“ज्ञानू, अब बहुत हो गया, ब्रो!”: भारत में हो रहे विद्रोह मोदी की अजेयता के आभा-मंडल में सुराख कर रहे हैं
‘अलजज़ीरा’ में विद्या कृष्णन ने लिखा है कि इस अक्टूबर भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा दिखाई दे रहा है जहाँ देश के कोने-कोने से असंतोष की अनगिनत धाराएँ मिलकर एक विशाल जनांदोलन का रूप ले रही हैं. देश की सड़कों पर 'लाखों विद्रोह' एक साथ आकार ले रहे हैं. महात्मा गांधी की 157वीं जयंती के अवसर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के समर्थकों ने अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन का पुनराभ्यास करते हुए सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया. वातावरण में एक अजीब सी ऊर्जा और उत्सव जैसा माहौल था—चारों ओर युवाओं की भीड़, मार्च करती छात्राएं और कंधे से कंधा मिलाकर चलते नवयुवक, जो हवा में मुट्ठियाँ लहराते हुए नारे लगा रहे थे: "ज्ञानू, अब बहुत हो गया, ब्रो!"
प्रदर्शनकारियों के इस तेवर में सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि वे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार—उर्फ 'ज्ञानू'—के बारे में अभी से भूतकाल में बात कर रहे हैं. इस बात की परवाह किए बिना कि इस व्यवस्था के ढहने के बाद कौन-सी नई प्रणाली या चेहरा सामने आएगा, आंदोलनकारियों का पूरा ध्यान एक ही स्पष्ट और तीखे लक्ष्य पर केंद्रित है: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर करने के आरोपी मुख्य चुनाव आयुक्त का तत्काल इस्तीफा.
असंतोष का चौतरफा उभार: दिल्ली से मुंबई और पुणे तक
यह आक्रोश केवल चुनाव आयोग तक सीमित नहीं है; यह एक साथ कई मोर्चों पर फूट पड़ा है. दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में खुद को पुलिस अधिकारी बताकर तीन पुरुषों द्वारा 17 वर्षीय नाबालिग के साथ किए गए कथित सामूहिक दुष्कर्म ने राजधानी की महिलाओं और क्वीर समुदाय के युवाओं को सड़कों पर ला खड़ा किया है. सुरक्षा का आश्वासन देने वाली व्यवस्था ही जब भक्षक बनने लगे, तो यह गुस्सा स्वाभाविक है.
वहीं, देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में आईआईटी बॉम्बे के बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या के बाद उसके माता-पिता अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं. उनका गंभीर आरोप है कि उनके बेटे को संस्थान के उच्च-जातीय शिक्षकों द्वारा जातिगत उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा. वे जिम्मेदार अध्यापकों की गिरफ्तारी की मांग कर रहे हैं.
थोड़ा आगे पुणे में देखें, तो महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग के हजारों अभ्यर्थी पारदर्शी चयन प्रक्रिया, परीक्षाओं में धांधली और परिणामों में देरी के खिलाफ अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग को लेकर उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं.
जो नागरिक सीधे सड़कों पर नहीं उतरे हैं, वे भी डिजिटल दुनिया के जरिए अपने फोन और लैपटॉप स्क्रीन से बंधे हुए हैं. सोशल मीडिया पर पल-पल बदलती लहरें कभी जनता में आशा का संचार करती हैं, तो कभी घोर निराशा, संशय और तीव्र आक्रोश को जन्म देती हैं.
जेन-ज़ी का उभार और संस्थागत नियंत्रण का संकट
इन अलग-अलग आंदोलनों का एक ही समय पर उभरना केंद्र सरकार के लिए एक अप्रत्याशित और गंभीर चुनौती बन गया है. इसने बिखरी हुई जेन-ज़ी पीढ़ी को एक साझा मंच प्रदान किया है, जिसने विपक्ष को भी एक राष्ट्रीय शक्ति के रूप में नए सिरे से संगठित होने का अवसर दे दिया है. छोटे-छोटे स्थानीय मुद्दों से शुरू हुए ये असंतोष अब मिलकर एक विशाल, सुसंगत और स्पष्ट आंदोलन में तब्दील हो चुके हैं, जिसे केवल बलपूर्वक दबाना सरकार के लिए नामुमकिन साबित हो रहा है.
