‘उनकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी’: अरुणाचल प्रदेश में मेगा बांध के विरोध के बीच सेंसरशिप और सरकारी कार्रवाई तेज
‘आर्टिकल 14’ में शमिक बाग की रिपोर्ट के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,000 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना के विरोध के बीच स्थानीय समुदायों, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं पर सरकारी कार्रवाई तेज हो गई है. अक्टूबर 2026 में कम से कम चार स्थानीय फेसबुक पेज सरकारी आदेश के बाद बंद कर दिए गए. इससे पहले, बांध विरोधी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, आपराधिक मामले दर्ज किए जाने और सुरक्षा बलों की तैनाती जैसी कार्रवाइयां भी हुईं. आदि आदिवासी समुदाय के लोगों को आशंका है कि इस परियोजना से उनकी पुश्तैनी जमीन, सियांग नदी, आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली प्रभावित होगी.
बांध विरोधी खबरों पर रोक का आरोप
4 अक्टूबर को अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग जिले के यिंगकियोंग स्थित डिजिटल समाचार मंच ‘अपर सियांग न्यूज’ के प्रबंध संपादक शान जिजोंग को फेसबुक पर अपना अकाउंट भारत में प्रतिबंधित किए जाने की सूचना मिली. नोटिस में भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत कानूनी आवश्यकताओं का हवाला दिया गया था.
अरुणाचल प्रेस क्लब की आपत्ति के बाद 7 अक्टूबर को उनका पेज बहाल कर दिया गया, लेकिन जिजोंग के मुताबिक, बांध विरोधी प्रदर्शनों और लोगों के गुस्से से जुड़े कई वीडियो गायब थे. 9 अक्टूबर को पेज फिर से बंद कर दिया गया.
जिजोंग के अनुसार, मानवाधिकार कार्यकर्ता काटोन मोयोंग द्वारा संचालित ‘अबोरमन अबो’, ‘सेव अबोरलैंड’ और अधिवक्ता एबो मिली के फेसबुक पेज भी बंद कर दिए गए. इन सभी पेजों पर प्रस्तावित बांध से जुड़े मुद्दे उठाए जा रहे थे.
17 अक्टूबर को हिंदी समाचार पोर्टल ‘अरुणभूमि न्यूज’ ने भी बताया कि सियांग बांध से संबंधित उसके दो वीडियो भारत में देखने के लिए प्रतिबंधित कर दिए गए. पोर्टल के प्रधान संपादक टाकाम सोनिया ने कहा कि वे अब बांध से संबंधित वीडियो अपलोड नहीं कर पा रहे हैं. उन्होंने इसे अरुणाचल प्रदेश में मीडिया की स्वतंत्रता को दबाने की कोशिश बताया.
गिरफ्तारियां और सुरक्षा बलों की तैनाती
मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ कई कार्रवाइयां हुई हैं. 9 अक्टूबर को चार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर अरुणाचल प्रदेश गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 2014 के तहत आरोपित किया गया. ये सभी सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम के वरिष्ठ सदस्य थे, जो प्रस्तावित परियोजना का विरोध कर रहा है.
11 अक्टूबर को प्रशासन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत यिंगकियोंग में पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर प्रतिबंध लगा दिया.
इससे पहले, अगस्त में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाली कार्यकर्ता भानु ताटक के खिलाफ विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के कथित उल्लंघन का मामला दर्ज किया था. उन पर बांध विरोधी प्रदर्शनों के आयोजन और उन्हें जारी रखने के लिए विदेशी धन प्राप्त करने का आरोप लगाया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 और 2022 के लंबित पुलिस मामलों के आधार पर उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर जारी किया गया था. इसके चलते पिछले साल आव्रजन अधिकारियों ने उन्हें डबलिन जाने वाली उड़ान में सवार होने से रोक दिया था.
क्षेत्र में वर्ष 2025 से भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल, सशस्त्र सीमा बल और अरुणाचल प्रदेश पुलिस के जवानों की बड़ी संख्या में तैनाती की गई है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, जवानों को सरकारी स्कूलों और सार्वजनिक संस्थानों में ठहराया गया है. इससे क्षेत्र में भय का माहौल है.
30 सितंबर को क्यों भड़का प्रदर्शन?
30 सितंबर को अपर सियांग जिले में बांध विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा हुई. प्रदर्शनकारियों ने स्थानीय विधायक आलो लिबांग के आवास के मुख्य द्वार को नुकसान पहुंचाया और दरवाजों तथा खिड़कियों पर पत्थर फेंके. कुछ वाहनों को भी क्षति पहुंची. गेकू कस्बे में दो पुलिस वाहनों और एक व्यावसायिक वाहन को आग लगा दी गई.
‘अपर सियांग न्यूज’ के प्रबंध संपादक शान जिजोंग के अनुसार, मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने प्रभावित लोगों से मिलने का वादा किया था, लेकिन 30 सितंबर को उन्होंने कथित तौर पर केवल सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों से मुलाकात की. उसी दिन सुबह आठ बजे यिंगकियोंग में एक रैली आयोजित की गई थी. महिलाओं की अगुवाई में निकले प्रदर्शनकारी मुख्यमंत्री से मिलना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा बलों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया.
इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री और स्थानीय विधायकों के पुतले जलाए. उपमुख्यमंत्री और अन्य विधायकों का काफिला भी प्रदर्शन के कारण बैठक स्थल तक नहीं पहुंच सका. बाद में मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से ईटानगर लौट गए. जिजोंग के मुताबिक, इन घटनाओं ने लोगों के गुस्से को और बढ़ा दिया.
27 गांवों पर विस्थापन का खतरा
प्रस्तावित सियांग बांध परियोजना की क्षमता लगभग 11,000 मेगावाट है. रिपोर्ट के मुताबिक, सियांग और अपर सियांग जिलों के 27 गांवों के डूबने या सीधे अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने की आशंका है. इससे लगभग 1.5 लाख लोगों पर असर पड़ सकता है. हालांकि, प्रभावित गांवों और आबादी के अंतिम आंकड़े अभी उपलब्ध नहीं हैं.
जिजोंग के अनुसार, यिंगकियोंग और गेकू जैसे कस्बे भी डूबने के खतरे का सामना कर सकते हैं. सरकार ने मुआवजे और पुनर्वास की बात कही है, लेकिन स्थानीय लोग इसे अपनी चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं मानते.
आदि समुदाय के लिए सियांग नदी केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि आस्था और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है. नदी के किनारे उनकी कृषि भूमि स्थित है और उनकी आजीविका प्रकृति पर निर्भर करती है. समुदाय को आशंका है कि बांध बनने से उनकी परंपराएं, जमीन और जीवनशैली नष्ट हो सकती हैं.
भूकंप और जैव विविधता को लेकर चिंता
पूरा पूर्वी हिमालय क्षेत्र भूकंपीय जोन-5 में आता है, जिसे भूकंप के लिहाज से सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी माना जाता है. स्थानीय लोगों को आशंका है कि भूकंप की स्थिति में विशाल बांध को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है और इसका असर असम तक महसूस किया जा सकता है.
अपर सियांग जिले में मौलिंग राष्ट्रीय उद्यान भी स्थित है, जो अरुणाचल प्रदेश के दो राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है. परियोजना से क्षेत्र की जैव विविधता पर भी खतरा मंडरा रहा है. बांध निर्माण स्थल और उसके जलग्रहण क्षेत्र में हजारों पेड़ों की कटाई की आशंका है.
रणनीतिक परियोजना के तर्क से सहमत नहीं स्थानीय लोग
सरकार इस परियोजना को चीन की ऊपरी धारा पर प्रस्तावित जलविद्युत गतिविधियों के जवाब में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बताती है. हालांकि, जिजोंग के अनुसार, स्थानीय लोग इस तर्क से सहमत नहीं हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि यदि चीन की प्रस्तावित बांध परियोजना की क्षमता लगभग 60,000 मेगावाट है और सियांग बांध की क्षमता करीब 11,000 मेगावाट है, तो क्या छोटा बांध चीन की विशाल परियोजना के टूटने की स्थिति में बाढ़ को नियंत्रित कर पाएगा?
सरकार बिजली उत्पादन, पर्यटन और सिंचाई के लाभों का भी हवाला देती है, लेकिन स्थानीय समुदायों की आशंकाएं दूर नहीं हुई हैं.
सहमति लेने की प्रक्रिया पर सवाल
जिजोंग का आरोप है कि सरकार ने गांव-गांव जाकर परियोजना के बारे में जागरूकता अभियान नहीं चलाया. इसके बजाय, उसका जोर जल्द से जल्द प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने पर है. उनके मुताबिक, स्थानीय लोगों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति सुनिश्चित करने के बजाय सरकार समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर कराने में जुटी है.
उन्होंने दावा किया कि कुछ परिवारों को 2.5 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई, जबकि अन्य को संतरे की खेती और मुर्गीपालन जैसी योजनाओं का लाभ देकर सहमति प्राप्त करने की कोशिश की गई. उनका आरोप है कि एक ही परिवार के कई सदस्यों से अलग-अलग हस्ताक्षर कराकर समर्थन करने वाले परिवारों की संख्या अधिक दिखाई जा सकती है. ये आरोप जिजोंग के बयान पर आधारित हैं.
जिजोंग के अनुसार, सोशल मीडिया पर बांध विरोधियों की मौजूदगी समर्थकों से अधिक है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स पर दोनों पक्ष सक्रिय हैं. उन्होंने यह आशंका भी जताई कि बांध के समर्थन में कुछ सोशल मीडिया अकाउंट को सरकारी समर्थन प्राप्त हो सकता है.
(शमिक बाग कोलकाता स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं. ‘आर्टिकल 14’ में प्रकाशित यह रिपोर्ट अपर सियांग न्यूज के प्रबंध संपादक शान जिजोंग के साक्षात्कार पर आधारित है.)

