तारिक रहमान का पहला विदेशी दौरा भारत को दरकिनार करता है?

बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान का पहला विदेश दौरा अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक रहा. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की परंपरा (जो विदेश दौरों की शुरुआत हमेशा भारत से करती थीं) के विपरीत, रहमान ने अपने पहले दौरे के लिए मलेशिया और चीन को चुना. भारत को तुरंत न चुनकर दरकिनार करने का यह निर्णय भारत-बांग्लादेश संबंधों में किसी 'दरार' का नहीं, बल्कि एक 'रीसेट' (पुनर्संतुलन) का संकेत है, जैसा कि सैयद मुनीर खसरू ने “द इंडियन एक्सप्रेस” में लिखा है.

लेखक के मुताबिक, रहमान की मलेशिया यात्रा एक व्यावहारिक और आर्थिक आवश्यकताओं से प्रेरित कदम थी. बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक विदेशी प्रेषित धन (रेमिटेंस) और रोजगार पर निर्भर है (उदाहरण स्वरूप, मई में देश को $3.43 बिलियन का रेमिटेंस मिला). मलेशियाई प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम के साथ बैठक में रहमान ने श्रम बाजार को फिर से खोलने, अनधिकृत बांग्लादेशी श्रमिकों को नियमित करने और बिचौलियों पर अंकुश लगाने की मांग की. इसके अतिरिक्त, दोनों देश 2027 तक 'मुक्त व्यापार समझौते' पर काम कर रहे हैं.  

चीन की यात्रा एक दीर्घकालिक रणनीतिक कदम थी. राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई बैठक में 15 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) और 16-बिंदुओं वाले संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर किए गए. वर्तमान में चीन का बांग्लादेश में $7.7 बिलियन का निवेश है. इस यात्रा के दौरान चटगाँव चीनी आर्थिक क्षेत्र, मोंगला बंदरगाह के आधुनिकीकरण, तीस्ता नदी प्रबंधन और 'बेल्ट एंड रोड' पहल के तहत सहयोग बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया.

चीन के साथ बढ़ते सहयोग को भारत के विरोध के रूप में देखना गलत होगा. भौगोलिक, सांस्कृतिक और सुरक्षा की दृष्टि से भारत, बांग्लादेश का सबसे महत्वपूर्ण और अपरिहार्य पड़ोसी बना हुआ है. भारत को पहले न चुनकर रहमान केवल यह संदेश देना चाहते हैं कि बांग्लादेश भविष्य में अधिक बातचीत की शक्ति (बारगेनिंग पावर) के साथ भारत से जुड़ेगा. भारत द्वारा रहमान को सितंबर में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का निमंत्रण देना इस दिशा में सकारात्मक संकेत है.

रहमान की यह कूटनीति "बांग्लादेश फर्स्ट" (बांग्लादेश सबसे पहले) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका उद्देश्य देश को निर्भरता से निकालकर स्वायत्त विकल्पों की ओर ले जाना है.

हालाँकि, इस नीति की असली परीक्षा इसके सफल क्रियान्वयन में है. मसलन, चीन से कर्ज के जाल में फंसे बिना अवसंरचनात्मक निवेश हासिल करना और भारत के साथ नदी जल बंटवारे और सीमा सुरक्षा जैसे विवादों का शांतिपूर्ण व परस्पर विश्वास के साथ समाधान करना.

संक्षेप में, भारत को नकारा नहीं गया है, बल्कि केवल प्राथमिकता के क्रम में थोड़ा स्थगित किया गया है ताकि बांग्लादेश अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर विदेश नीति तय कर सके. रहमान बांग्लादेशी कूटनीति के लिए एक नया सिद्धांत लिखने की कोशिश कर रहे हैं—एक ऐसा सिद्धांत जो किसी राजधानी के प्रति वफादारी से नहीं, बल्कि बांग्लादेश के अपने राष्ट्रीय हित से शुरू होता है.

लेखक अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक, 'द इंस्टीट्यूट फॉर पॉलिसी, एडवोकेसी एंड गवर्नेंस' (आईपीएजी) के अध्यक्ष हैं.

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