एस. वाई. कुरैशी | संविधान में बंधुत्व का वादा आज पहले से कहीं अधिक मायने रखता है
स्कूल का हर बच्चा संविधान की प्रस्तावना को याद कर सकता है: न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व (भाईचारा). पहले तीन विषयों ने अदालतों, राजनीति और शिक्षाविदों में व्यापक बहस को जन्म दिया है. हालांकि, चौथे विषय (बंधुत्व) पर लगभग किसी का ध्यान नहीं गया. फिर भी, बंधुत्व सभी संवैधानिक मूल्यों में सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि यह एक ऐसा मूल्य है जिसे अकेले कानून द्वारा नहीं बनाया जा सकता है.
यह उपेक्षा हैरान करने वाली है, क्योंकि संविधान बंधुत्व को कोई बाद में जोड़ा गया विचार नहीं मानता. यह अन्य तीनों के समान ही वाक्य में आता है, और इसका संवैधानिक वजन भी उनके बराबर ही है. संविधान निर्माताओं ने इसे जानबूझकर वहाँ रखा था. सवाल यह है कि हमने क्यों 75 साल इसे बड़े पैमाने पर नजरअंदाज करने में बिता दिए, और इस उपेक्षा की हमें क्या कीमत चुकानी पड़ी है.
इसका उत्तर एक ऐसे अंतर से शुरू होता है जो संविधान सभा की बहसों के दौरान स्पष्ट था, लेकिन तब से संवैधानिक चर्चाओं से गायब हो गया है. स्वतंत्रता और समता नागरिक और राज्य (सरकार) के बीच के संबंध को परिभाषित करते हैं. बंधुत्व नागरिकों के बीच के आपसी संबंध को परिभाषित करता है. यही अंतर सबसे बड़ा बदलाव लाता है. यदि राज्य स्वतंत्रता या समता का उल्लंघन करता है, तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं. लेकिन तब क्या उपाय बचता है जब नागरिक एक-दूसरे को साथी नागरिक मानना ही बंद कर दें? जब असहमति शत्रुता में बदल जाती है और अंतर संदेह में बदल जाता है, तो बंधुत्व गायब होने लगता है.
बी. आर. अंबेडकर इस बात को असाधारण स्पष्टता के साथ समझते थे. 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने अंतिम भाषण में उन्होंने चेतावनी दी थी, "बंधुत्व के बिना, समता और स्वतंत्रता पेंट की परतों से अधिक गहरी नहीं होंगी." उनकी चेतावनी भारतीय समाज के ईमानदार मूल्यांकन पर आधारित थी. उन्होंने पूछा था, "कई हजार जातियों में बंटे लोग एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं?" वे हमें याद दिला रहे थे कि राष्ट्र होना कोई पहले से मिली हुई चीज़ नहीं, बल्कि एक उपलब्धि है, और बंधुत्व इसकी शर्त और प्रमाण दोनों है. बंधुत्व को लेकर संविधान की चिंता केवल प्रस्तावना तक ही सीमित नहीं रही. अनुच्छेद 51A(e) प्रत्येक नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य बनाता है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय मतभेदों से परे सद्भाव और समान भाईचारे की भावना को बढ़ावा दे.
पचहत्तर साल बाद, वे मूल चिंताएं कम नहीं हुई हैं. यद्यपि हम तकनीकी रूप से पहले से कहीं अधिक जुड़े हुए हैं, लेकिन सामाजिक रूप से हम शायद ही कभी इतने दूर रहे हों. सार्वजनिक बहसें अधिक मुखर, तीखी और कटु हो गई हैं, जबकि आपसी समझ कमज़ोर हो गई है. नफरत से भरे बयानों—चाहे वे राजनीतिक हों, धार्मिक हों या डिजिटल—से होने वाला सबसे बड़ा नुकसान यह नहीं है कि वे ठेस पहुँचाते हैं. लोकतंत्र हमेशा ठेस पहुँचने के बावजूद जीवित रहे हैं. इसका गहरा नुकसान भरोसे के खत्म होने में है.
भरोसा एक कार्यशील समाज का अदृश्य ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) है—यह धारणा कि अजनबी लोग एक-दूसरे के साथ अच्छे विश्वास के साथ व्यवहार कर सकते हैं. जब वह धारणा खत्म हो जाती है, तो कोई भी कानून इसे पूरी तरह से बहाल नहीं कर सकता. अर्थव्यवस्था इस पर निर्भर करती है. लोकतंत्र इस पर निर्भर करता है. स्वतंत्रता और समता न्यायसंगत, लागू करने योग्य और न्यायाधीश के सामने कार्रवाई के योग्य हैं. बंधुत्व एक अलग श्रेणी में आता है. यदि स्वतंत्रता और समता नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं, तो मेरे लिए बंधुत्व राष्ट्र का मौलिक अधिकार है. कोई भी अदालत आपसी सम्मान पैदा नहीं कर सकती. कोई भी कानून साझा अपनेपन की भावना नहीं बना सकता. कोई भी सरकारी कार्यक्रम भरोसे को कानूनी रूप नहीं दे सकता. फिर भी यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि बंधुत्व कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर है और सरकार व अदालतें असहाय दर्शक हैं.
संविधान और आपराधिक कानून में सामाजिक सद्भाव की रक्षा के लिए एक बड़ा ढांचा मौजूद है. अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है. अनुच्छेद 15 और 25 नागरिकों को भेदभाव से बचाते हैं और आस्था की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं. अनुच्छेद 51A(e) सद्भाव और साझा भाईचारे को बढ़ावा देने का कर्तव्य लागू करता है. आपराधिक कानून इससे भी आगे जाता है. नागरिकों के बीच शांति बनाए रखने और सांप्रदायिक शत्रुता को रोकने के लिए आईपीसी की धारा 153A, 153B, 295A और 505 के साथ-साथ पूजा स्थलों की रक्षा करने वाले प्रावधान लागू किए गए थे.
