सरकार के खिलाफ नारेबाजी देशद्रोह का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं: हाई कोर्ट

पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एक निर्वाचित लोकतंत्र में सरकार या शासन के किसी भी अंग के खिलाफ नारेबाजी करना नागरिकों पर देशद्रोह (राजद्रोह) का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं होगा.

‘पीटीआई’ के अनुसार, हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार के खिलाफ नारा लगाना केवल असहमति व्यक्त करने का एक माध्यम है, न कि घृणा, अवमानना या दुर्भावना का प्रदर्शन. अदालत ने यह टिप्पणी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को बलात्कार के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद 2017 में हुई एक घटना के संबंध में कैथल के चार निवासियों को बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए की.

हाई कोर्ट ने कहा कि एक हिंसक विरोध प्रदर्शन दंगे की श्रेणी में आ सकता है, लेकिन हिंसा के ऐसे कृत्यों को सरकार के प्रति घृणा या अवमानना पैदा करने वाले कृत्य के रूप में नहीं देखा जाएगा.

यह प्राथमिकी 25 अगस्त 2017 को कैथल के कलायत पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए (देशद्रोह), 188 (लोक सेवक के आदेश की अवज्ञा), 120-बी (आपराधिक साजिश) और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई थी.  आरोप था कि पंचकुला की एक अदालत द्वारा गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी ठहराए जाने के बाद भड़की हिंसा में एक भीड़ ने हरियाणा के कैथल में एक बिजली कार्यालय में तोड़फोड़ की थी.

जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस सुखविंदर कौर की पीठ ने आरोपियों को धारा 124-ए (देशद्रोह) सहित आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत बरी करने वाले निचली अदालत के 23 सितंबर 2019 के फैसले को चुनौती देने वाली हरियाणा सरकार की अपील को खारिज कर दिया.

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