मोदी से जब नीदरलैंड्स में भी भारत सरकार के अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे बर्ताव पर सवाल हुए

नीदरलैंड्स यात्रा में प्रेस फ्रीडम और अल्पसंख्यक अधिकारों पर बवाल

द वायर के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 16-17 मई 2026 को नीदरलैंड्स की आधिकारिक यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर ले जाना था. सेमीकंडक्टर, हरित हाइड्रोजन, जल प्रबंधन और व्यापार समेत 17 समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए. लेकिन इस सफल दिखती यात्रा के बीच द हेग में एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया, जिसने मोदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि-प्रबंधन की रणनीति की पोल खोल दी.

डच प्रधानमंत्री रॉब जेटेन ने मोदी के कैट्शुइस — द हेग के बाहर स्थित डच पीएम के आधिकारिक आवास — पहुँचने से ठीक पहले स्थानीय पत्रकारों से कहा कि नीदरलैंड्स और यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देशों को भाजपा के नेतृत्व में भारत में हो रहे “घटनाक्रमों” पर गंभीर चिंताएँ हैं. उन्होंने ख़ासतौर पर प्रेस की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों — विशेषकर मुस्लिम समुदाय — के अधिकारों का उल्लेख किया और कहा कि ये अधिकार “भारी दबाव में हैं”. यही नहीं, जेटेन ने एक व्यक्तिगत मामले — इंसिया हेमानी — का भी ज़िक्र किया.

इसके बाद प्रमुख डच अख़बार डे फ़ॉल्क्सक्रांट के पत्रकार अश्वंत नंदराम ने भारतीय प्रतिनिधिमंडल की आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग में सीधे सवाल दागा. उन्होंने पूछा कि संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं हो रही, और साथ ही यह भी पूछा कि डच पीएम जेटेन के प्रेस फ्रीडम और अल्पसंख्यक अधिकारों संबंधी बयान पर भारत सरकार की क्या प्रतिक्रिया है.

जवाब में विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी (वेस्ट) सिबी जॉर्ज ने वह तर्क दोहराया जो मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आलोचनाओं के जवाब में अक्सर देती है. उन्होंने कहा: “हमें इस तरह के सवालों का सामना मूल रूप से इसलिए करना पड़ता है क्योंकि सवाल पूछने वाले व्यक्ति में समझ की कमी है.” उन्होंने भारत की 1.4 अरब की आबादी, बड़े पैमाने पर मतदान और 90 करोड़ स्मार्टफ़ोन वाले “शोरगुल भरे लोकतंत्र” का हवाला दिया. उन्होंने यह भी दावा किया कि आज़ादी के वक़्त 11 प्रतिशत रही अल्पसंख्यक आबादी अब 20 प्रतिशत से अधिक हो गई है, और भारत की 5000 साल पुरानी बहुलवादी विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यहाँ ईसाई, इस्लाम और यहूदी धर्म को ऐतिहासिक रूप से शरण मिली.

लेकिन जब डच अख़बार एनआरसी की पत्रकार मेरेल थी ने स्पष्ट किया कि यह कोई पत्रकार की निजी राय नहीं, बल्कि स्वयं डच प्रधानमंत्री का बयान था, तो सिबी जॉर्ज की स्क्रिप्ट लड़खड़ा गई. मेरेल थी ने पूछा: “आप जिस बात को मेरे सहयोगी की बात कह रहे थे, वे दरअसल हमारे प्रधानमंत्री को उद्धृत कर रहे थे जिन्होंने कहा था कि उन्हें भारत में अल्पसंख्यकों और प्रेस फ्रीडम की चिंता है. तो क्या आप परेशान होते हैं जब हमारे पीएम ऐसा कहते हैं?”

इस पर जॉर्ज का जवाब था: “मैंने वह बयान नहीं देखा है. मैं उस सवाल का जवाब दे रहा था जो उठाया गया था... मुझे लगता है मैंने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत कितना सुंदर देश है. धन्यवाद.” यानी, मेज़बान देश के प्रधानमंत्री के बयान से ही अनजान होने का दावा करते हुए उन्होंने इस कूटनीतिक असहजता से पल्ला झाड़ लिया.

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार यह पूरा वाकया इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि मोदी सरकार का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाला सार्वजनिक संबंध तंत्र एक स्वतंत्र प्रेस की निर्बाध पत्रकारिता के सामने कितना कमज़ोर साबित होता है. मोदी 12 से अधिक वर्षों के शासनकाल में खुली, बिना पूर्व तैयारी वाली द्विपक्षीय प्रेस कॉन्फ्रेंस से लगातार बचते रहे हैं. 2023 में व्हाइट हाउस ने जब मोदी और तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की घोषणा की तो वहाँ के एक अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया था कि यह “बड़ी बात” है क्योंकि मोदी मीडिया के सवाल लेने से कुख्यात रूप से बचते हैं — वह नवंबर 2015 में लंदन के बाद पहली खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस थी. उस अवसर पर वॉल स्ट्रीट जर्नल की पत्रकार सबरीना सिद्दीकी ने मोदी से अल्पसंख्यकों के अधिकारों और आलोचकों को चुप कराने पर सवाल पूछा था, जिसके बाद हिंदुत्व समर्थकों ने उन्हें जमकर ऑनलाइन प्रताड़ित किया और बाइडेन प्रशासन को इस उत्पीड़न की कड़ी निंदा करनी पड़ी. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा 30 अप्रैल 2026 को जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है.

Previous
Previous

ईरान युद्ध: ताज़ा घटनाक्रम — प्रस्ताव, धमकियाँ और होर्मुज़ पर नई लड़ाई

Next
Next

‘कॉकरोच जनता पार्टी’: एक व्यंग्य जो आंदोलन बन गया; अभिजीत डिपके कौन हैं?