सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गुरुवार (22 अक्टूबर, 2026) को केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख को राजनीतिक स्वायत्तता और संवैधानिक सुरक्षा उपाय देने के अपने पिछले आश्वासनों से पीछे हटने के लिए गृह मंत्रालय की आलोचना की.
वांगचुक ने कहा कि केंद्र ने पिछली बातचीत में कभी भी लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से इनकार नहीं किया था. दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दावा किया, "उन्होंने (केंद्र) कहा था कि वे आखिरकार इसे दे देंगे."
विजयेता सिंह के अनुसार, लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने इस महीने की शुरुआत में एक प्रेस बातचीत में कहा था कि लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) को स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि "न तो राज्य का दर्जा और न ही विधायिका (विधानसभा) वाला केंद्र शासित प्रदेश एजेंडे में है." अधिकारी ने संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत एक विशेष मॉडल का उल्लेख किया था.
वांगचुक ने कहा, "एक तरफ चीन लद्दाख पर अपना दावा ठोक रहा है, वहीं दूसरी तरफ हमारी सरकार लद्दाखियों को अलग-थलग कर रही है. हमने संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा की मांग की थी, जिस पर 22 मई की बैठक में सहमति बनी थी. अब वे हमें काउंसिल (परिषद) जैसा निकाय दे रहे हैं. हम विधायिका वाले केंद्र शासित प्रदेश से कम किसी भी चीज पर राजी नहीं होंगे. यदि केंद्र हमारा समर्थन करता है, तो हम एक पूर्ण राज्य बन सकते हैं, ताकि वे चीन को जवाब दे सकें. लद्दाख एक जनजातीय क्षेत्र है और हम इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के लिए तैयार हैं. वे हमारे साथ विश्वासघात क्यों कर रहे हैं? उन्होंने हमारे ऊपर उप-राज्यपाल (एलजी) को बैठा दिया है, जो एक वायसराय की तरह हैं."
उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय अपने कारणों से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता कर रहा है. अरुणाचल प्रदेश से तुलना करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि जब अरुणाचल को उसकी रणनीतिक स्थिति के बावजूद राज्य का दर्जा दिया गया था, तो लद्दाख को अधिक राजनीतिक स्वायत्तता न देने के पीछे सीमा की संवेदनशीलता को कारण क्यों बताया जा रहा है.
"आज हमसे कहा जा रहा है, 'आप एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र हैं. आप राज्य नहीं बन सकते’. 1986 में अरुणाचल प्रदेश राज्य कैसे बना? और एक अच्छा राज्य, एक सबसे वफादार और देशभक्त राज्य बना. आप लद्दाख को उस तरह क्यों नहीं रखना चाहते? इसी तर्क के साथ अरुणाचल को राज्य का दर्जा दिया गया था कि वह एक संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र है. हमारे लिए, विशेष मॉडल का मतलब था कि यदि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं, तो कम से कम विधायिका वाला केंद्र शासित प्रदेश और साथ ही अनुच्छेद 371 के तहत सुरक्षा. लद्दाख किसी भी अन्य राज्य की तरह समान लोकतांत्रिक अधिकारों का हकदार है. जैसे तमिलनाडु, तमिलनाडु के लोगों द्वारा चलाया जाता है और गुजरात, गुजरात के लोगों द्वारा चलाया जाता है, वैसे ही लद्दाख को लद्दाख के लोगों द्वारा क्यों नहीं चलाया जाना चाहिए?"
वांगचुक ने कहा कि लेह में 15 अक्टूबर को हुई पिछली बैठक के बाद एलएबी और केडीए को बताया गया था कि गृह मंत्रालय के साथ अगली बैठक 22 अक्टूबर को दिल्ली में होगी. उन्होंने कहा, "यह बताए जाने के बाद कि 22 अक्टूबर को चर्चा जारी रहेगी, हम दिल्ली आए. हमने सरकार के प्रस्ताव का अध्ययन किया था, एक विस्तृत जवाब तैयार किया था और बिंदु-दर-बिंदु चर्चा की उम्मीद की थी. लेकिन बैठक हुई ही नहीं."
वांगचुक ने तर्क दिया कि विधानसभा (विधायिका) की मांग इस जरूरत से जुड़ी है कि लद्दाख के लोगों को यह तय करने में अपनी बात रखने का अधिकार मिले कि उनके क्षेत्र पर शासन कैसे किया जाए. उन्होंने कहा कि लद्दाख को चुनी हुई विधानसभा से वंचित करने के लिए रणनीतिक कारणों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.
वांगचुक ने यह भी रेखांकित किया कि चीन के साथ सीमा पर लद्दाख की स्थिति इसके लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाती है. उन्होंने कहा, "चीन लद्दाख को अपना क्षेत्र बताता है. हम इसकी निंदा करते हैं. लेकिन लद्दाख को अपने पैरों के नीचे मत कुचलिए." उन्होंने सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने खुद के फैसलों से सीमावर्ती क्षेत्र को कमजोर न करे और आगे कहा, "अपनी जिद की वजह से सीमाओं को कमजोर मत कीजिए."
मंत्रालय ने लद्दाख के लिए एक प्रस्तावित संवैधानिक ढांचे की रूपरेखा तैयार करते हुए 32 पृष्ठों की एक प्रस्तुति (प्रजेंटेशन) प्रसारित की थी और एलएबी तथा केडीए से टिप्पणियां मांगी थीं. मंत्रालय के साथ बातचीत के दौरान एलएबी और केडीए को सलाह दे रहे अधिवक्ता विक्रम हेगड़े ने कहा कि सरकार के प्रस्ताव और लद्दाख के निवासियों की आकांक्षाओं के बीच काफी बड़ा अंतर बना हुआ है.

