श्रवण गर्ग | मोदी ने नीदरलैंड से क्यों डराया कि संकट गहरा है ?

राष्ट्रपति ट्रम्प की दो-दिनी चीन यात्रा विफल हो गई है और उसके संकेत प्रकट भी होने लगे हैं. पहला बड़ा संकेत यह है कि अमेरिका-इज़राइल मिलकर ईरान के ख़िलाफ़ कोई निर्णायक करवाई कर सकते हैं और इसी आशंका के चलते रूस के राष्ट्रपति पुतिन मंगलवार को बीजिंग पहुँच रहे हैं. ट्रम्प की यात्रा के विफल होने का सबसे बड़ा कारण ताइवान पर चीन के क़ब्ज़े को लेकर दोनों देशों के बीच किसी सहमति का नहीं बनना बताया जाता है. ताइवान को लेकर राष्ट्रपति शी से हुई बातचीत पर ट्रम्प कुछ भी जवाब नहीं दे रहे हैं.

दूसरा संकेत यह है कि अमेरिकी बाज़ार तेज़ी से गिरने लगे हैं, कच्चे तेल के दाम बढ़ गए हैं और फर्टिलाइजर का बड़ा संकट दुनिया के कृषि उत्पादन पर मंडराने लगा है. इससे पहले कि बढ़ती महंगाई के चलते अमेरिकी जनता का आक्रोश सड़कों पर व्यक्त हो, हॉर्मूज़ के समुद्री मार्ग को खुलवाना ट्रम्प के लिये ज़रूरी हो गया है. अमेरिका में नवंबर में महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनाव हैं और ट्रम्प के सामने बहुमत खोने का ख़तरा मंडरा रहा है.

प्रधानमंत्री मोदी की यूएई यात्रा के दौरान हुए समझौतों से भारत का संकट कितना टलने वाला है कहा नहीं जा सकता. भारतीय बाज़ारों में गिरावट जारी है. सोने की ख़रीदी को लेकर की गई मोदी की अपील के बाद से शेयर निवेशकों को सात लाख करोड़ का घाटा उठाना पड़ा है. विदेशी वित्तीय संस्थान भारत से निवेश वापस खींच रहे हैं और थॉमस कुक के मुताबिक़ शनिवार को डॉलर के मुक़ाबले रुपया 97 के स्तर पर पहुँच गया. पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए जा चुके हैं. पीएम की स्वदेश वापसी तक हालात कहाँ पहुँचते हैं कहा नहीं जा सकता.

आश्चर्यजनक रूप से मोदी ने यूएई से नीदरलैंड्स पहुँचकर भारतीय समुदाय को जो कहा उससे दहशत और ज़्यादा फैल सकती है. मोदी ने कहा कि ऊर्जा संकट के कारण यह समय आपदाओं का दशक बन चुका है. स्थितियाँ तेज़ी से नहीं बदली गईं तो अब तक की सारी उपलब्धियों को नकार कर दुनिया की एक बड़ी आबादी ग़रीबी के दलदल में चली जाएगी.

खाड़ी की लड़ाई से ट्रम्प की चिंता का अन्दाज़ इस सच्चाई से लगाया जा सकता है कि उनके पहले कभी कोई अमेरिकी राष्ट्रपति इतना उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल लेकर किसी अन्य देश की यात्रा पर नहीं गया. पत्नी, बेटे और बहू के अलावा विदेश सचिव, व्यापार सचिव, ऊर्जा सचिव व इलोन मस्क, टिम कुक सहित अमेरिका के सत्रह कॉर्पोरेट प्रमुखों का क़ाफ़िला चीनी नेताओं पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालने के लिये ट्रम्प के साथ बीजिंग पहुँचा था.

चीन के साथ हुई ट्रम्प की बातचीत के नतीजों पर नज़र डालें तो हॉर्मूज़ का रास्ता खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने को लेकर राष्ट्रपति शी ने सहमति व्यक्त करने के अधिक कुछ नहीं कहा. इसी तरह ट्रम्प ने भी शी को कोई आश्वासन नहीं दिया कि अमेरिका ताइवान की आज़ादी के सवाल से अपना हाथ खींच लेगा या ताइपेई को हथियार नहीं बेचेगा. चीनी राष्ट्रपति ने ट्रम्प को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि ताइवान के सवाल को ठीक से नहीं निपटाया गया तो दोनों राष्ट्रों के बीच संघर्ष में बदल सकता है. ट्रम्प ने इतना ज़रूर कहा कि ताइवान को लेकर चीनी राष्ट्रपति मज़बूत दावेदारी दिखा रहे हैं. यह भी कि नौ हज़ार मील दूर जाकर लड़ने के बारे में सोचा नहीं जा सकता.

इस समय जो कुछ चल रहा है वह बताता है कि अच्छे दिनों की शुरुआत तो कभी हो ही नहीं पाई, बुरे से बदतर दिनों की ज़रूर होती नज़र आ रही है. इस सिलसिले में कोई संकेत बजाय भारत में देने के, मोदीजी ने नीदरलैंड की ज़मीन का चयन किया. उनके कहे पर वहाँ के भारतीय समुदाय ने तालियाँ बजाई या चिंता ज़ाहिर की पता नहीं चल पाएगा, भारत में तो चिंता बढ़ ही गई है.

श्रवण गर्ग एक वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.


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