भारत में हिंदू राष्ट्रवादी 'डीप स्टेट' का निर्माण: लोकतंत्र के खिलाफ स्वयंभू निगरानी तंत्र
भारत में हिंदुत्व की राजनीति केवल चुनावी सत्ता तक सीमित नहीं है. राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जाफ्रेलो के विश्लेषण के अनुसार, देश में हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों, स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं, पुलिस और न्यायिक संस्थानों के बीच बढ़ते संबंधों ने एक ऐसे 'डीप स्टेट' की स्थिति पैदा की है, जिसमें औपचारिक राज्य व्यवस्था के साथ गैर-राज्य संगठन भी शासन और सामाजिक नियंत्रण में भूमिका निभाने लगते हैं. इस व्यवस्था को समझने के लिए जाफ्रेलो खास तौर पर आरएसएस, बजरंग दल और गो-रक्षा तथा 'लव जिहाद' विरोधी अभियानों का अध्ययन करते हैं.
जाफ्रेलो के मुताबिक, विजिलेंटिज्म यानी स्वयंभू कानून लागू करने की प्रवृत्ति केवल अचानक होने वाली भीड़ हिंसा नहीं है. यह सामाजिक और धार्मिक मानदंडों को लागू करने की एक नियमित प्रक्रिया भी हो सकती है. ऐसे समूह कानून से बाहर जाकर कार्रवाई करते हैं, लेकिन अपनी गतिविधियों को नैतिकता, धर्म और समुदाय की रक्षा के नाम पर वैध ठहराते हैं. इस प्रक्रिया में राज्य की मौन या सक्रिय सहमति उनके लिए महत्वपूर्ण होती है.
लेख आरएसएस की स्थापना और उसके शुरुआती संगठनात्मक ढांचे को इस प्रक्रिया की पृष्ठभूमि के रूप में देखता है. 1925 में स्थापित आरएसएस ने सत्ता हासिल करने के बजाय समाज के भीतर अपना प्रभाव बढ़ाने पर जोर दिया. शाखाओं के माध्यम से अनुशासन, शारीरिक प्रशिक्षण और वैचारिक शिक्षा का नेटवर्क तैयार किया गया. जाफ्रेलो का तर्क है कि यह संगठनात्मक ढांचा सामाजिक नियंत्रण और सांस्कृतिक पुलिसिंग की दिशा में काम करता रहा. आरएसएस ने स्वयं हिंसा का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम किया, लेकिन उसके सहयोगी संगठनों ने कई मौकों पर बल प्रयोग की भूमिका निभाई.
इनमें बजरंग दल प्रमुख है. 1984 में विश्व हिंदू परिषद की युवा शाखा के रूप में बना बजरंग दल बाद में गो-रक्षा, 'घर वापसी' और 'लव जिहाद' विरोधी अभियानों में सक्रिय रहा. लेख के अनुसार, इन अभियानों का निशाना मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय रहा है. गो-रक्षा के नाम पर हिंसा, अंतरधार्मिक संबंधों का विरोध और धार्मिक पहचान के आधार पर सामाजिक निगरानी इसके प्रमुख रूप रहे हैं. जाफ्रेलो के अनुसार, इन गतिविधियों को सोशल मीडिया पर प्रचारित करना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कार्यकर्ताओं के बीच प्रतिष्ठा और 'सामुदायिक रक्षक' होने की भावना मजबूत होती है.
लेख में यह भी तर्क दिया गया है कि इन गतिविधियों को केवल स्वतःस्फूर्त भीड़ प्रतिक्रिया मानना पर्याप्त नहीं है. लेखक के अनुसार, कई मामलों में हिंसा करने वाले कार्यकर्ता पहले से संगठित और प्रशिक्षित होते हैं. इस तरह की हिंसा हिंदुत्ववादी सामाजिक नियंत्रण की व्यापक परियोजना का हिस्सा बन जाती है. इसका उद्देश्य केवल किसी एक व्यक्ति या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि समाज में एक विशेष नैतिक और धार्मिक व्यवस्था स्थापित करना भी है.
