सुप्रीम कोर्ट के जज ने राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के तबादले की मांग की, पूछा कि पक्षपात के स्पष्ट सबूतों के बावजूद सीजेआई ने अपीलों को ‘अनदेखा’ क्यों किया

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत को अगस्त में लिखे गए तीन पत्रों में सवाल उठाया गया है कि राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (एसीजे) संजीव प्रकाश शर्मा के पक्षपात के "स्पष्ट सबूतों" के बावजूद, उनके तबादले की "पुरजोर अपीलों" को "अनदेखा" क्यों किया गया है.

2 अगस्त को लिखे अपने पहले पत्र में, जस्टिस मेहता ने सीजेआई को अपने गृह हाईकोर्ट (राजस्थान) की "गंभीर और परेशान करने वाली स्थिति" के बारे में लिखा. इस पत्र में जस्टिस मेहता ने कहा कि कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश — जो 26 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं — में नेतृत्व के गुणों की पूरी तरह से कमी देखी गई है और उन्होंने एक से अधिक अवसरों पर संस्थान के शीर्ष पद के अनुचित व्यवहार का प्रदर्शन किया है.

‘द हिंदू’ में कृष्णदास राजगोपाल की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के जज ने सीजेआई को याद दिलाया कि वह वर्ष 2026 की शुरुआत से ही राजस्थान हाईकोर्ट में एक नियमित मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए "पुरजोर अपील" कर रहे थे. जस्टिस मेहता ने लिखा, "हालांकि, आज तक, मेरे गृह हाईकोर्ट में किसी अन्य राज्य से मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने के अनुरोध पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है."

उन्होंने कहा कि जस्टिस शर्मा के कार्यकाल के दौरान हाईकोर्ट के न्यायिक और प्रशासनिक दोनों पक्षों में कुप्रबंधन और धांधलियां हुई हैं.  सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि बिना किसी तर्कसंगत कारण के मामलों को अचानक वापस ले लिया गया और कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ में स्थानांतरित कर दिया गया. जस्टिस मेहता ने बताया कि शुरुआत में सीजेआई ने उनसे इन मामलों की सूची लिखित में देने को कहा था, लेकिन उसके तुरंत बाद ही उन्हें आश्वासन दिया गया कि लिखित में कुछ भी देने की आवश्यकता नहीं है और उचित कार्रवाई की जाएगी. 10 अगस्त के अगले पत्र में बताया गया है कि सीजेआई ने जस्टिस शर्मा से मामलों के स्थानांतरण पर जवाब मांगा था, लेकिन उस जवाब या इन मामलों के तथ्यों पर कोई विशिष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं थी.

शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के पत्रों में आगे कहा गया कि एसीजे की "व्यक्तिगत रंजिश" को पूरा करने के लिए न्यायिक अधिकारियों को बुलाया गया और उन्हें अपमानित किया गया. "पसंदीदा अधिवक्ताओं के एक बड़े समूह को वरिष्ठ का दर्जा देने के लिए" एक कार्य दिवस के दौरान फुल कोर्ट की बैठक आयोजित की गई. जस्टिस मेहता ने कहा कि हाईकोर्ट के लिए गेस्ट हाउस के रूप में काम करने के लिए लगभग 100 कमरों वाले बहुमंजिला टॉवर की एक काल्पनिक योजना बनाई गई, जिसे उन्होंने "जनता के पैसे की सरासर बर्बादी" कहा.

जस्टिस मेहता ने बताया कि उन्हें हाईकोर्ट के पीड़ित जजों से शिकायतें मिल रही हैं, जिन्होंने कहा कि उन्हें एसीजे द्वारा अक्सर तबादले सहित प्रतिशोधात्मक कार्रवाई की "धमकी दी जाती थी", जो सीजेआई के साथ अपनी "निकटता" का दावा करते थे.

जस्टिस मेहता ने कहा कि सीजेआई की पीठ ने हाल ही में अपने करियर के अंतिम दिनों में अनुचित लाभ या बाहरी कारणों से आदेश पारित करने वाले जजों के बढ़ते चलन पर टिप्पणी की थी. उन्होंने इसे सेवानिवृत्ति से पहले "छक्के मारने" के प्रयास करार दिया. एक पत्र में कहा गया, "यह वास्तव में विडंबनापूर्ण है कि एक तरफ भारत के मुख्य न्यायाधीश अपने करियर के अंतिम चरण में जजों द्वारा की जाने वाली भ्रष्ट प्रथाओं को रेखांकित कर रहे हैं, और दूसरी तरफ हमारे पास एक एसीजे हैं जो बेखौफ होकर इन्हीं गतिविधियों में लिप्त हैं."

17 अगस्त के अपने अंतिम पत्र में, जस्टिस मेहता ने एसीजे के खिलाफ "रामभरोसे चल रहे भाई-भतीजावाद और पक्षपात" जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि यह "समझ से बाहर" है कि एक ऐसे जज को "इतनी ढील" क्यों दी गई, जिनकी राजस्थान हाईकोर्ट में वापसी के अनुरोध को मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने स्वीकार नहीं किया था.

जस्टिस शर्मा, जिन्होंने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में सेवाएं दीं, को आखिरकार 26 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक में राजस्थान हाईकोर्ट में वापस भेजने की सिफारिश की गई थी. जस्टिस शर्मा को पिछले साल सितंबर में राजस्थान का कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया था. वह पिछले 10 महीनों से अधिक समय से इस पद पर बने हुए हैं.

जस्टिस मेहता ने सीजेआई को लिखा, "मैं आपसे बार-बार अनुरोध कर रहा हूं कि राजस्थान हाईकोर्ट में किसी अन्य राज्य से मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने का निर्णय लें ताकि इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति को रोका जा सके. मेरी राय में, अनुरोध की निरंतर अनदेखी करना पूरी तरह से संस्थान के हित के खिलाफ है."

एक मोड़ पर, शीर्ष अदालत के न्यायाधीश ने यह भी विचार किया कि क्या उनके पत्र को सार्वजनिक पटल पर रखने से "जानकारी का इनफ्लो (आगमन)" शुरू हो सकता है.

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