस से बिजली तथा पीने के पानी की व्यवस्था बहाल करने की मांग करने में बीता. आखिरकार पुलिस ने पानी और बिजली की कुछ सुविधाएं बहाल कर दीं.

दिलचस्प बात यह रही कि इस बार आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर पहले जैसी चर्चा दिखाई नहीं दे रही थी. ऑनलाइन उत्साह कम नजर आ रहा था. लेकिन शनिवार के प्रदर्शन में मौजूद भीड़ ने अलग तस्वीर पेश की. लोगों की मौजूदगी से साफ था कि आंदोलन को लेकर उत्साह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.

हालांकि प्रदर्शन में मौजूद अधिकांश लोग पेपर लीक से सीधे प्रभावित नहीं थे. वे मुख्य रूप से आंदोलन और उसकी मांगों के समर्थन में वहां पहुंचे थे. प्रभावित अभ्यर्थियों की तुलना में समर्थन देने वालों की संख्या अधिक दिखाई दे रही थी.

यह जानना भी मुश्किल नहीं था कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी छात्र संगठनों से जुड़े हुए थे. उनके बैनर पूरे प्रदर्शन स्थल पर दिखाई दे रहे थे. लेकिन यह कहना गलत होगा कि आंदोलन केवल छात्रों तक सीमित था. वहां गिग वर्कर्स थे. अभिभावक थे. कॉलेज छात्र थे. अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमियों से आए लोग थे. बड़ी संख्या में मीडिया कर्मी और कंटेंट क्रिएटर भी मौजूद थे.

इन दो प्रदर्शनों के बीच केवल दिपके ने ही नहीं, आयोजकों ने भी बहुत कुछ सीखा था. दूसरा प्रदर्शन पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यवस्थित दिखाई दिया. प्रदर्शनकारियों के लिए मुफ्त पानी की व्यवस्था की गई थी. बैठने के लिए कालीन बिछाए गए थे. लोगों से स्टील की प्लेटें और चम्मच लाने को कहा गया था ताकि वे सामूहिक रूप से विरोध दर्ज करा सकें.

शनिवार शाम पांच बजे के बाद भले ही भीड़ कम हो गई हो, लेकिन प्रदर्शन का शोर और उत्साह कम नहीं हुआ. नारेबाजी, गीत, तालियां और प्लेट-चम्मच की आवाजें देर रात तक सुनाई देती रहीं.

रविवार सुबह नौ बजे तक, जबकि प्रदर्शन को प्रशासन की नजर में अवैध माना जा रहा था और पुलिस लोगों के प्रवेश को सीमित करने की कोशिश कर रही थी, तब भी सौ से अधिक लोग वहां पहुंच चुके थे. माहौल एक बार फिर शनिवार दोपहर जैसा दिखाई देने लगा.

दिपके के पास अब कोई नया संदेश नहीं था. उनके सहयोगियों के पास भी कहने के लिए बहुत कुछ नया नहीं था. लेकिन इसके बावजूद वे भीड़ को वापस लाने और उसे अपने साथ बनाए रखने में सफल रहे. दो हफ्ते पहले जंतर-मंतर पर जो अभिजीत दिपके दिखाई दिए थे, अब उनकी जगह एक ऐसा आंदोलनकारी नजर आता है जिसने विरोध को लंबे समय तक जीवित रखने और लोगों को अपने साथ जोड़े रखने की कला सीख ली है.

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