जाफ्रेलो का सबसे महत्वपूर्ण तर्क राज्य और इन संगठनों के बीच बढ़ते संबंध को लेकर है. भाजपा के सत्ता में आने के बाद कई राज्यों में पुलिस और हिंदुत्ववादी संगठनों के बीच सहयोग के उदाहरण सामने आए. हरियाणा के गो-रक्षा नेटवर्क का उदाहरण देते हुए लेख बताता है कि कुछ मामलों में स्वयंसेवी समूह संदिग्ध वाहनों की निगरानी करते और पुलिस को सूचना देते थे. कुछ स्थानों पर गो-रक्षा संगठनों से जुड़े लोगों को सरकारी संस्थानों में औपचारिक भूमिकाएं भी मिलीं. इससे राज्य और गैर-राज्य कार्यकर्ताओं के बीच की सीमा धुंधली होने लगी.
लेख पुलिस से आगे न्यायिक व्यवस्था के स्थानीय स्तर तक भी पहुंचता है. 'लव जिहाद' और अंतरजातीय विवाह के मामलों में हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा सूचना नेटवर्क बनाने और पुलिस तथा अदालतों से संपर्क रखने के उदाहरणों का उल्लेख किया गया है. जाफ्रेलो के अनुसार, जब सामाजिक संगठन पुलिस, प्रशासन और न्यायिक तंत्र के भीतर अपने संपर्क विकसित कर लेते हैं, तब राज्य की संस्थाएं औपचारिक रूप से स्वतंत्र होते हुए भी राजनीतिक-सामाजिक दबाव से प्रभावित हो सकती हैं.
यहीं से लेखक 'विजिलेंट स्टेट' की अवधारणा सामने रखते हैं. यह ऐसा राज्य है जिसमें आधिकारिक संस्थाएं और अनौपचारिक कार्यकर्ता एक-दूसरे के साथ मिलकर शासन की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं. जाफ्रेलो के अनुसार, आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की ताकत केवल चुनावी जीत में नहीं, बल्कि समाज के भीतर बने उस व्यापक नेटवर्क में है जो राजनीतिक सत्ता से बाहर भी प्रभाव बनाए रख सकता है.
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र और कानून के शासन को लेकर है. यदि स्वयंभू समूह धार्मिक या बहुसंख्यक भावना के नाम पर कानून से ऊपर होने का दावा करने लगें और पुलिस या प्रशासन उनके साथ सहयोग करने लगे, तो कानून की समानता कमजोर होती है. इससे अल्पसंख्यकों के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता दोनों प्रभावित हो सकते हैं. साथ ही, चुनाव में सरकार बदलने के बावजूद समाज के भीतर मौजूद संगठित नेटवर्क अपनी शक्ति बनाए रख सकते हैं.
जाफ्रेलो के अनुसार, यही 'डीप स्टेट' की विशेषता है. इसका प्रभाव केवल सत्ता में मौजूद सरकार पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि समाज, नौकरशाही, पुलिस और स्थानीय संस्थानों के भीतर मौजूद नेटवर्क के जरिए लगातार बना रह सकता है. इसलिए किसी चुनाव में सत्ता परिवर्तन अपने आप इस व्यवस्था को समाप्त नहीं करता.
अंततः लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि हिंदुत्ववादी विजिलेंटिज्म को केवल कानून-व्यवस्था की कुछ अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसे समाज पर नियंत्रण, धार्मिक बहुसंख्यकवाद और राज्य संस्थानों के साथ बढ़ते संबंधों की व्यापक प्रक्रिया के रूप में समझने की जरूरत है. यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और कानून का शासन कमजोर होता है, तो चुनावी लोकतंत्र मौजूद रहते हुए भी बहुसंख्यकवादी शक्ति राज्य और समाज दोनों में गहरी पैठ बना सकती है.
यह क्रिस्टोफ जाफ्रेलो के शोध का हिंदी अनूदित अंश है. मूल शोध अंग्रेजी में यहां पढ़ सकते हैं.

