दिल्ली में एसआईआर विरोधी प्रदर्शनों और युवा प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की कार्रवाई का आम लोगों पर क्या असर पड़ा है? 10 अक्टूबर की सुबह से दिल्ली में मौजूद दुष्यंत ने सड़कों पर लोगों की प्रतिक्रियाओं के जरिए इसका जवाब तलाशने की कोशिश की. उनका निष्कर्ष है कि सरकार की सख्ती से प्रदर्शनकारियों की आवाज दबने के बजाय आम लोगों में नाराजगी बढ़ी है.
जुलाई 2026 की घटनाएं और सरकार की प्रतिक्रिया
जुलाई में बीजेपी को लगा कि अभिजीत दीप्तके और उनके साथियों का जमीनी स्तर पर कोई मजबूत संगठन नहीं है. इसलिए सरकार ने उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया. यह स्थिति संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की उस रणनीति की याद दिलाती है, जिसमें अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने से उनका आंदोलन और चर्चा में आ गया था. इसी बीच, कॉकroach जनता पार्टी (सीजेपी) को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने दिया गया. 20 जुलाई को संसद तक मार्च के ऐलान के बावजूद सरकार ने शुरुआत में कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की.
जब सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल के दौरान उनकी जान को खतरा होने की आशंका पैदा हुई, तो उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध प्रदर्शन स्थल से हटाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया. इस कदम ने लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी. बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और दूसरी समस्याओं से परेशान हजारों लोग दिल्ली पहुंचे. सोशल मीडिया पर प्रसारित तस्वीरों और वीडियो से यह संदेश गया कि लोग नरेंद्र मोदी और अमित शाह से डरने को तैयार नहीं हैं और सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा है.
अक्टूबर की कार्रवाई और ‘सरकारी अराजकता’
‘सरकारी अराजकता’ की अवधारणा के जरिए यह आरोप लगाया गया है कि सत्ता समर्थक समूहों को हिंसा करने की छूट मिलती है, जबकि पुलिस कई बार मूकदर्शक बनी रहती है या ऐसी कार्रवाई को प्रोत्साहित करती दिखाई देती है. दूसरी ओर, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को हिरासत, धमकी और रोक-टोक का सामना करना पड़ता है.
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 का हवाला देकर शांतिपूर्वक खड़े लोगों को भी बसों में बैठाकर ले जाने के आरोप लगाए गए. कार्यकर्ताओं को विमान में बैठे-बैठे हिरासत में लेने और मध्य प्रदेश तथा महाराष्ट्र से दिल्ली आ रहे युवाओं को बसों और ट्रेनों से उतारने की घटनाएं भी सामने आईं. पुलिस पर पेइंग गेस्ट आवासों और मस्जिदों में जाकर लोगों को प्रदर्शन में शामिल न होने की चेतावनी देने के आरोप भी लगाए गए.
यह स्थिति राजनीतिक दमन के उस मॉडल से जुड़ती है, जिसमें कानून और संस्थाओं का बाहरी ढांचा बना रहता है, लेकिन उनका इस्तेमाल नागरिक अधिकारों को सीमित करने के लिए किया जाता है. जर्मन विधिवेत्ता अर्न्स्ट फ्रेंकल ने नाजी शासन के संदर्भ में इसे ‘द्वैध राज्य’ की अवधारणा से समझाया था. विधि विशेषज्ञ किम लेन शेपेल ने कानून की प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करके लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की प्रवृत्ति को ‘निरंकुश कानूनीवाद’ कहा है.
जब दमन का उलटा असर होता है
ब्रायन मार्टिन की पुस्तक जस्टिस इग्नाइटेड के अनुसार, दमनकारी सत्ता अक्सर अपनी कार्रवाई के खिलाफ उठने वाले जनाक्रोश को रोकने के लिए पांच तरीके अपनाती है—घटना की जानकारी छिपाना, पीड़ितों की छवि खराब करना, घटना की व्याख्या बदलना, औपचारिक संस्थागत प्रक्रियाओं के जरिए कार्रवाई को उचित ठहराना और विरोध करने वालों को डराना या प्रलोभन देना.
लेकिन जब अन्याय की जानकारी सार्वजनिक हो जाती है, पीड़ितों की बात को विश्वसनीयता मिलती है और लोग संगठित होकर समर्थन करने लगते हैं, तो दमन का उलटा असर हो सकता है. महात्मा गांधी को इस रणनीति का सबसे सफल उदाहरण माना गया है.
दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती और युवाओं को जबरन बसों में खींचकर ले जाने के वीडियो सोशल मीडिया तथा अंतरराष्ट्रीय समाचार माध्यमों में प्रसारित हुए. इन तस्वीरों ने युवाओं को डराने के बजाय उनका संकल्प और मजबूत किया. प्रदर्शन स्थल पर मौजूद दुष्यंत ने दुकानदारों को प्रदर्शनकारियों के बीच मुफ्त शीतल पेय और पानी बांटते देखा. एक दुकानदार ने उनसे कहा, “यह कुछ भी नहीं है, आप जो कर रहे हैं, वह बड़ी बात है.”
सड़कों पर बढ़ती नाराजगी
कनॉट प्लेस के एक प्रसिद्ध रेस्तरां के मालिक ने पुलिस और दूसरे लोगों से बचकर भाग रहे करीब एक दर्जन युवाओं को अपने यहां शरण दी. उन्होंने पुलिसकर्मियों को फटकारते हुए सवाल किया कि वे इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद कुछ युवाओं को क्यों डरा रहे हैं. ऑटो चालकों, कैब चालकों और चाय विक्रेताओं से बातचीत में भी सरकार के प्रति नाराजगी दिखाई दी. ये लोग भले ही प्रदर्शनों में शामिल न हों, लेकिन मतदान के समय अपनी नाराजगी जाहिर कर सकते हैं.
एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया को लेकर पहले से मौजूद संदेहों को मुख्य चुनाव आयुक्त के बचाव में बीजेपी की तीखी प्रतिक्रिया ने और बढ़ाया. सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद सड़क पर मिले लोगों की प्रतिक्रियाओं से यह धारणा मजबूत हुई कि सत्ता किसी को उभरने नहीं देना चाहती.
न्यायपालिका को लेकर लोगों की राय बंटी हुई थी. कुछ का मानना था कि बीजेपी न्यायपालिका का सम्मान नहीं करती, जबकि कुछ लोगों को लगता था कि अदालतें वही करती हैं जो नरेंद्र मोदी चाहते हैं. दास और रांका की सार्वजनिक छवि वांगचुक और नेहा बोरा जैसी लोकप्रिय नहीं है और उन्हें व्यापक सहानुभूति भी नहीं मिली है. फिर भी, वे युवा पेशेवर और उच्च जाति के हिंदू हैं. ऐसे में उनके खिलाफ सांप्रदायिक या जातिगत पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल करना बीजेपी के लिए आसान नहीं है.