विडंबना यह है कि गांधी जयंती जैसे पावन अवसर पर नई दिल्ली और मुंबई के प्रमुख हिस्सों को भारी पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों के हवाले कर पूरी तरह सील कर दिया गया. जंतर-मंतर की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड्स लगा दिए गए और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया. जो शासन कभी अपनी लोकप्रियता और विकास के नैरेटिव के बल पर चलता था, वह आज पुलिसिया घेराबंदी और दंगा-रोधी वाहनों के भरोसे खड़ा दिख रहा है.
लंबे समय तक मोदी का राजनीतिक मॉडल इस धारणा पर आधारित रहा कि जनता शासन के अधीन है, न कि शासन जनता के. जब तक उनकी लोकप्रियता चरम पर थी, यह मॉडल चला—चाहे वह नोटबंदी के समय एटीएम की लंबी लाइनें हों, बिना पूर्व सूचना के लगाया गया सख्त लॉकडाउन हो, या फिर अनुच्छेद 370 का निरसन. लेकिन 2024 के आम चुनावों के बाद स्थितियाँ बदल चुकी हैं.
संस्थागत छत्रछाया और संवैधानिक सुरक्षा कवच के बावजूद, अब वह दौर समाप्त हो चुका है जहाँ बिना किसी राजनीतिक और सामाजिक परिणाम के निर्णय थोपे जा सकते थे. न तो अब 2014 जैसा प्रचंड बहुमत है, और न ही मीडिया, न्यायपालिका या चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं बची हैं जो जनता के इस सीधे आक्रोश को सरकार तक पहुँचने से रोक सकें.
बदलते समीकरण और भविष्य की रूपरेखा
जुलाई में जब छात्रों के तीव्र विरोध के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा था, तभी से इस सत्तावादी आभामंडल में पहली बार गंभीर दरारें दिखाई दी थीं. इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और युवाओं के लगातार उपहास ने उस आभा को छिन्न-भिन्न कर दिया है जो कभी अजेय मानी जाती थी. इतिहास लिखेगा कि इस व्यवस्था में पहला बड़ा पतन किसी राजनीतिक दल की चुनावी जीत से नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं के इस विश्वास से शुरू हुआ कि "बदलाव संभव है."
अक्टूबर का यह पूरा महीना इस नए राजनीतिक संघर्ष का गवाह बनने जा रहा है. विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मतपत्रों की ओर लौटने की मांग तेज कर दी है. उनका कहना है कि ईवीएम ने चुनावी प्रक्रिया को संदिग्ध बना दिया है. विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग पर तीखे हमले इस बात का संकेत हैं कि आने वाले दिन और अधिक कड़वाहट भरे होंगे.
दूसरी ओर, सरकार भी आसानी से झुकने के मूड में नहीं है. एक तरफ राजघाट पर पुष्पांजलि और दूसरी तरफ सड़कों पर कर्फ्यू, निवारक हिरासत और जन-सभाओं पर प्रतिबंध—यह वही औपनिवेशिक तंत्र है जिसके खिलाफ महात्मा गांधी ने जीवन भर संघर्ष किया था.
लेकिन सत्ता बल प्रयोग से सड़कों को तो खाली करा सकती है, प्रदर्शनकारियों को जेल में डाल सकती है और तख्तियाँ छीन सकती है; परंतु वह अनिश्चितकाल के लिए देश के नागरिकों को यह मानने पर मजबूर नहीं कर सकती कि केवल शक्तिशाली होना ही वैध होने का प्रमाण है.
थके हुए लोकतंत्र और चरमराती संस्थाओं के बीच, देश के युवाओं का यह संगठित और बेपरवाह उभार भारतीय राजनीति में एक नई सुबह की आहट है. यह आंदोलन न तो किसी रोमांटिक परिकल्पना की उपज है और न ही इसे किसी सीमित परिभाषा में बांधा जा सकता है. यह एक जीवंत, निरंतर विकसित होता और 'अधूरा' संघर्ष है—जो अपनी कहानी खुद लिख रहा है.
(यह विद्या कृष्णन की हिंदी में अनूदित व संपादित रिपोर्ट है)