ये प्रावधान भले ही बंधुत्व का निर्माण न करें, लेकिन ये इसे व्यवस्थित रूप से नष्ट होने से रोकने के लिए मौजूद हैं. इसलिए, चुनौती कानूनी सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति नहीं है. चुनौती उनका असमान रूप से लागू होना है. अदालतें स्नेह का आदेश नहीं दे सकतीं, लेकिन वे नफरत, डराने-धमकाने और समान नागरिकता पर होने वाले हमलों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती हैं. कानून बंधुत्व का निर्माण नहीं कर सकता, लेकिन यह इसके विनाश को रोक सकता है—और इसे ऐसा करना ही चाहिए.
यह पूछना लाजिमी है कि बंधुत्व की 75 वर्षों की उपेक्षा ने क्या परिणाम दिए हैं. विचार करें कि सरकार के अपने आंकड़े हमें क्या बताते हैं. संसद के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार, एक दशक से अधिक समय से हर साल लगभग 2 लाख भारतीय अपनी नागरिकता छोड़ रहे हैं, जो अकेले पिछले पांच वर्षों में लगभग 9 लाख हो गई है. देश छोड़ने वाले इनमें से कई लोग सफल उद्यमी और पेशेवर हैं. उनके फैसलों के पीछे कई कारक हो सकते हैं, लेकिन इस घटना का पैमाना एक जायज सवाल खड़ा करता है: इस तरह के विकल्पों में सामाजिक माहौल और नागरिक विश्वास क्या भूमिका निभाते हैं?
इतिहास बताता है कि लंबे समय तक चलने वाले सामाजिक संघर्ष आर्थिक घाव छोड़ जाते हैं, जो सुर्खियों के गायब होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते हैं. भारत पहले ही यह सबक सीख चुका है. पंजाब कभी देश का सबसे समृद्ध राज्य था, जहाँ 1980 के दशक के मध्य तक प्रति व्यक्ति आय सबसे अधिक थी. इसके बाद एक दशक तक चले उग्रवाद और सांप्रदायिक कलह ने वहाँ के निवेश के माहौल को तबाह कर दिया. पंजाब प्रति व्यक्ति आय की रैंकिंग में पहले स्थान से खिसक गया और 2014-15 और 2022-23 के बीच, यह 21 प्रमुख राज्यों में आर्थिक विकास के मामले में 18वें स्थान पर रहा. यह नुकसान केवल आर्थिक नहीं था; दूषित माहौल को साफ होने में पीढ़ियां लग जाती हैं.
इस विडंबना को अनदेखा करना मुश्किल है. हम भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और 2047 तक पूरी तरह से 'विकसित भारत' बनने की बात करते रहे हैं. फिर भी, सार्वजनिक संस्थान अक्सर चिंता और समय-समय पर होने वाली अराजकता के उस माहौल के प्रति अपर्याप्त रूप से चिंतित दिखाई दिए हैं जो ऐसी महत्वाकांक्षाओं को कमजोर करता है. मॉब लिंचिंग (भीड़ द्वारा हत्या), चुनिंदा तरीके से की जाने वाली तोड़फोड़ और सांप्रदायिक शत्रुता का सामान्यीकरण केवल कानून-व्यवस्था की विफलताएं नहीं हैं. ये बंधुत्व की विफलताएं हैं. जब ऐसे कृत्यों को सजा नहीं मिलती, तो वे एक संदेश देते हैं—न केवल अल्पसंख्यकों को, बल्कि अपने भविष्य का आकलन करने वाले हर उद्यमी, निवेशक और परिवार को.
ध्रुवीकरण ने इसे अपनाने वालों को चुनावी लाभ पहुँचाया होगा. लेकिन एक राष्ट्र अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए अपने मतभेदों को लगातार भड़का नहीं सकता और साथ ही यह उम्मीद भी नहीं कर सकता कि इसके आर्थिक परिणाम सीमित रहेंगे.
बंधुत्व कोई पवित्र इच्छा नहीं है जिसे प्रस्तावना में लिख दिया गया हो और राष्ट्रीय अवसरों पर औपचारिक रूप से उद्धृत कर दिया जाए. यह वह सामाजिक ऑक्सीजन है जिसके बिना न तो स्वतंत्रता और न ही समता जीवित रह सकती है, और जिसके बिना कोई भी अर्थव्यवस्था, चाहे उसके लक्ष्य कितने भी महत्वाकांक्षी क्यों न हों, वास्तव में फल-फूल नहीं सकती. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि बंधुत्व के बिना, स्वतंत्रता और समता पेंट की परतों से अधिक गहरी नहीं होंगी. पौन शताब्दी (75 साल) तक, हमने इस पेंट को उखड़ते हुए बमुश्किल ही देखा. अब हम इसमें दरारें देखना शुरू कर रहे हैं.
संविधान निर्माताओं ने एक खास वजह से इन चारों मूल्यों को एक साथ रखा था. शायद अब समय आ गया है कि हम भी ऐसा ही करें.
(लेखक एस. वाई. कुरैशी भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और 'एन अनडॉक्युमेंटेड वंडर: द मेकिंग ऑफ द ग्रेट इंडियन इलेक्शन' के लेखक हैं. अंग्रेजी में उनका मूल लेख यहां पढ़ सकते हैं. )

