20 साल पहले बिजलीघर के लिए ली गई जमीन, अब स्टील प्लांट के लिए तैयार. ओडिशा के किसानों का सवाल- हमारा भविष्य कौन लौटाएगा?
ओडिशा के ढेंकानाल जिले के कुरुंटी और खरगप्रसाद गांवों में कई परिवार आज भी उस फैसले की कीमत चुका रहे हैं जो उन्होंने करीब दो दशक पहले विकास और रोजगार के वादों पर भरोसा करके लिया था. इन किसानों ने अपनी उपजाऊ जमीनें एक ताप विद्युत संयंत्र के लिए सौंप दी थीं. लेकिन न बिजलीघर बना, न रोजगार मिला और न ही वह विकास आया जिसका सपना उन्हें दिखाया गया था.
‘आर्टिकल 14’ के मुताबिक, कुरुंटी गांव के प्रमोद नायक का परिवार उन सैकड़ों परिवारों में शामिल है जिन्होंने 2008-10 के बीच अपनी जमीन लैंको समूह की प्रस्तावित परियोजना के लिए दी थी. ब्राह्मणी नदी के किनारे स्थित उनकी जमीन धान, मूंग और उड़द की खेती के लिए जानी जाती थी. बाढ़ के बाद खेतों में नई उपजाऊ मिट्टी जमा होती थी, जिससे उत्पादन और बेहतर हो जाता था.
प्रमोद नायक के बेटे प्रवीण नायक बताते हैं कि परियोजना के बदले रोजगार का आश्वासन दिया गया था. उनके पास आज भी कंपनी का वह पत्र सुरक्षित है जिसमें संयंत्र चालू होने पर नौकरी देने की बात कही गई थी. उन्होंने बीटेक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन आज भी स्थायी रोजगार नहीं मिला. परिवार को मिली मुआवजा राशि भी लगभग खत्म हो चुकी है.
इस परियोजना की शुरुआत 2006 में हुई थी, जब ओडिशा सरकार ने हैदराबाद स्थित लैंको समूह के साथ एक समझौता किया. ओडिशा इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (IDCO) के जरिए कुरुंटी और खरगप्रसाद में करीब 887 एकड़ भूमि अधिग्रहित की गई. 2010 में पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद निर्माण कार्य शुरू हुआ और हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए.
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार 2016 तक परियोजना पर 7,400 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो चुके थे. निर्माण भी काफी आगे बढ़ चुका था. लेकिन इसी दौरान लैंको समूह गंभीर वित्तीय संकट में फंस गया. 2018 में कंपनी के खिलाफ दिवालियापन प्रक्रिया शुरू हुई और 2019 में उसकी सहायक कंपनी लैंको बाबंध पावर लिमिटेड को भी परिसमापन में भेज दिया गया. संयंत्र कभी चालू नहीं हो सका.
परियोजना के रुकने से केवल जमीन गंवाने वाले किसान ही प्रभावित नहीं हुए. स्थानीय ठेकेदारों, मजदूरों और छोटे कारोबारियों ने भी भारी नुकसान उठाया. कई युवाओं को परियोजना में नौकरी मिली थी, जो काम बंद होते ही खत्म हो गई. स्थानीय संगठनों का दावा है कि करोड़ों रुपये का भुगतान आज भी बकाया है.
2021 में दिवालियापन प्रक्रिया के दौरान 887 एकड़ जमीन की नीलामी कर दी गई. यह जमीन सैफ्रन रिसोर्सेज प्राइवेट लिमिटेड को मिली. बाद में इस कंपनी का अधिग्रहण जेएसडब्ल्यू स्टील ने कर लिया. जनवरी 2026 में ओडिशा सरकार ने घोषणा की कि इसी स्थान पर जेएसडब्ल्यू स्टील और दक्षिण कोरियाई कंपनी पोस्को मिलकर 35,000 करोड़ रुपये का ग्रीनफील्ड स्टील प्लांट स्थापित करेंगे.
नई परियोजना की घोषणा ने पुराने सवाल फिर सामने ला दिए हैं. किसानों का कहना है कि जिन वादों के आधार पर जमीन ली गई थी, उनका क्या हुआ? यदि मूल परियोजना कभी पूरी नहीं हुई तो उनकी जमीन का भविष्य किसने तय किया और उन्हें उसका क्या लाभ मिला?
कई ग्रामीणों का आरोप है कि भूमि अधिग्रहण के समय सही मूल्यांकन नहीं किया गया. खेतों में मौजूद पेड़, कुएं, तालाब और अन्य परिसंपत्तियों को मुआवजे में पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. कुछ परिवारों ने आज तक मुआवजा स्वीकार नहीं किया है क्योंकि वे उसे अन्यायपूर्ण मानते हैं.
भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. ग्रामीण संगठनों का आरोप है कि दिवालियापन प्रक्रिया के दौरान जमीन अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेची गई, जबकि वर्तमान में उसकी कीमत कहीं अधिक है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन नीलामी से जुड़ी कई जानकारियां सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, जिससे विवाद और गहरा गया है.
इस बीच प्रस्तावित स्टील परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी सामने आ रही हैं. परियोजना स्थल ब्राह्मणी नदी के बेहद करीब स्थित है. स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले वर्षों में क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों के कारण प्रदूषण बढ़ा है. नदी के जल और वायु गुणवत्ता को लेकर पहले से ही चिंताएं जताई जाती रही हैं. ऐसे में एक और बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है.
कुछ मूल भूमि मालिक अब अदालतों का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं. उनका तर्क है कि जिस उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी, वह कभी पूरा नहीं हुआ. इसलिए भूमि और उससे जुड़े अधिकारों पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए. इस मुद्दे पर प्रशासन और किसानों के बीच बातचीत अभी जारी है.
रबी नारायण नायक जैसे किसानों के लिए यह केवल जमीन का मामला नहीं है. यह उस भरोसे का सवाल है जो उन्होंने सरकार और उद्योगों पर किया था. उनका कहना है कि जमीन चली गई, खेती खत्म हो गई, रोजगार नहीं मिला और अब वही जमीन एक नई परियोजना के लिए इस्तेमाल होने जा रही है.
ढेंकानाल की यह कहानी भारत में विकास परियोजनाओं से जुड़े एक बड़े सवाल को सामने लाती है. उद्योग और निवेश जरूरी हैं, लेकिन जब किसी परियोजना के लिए लोगों की जमीन ली जाती है तो क्या केवल मुआवजा पर्याप्त है? या फिर रोजगार, पुनर्वास और किए गए वादों की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है? कुरुंटी और खरगप्रसाद के किसानों के लिए यह सवाल आज भी अनुत्तरित है.
यह आयस्कांत दास और परांजॉय गुहा ठाकुरता के अंग्रेजी लेख का अनूदित अंश है. मूल लेख यहाँ पढ़ सकते हैं.

