‘कॉकरोच जनता पार्टी’: एक व्यंग्य जो आंदोलन बन गया; अभिजीत डिपके कौन हैं?

16 मई 2026 को 30 वर्षीय अभिजीत डिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर एक गूगल फ़ॉर्म पोस्ट किया और लोगों को “कॉकरोच जनता पार्टी” में पंजीकरण के लिए आमंत्रित किया. यह व्यंग्यात्मक राजनीतिक संगठन भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की उस टिप्पणी के ठीक एक दिन बाद अस्तित्व में आया जिसमें उन्होंने बेरोज़गार युवाओं के लिए “कॉकरोच” शब्द का इस्तेमाल किया था — हालाँकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी उन लोगों के लिए थी जो नक़ली डिग्रियों के सहारे क़ानून और मीडिया जैसे पेशों में घुस रहे हैं, न कि बेरोज़गार युवाओं के लिए. लेकिन तब तक बात निकल चुकी थी. महज़ कुछ घंटों में अभिजीत को 5,000 से अधिक पंजीकरण मिल गए और 18 मई तक यह “झुंड” 50,000 से अधिक सदस्यों तक पहुँच गया.

अभिजीत इस वक़्त बोस्टन यूनिवर्सिटी में पब्लिक रिलेशंस में मास्टर्स कर रहे हैं. इससे पहले वे 2020 से 2023 तक आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम में स्वयंसेवक रहे हैं. द हिंदू से बात करते हुए उन्होंने कहा: “कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं के उस विरोध की अभिव्यक्ति है जो माननीय सीजेआई के उस बयान के ख़िलाफ़ है जिसमें उन्होंने युवाओं को कॉकरोच और परजीवी कहा. यह भारत जैसे लोकतंत्र में अस्वीकार्य है जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के सीजेआई — जो संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रक्षक माने जाते हैं — ने युवाओं को उनकी आलोचना के लिए अपमानित किया.” पार्टी के नाम की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा: “हम कॉकरोच की पहचान को अपनाते हैं — अगर युवाओं की आवाज़ सुनी जाए तो हम यही बनने को तैयार हैं. और कॉकरोच केवल सड़न और गंदगी में ही पनपते हैं — इसका मतलब है कि देश की व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि अब कॉकरोचों को बाहर आना पड़ रहा है.”

पार्टी का टैगलाइन है “आलसी और बेरोज़गारों की आवाज़” और यह उन लोगों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती है “जिन्हें व्यवस्था ने गिनना भूल दिया.” सदस्यता के चार मानदंड हैं — बेरोज़गार हो, आलसी हो, हर वक़्त ऑनलाइन रहता हो और पेशेवर तरीक़े से ग़ुस्सा निकाल सके. पार्टी की वेबसाइट पर लिखा है: “हम यहाँ एक और पीएम केयर्स बनाने, करदाताओं के पैसे पर दावोस में छुट्टियाँ मनाने, या भ्रष्टाचार को ‘रणनीतिक ख़र्च’ का नया नाम देने नहीं आए. हम यहाँ पूछने आए हैं — ज़ोर से, बार-बार, लिखकर — कि पैसा गया कहाँ.” पार्टी के पास शून्य प्रायोजक और पाँच माँगें हैं और यह ख़ुद को “एक बड़ा, ज़िद्दी झुंड” कहती है.

पाँच सूत्रीय घोषणापत्र लोकतंत्र की संस्थाओं पर निशाना साधता है: कैबिनेट के सभी पदों पर 50 प्रतिशत महिला आरक्षण; दलबदल करने वाले विधायकों और सांसदों पर 20 साल का प्रतिबंध; “गोदी मीडिया” एंकरों के बैंक खातों की जाँच; किसी भी वैध वोट के हटाए जाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त को यूएपीए के तहत गिरफ़्तारी; और किसी भी मुख्य न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा में नियुक्ति पर रोक. अभिजीत का कहना है कि पार्टी की वेबसाइट और डिज़ाइन का काम उनके क़रीबी दोस्तों की मदद से एआई के ज़रिए दो-तीन घंटों में हो गया. वे कहते हैं: “वैचारिक रूप से हम एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी, लोकतांत्रिक और जाति-विरोधी संगठन हैं. हमारी विचारधारा गाँधी, अंबेडकर और नेहरू से प्रेरित है.”

सीजेआई के स्पष्टीकरण को अभिजीत “उथला” मानते हैं और सवाल उठाते हैं: “क्या सीजेआई यह कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति शिक्षित नहीं है या जिसके पास डिग्री नहीं है, उसे व्यवस्था की आलोचना करने का अधिकार नहीं? क्या यह उस संविधान की भावना के ख़िलाफ़ नहीं जिसकी रक्षा की शपथ सीजेआई ने ली है? अगर न्यायपालिका आलोचकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सत्ताधारी दल की भाषा में जवाब देने लगे, तो यह लोगों के उन संदेहों को और पक्का कर देता है जो वे पहले से इस संस्था की निष्पक्षता के बारे में रखते हैं.”

द हिंदू की रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विशेषज्ञ अम्मु जोसेफ़ ने कहा: “सीजेआई द्वारा युवा भारतीयों के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों पर तेज़ और जायज़ सार्वजनिक प्रतिक्रिया देखकर अच्छा लगा. बहुत सारे विश्वसनीय समाचार संस्थानों ने उनकी खुली अदालत में की गई मौखिक टिप्पणी की रिपोर्ट की है — इसलिए ‘ग़लत उद्धरण’ का दावा ज़्यादा टिकता नहीं. सीजेआई की टिप्पणी न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान मामदानी के बारे में कुछ महीने पहले इस्तेमाल की गई भाषा की याद दिलाती है — उस मामले में एक रूढ़िवादी रेडियो होस्ट ने आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और प्रतिक्रिया के बाद उन्हें जल्दी माफ़ी माँगनी पड़ी. कॉकरोच जनता पार्टी का इतनी तेज़ी और स्पष्टता से — अपनी वेबसाइट, गान, घोषणापत्र समेत — अस्तित्व में आना साँस रोक देने वाला है. मैं इस पर नज़र ज़रूर रखूँगी.”

यह आंदोलन भारत को उस वैश्विक परंपरा से जोड़ता है जिसमें व्यंग्य और बेतुकेपन को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया है. 1960 के दशक में अमेरिका में हंटर एस. थॉम्पसन का फ़्रीक पावर आंदोलन और एबी हॉफमैन तथा जेरी रुबिन की यिप्पी पार्टी, 1980 के दशक में ब्रिटेन की ऑफ़िशियल मॉन्स्टर रेविंग लूनी पार्टी, कम्युनिस्ट पोलैंड में ऑरेंज अल्टरनेटिव आंदोलन, और 2000 के दशक में स्वीडन की पाइरेट पार्टी — सभी ने सत्ता-प्रतिष्ठान को व्यंग्य से चुनौती दी. अभिजीत के लिए कॉकरोच लचीलेपन का प्रतीक है. वे कहते हैं: “हम देश को इस सच्चाई से रू-ब-रू कराना चाहते हैं कि आज का युवा व्यवस्था में भरोसा खो रहा है क्योंकि यह व्यवस्था अब उनकी सेवा नहीं कर रही, उन्हें सुन नहीं रही, उन्हें देख भी नहीं रही. और जितनी देर तक व्यवस्था इसे नज़रअंदाज़ करेगी, यह निराशा उतनी ही बड़ी होती जाएगी. और हमें गर्व है कि हम कॉकरोच हैं.”

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