आकार पटेल | हम ग़रीब और अप्रासंगिक बने रहेंगे, इस बात से संतुष्ट कि हमारे अल्पसंख्यकों का हाल हमसे भी बुरा है
इस हफ़्ते एक विदेशी आउटलेट ने मेरा इंटरव्यू लिया. बात ख़त्म होने के बाद इंटरव्यू लेने वाले ने कहा कि वह हैरान है . उसे अंदाज़ा ही नहीं था कि भारत इस हाल में पहुँच चुका है. मुझे लगता है, यह काफ़ी आम प्रतिक्रिया है. भारत पर काम करने वाले शिक्षाविदों और यहाँ तैनात विदेशी संवाददाताओं को छोड़ दें तो बहुत कम लोग समझ पाते हैं कि भारत अपनी पुरानी छवि से कितना दूर आ चुका है.
मैं संक्षेप में बता देता हूँ कि उस इंटरव्यू में मुझसे क्या पूछा गया और मैंने क्या जवाब दिए, ताकि आपको अंदाज़ा हो सके कि सामने वाले ने क्या समझा. आप इसे अपने इस आकलन से भी मिलाकर देख सकते हैं कि आज भारत कहाँ खड़ा है.
सबसे पहले वह हिंदुत्व को समझना चाहता था — इसकी उत्पत्ति, इसकी वैचारिक नींव, और यह कि एक धर्म के तौर पर हिंदू धर्म से यह कैसे अलग है. मैंने बताया कि हिंदुत्व 'हिंदू' और 'त्व' से मिलकर बना है, यानी हिंदूपन. यह शब्द एक सदी पहले सावरकर की किताब में इस्तेमाल हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि 'इंडिया' और 'हिंदू' उसी मूल से आए हैं जिससे 'इंडस' और 'सिंधु'. उनका मानना था कि कोई व्यक्ति हिंदू — और इसी नाते भारतीय — तभी हो सकता है जब उसके पवित्र स्थल भारत में हों, यरूशलम या मक्का या कहीं और नहीं.
दूसरे हिस्से के जवाब में मैंने कहा कि हिंदू धर्म एक धर्म है और उसका वास्ता आपकी अपनी आस्था से है: भगवान, प्रार्थना, व्रत, त्योहार. हिंदुत्व का वास्ता दूसरे की आस्था से है — इससे कि वे क्या नहीं खा सकते, कहाँ प्रार्थना नहीं कर सकते, किससे मुहब्बत नहीं कर सकते और कहाँ रह नहीं सकते.
फिर उसने पूछा कि भारतीय राजनीति में, ख़ासकर बीजेपी के उभार के ज़रिए, हिंदुत्व इतनी तेज़ी से असरदार कैसे हो गया. मैंने कहा कि पार्टी 1951 में बनी, लेकिन चार दशक तक राष्ट्रीय स्तर पर बीजेएस/बीजेपी का वोट शेयर इकाई अंकों में ही रहा और 1990 तक उसने बिना गठबंधन के एक भी राज्य नहीं जीता. इन तमाम बरसों में पार्टी को यही नहीं सूझ रहा था कि लामबंदी किस मुद्दे पर की जाए. जिस चीज़ ने उसे लोकप्रिय बनाया और उसका वोट शेयर दोगुना करके 18% तक पहुँचाया, वह था अयोध्या में मस्जिद का विध्वंस. जिस हिंसा ने बीजेपी को शिखर की तरफ़ धकेला, उसमें क़रीब 3,000 भारतीय मारे गए. दो और माँगों — कश्मीर के मुसलमानों से उनकी संवैधानिक स्वायत्तता छीनने और उनका पर्सनल लॉ ख़त्म करने — ने इस मुद्दे को लगातार गरम रखा.
फिर वह इस पर बात करना चाहता था कि हिंदुत्व ने भारत के राजनीतिक संस्थानों और कुल राजनीतिक माहौल को कैसे बदला है, जिसमें धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ होने वाला सुलूक भी शामिल है. यहाँ आँकड़े रखने के अलावा कुछ किया ही नहीं जा सकता था — वही आँकड़े जो हमारी सत्ताधारी पार्टी के पूरे बहिष्कार को दिखाते हैं, चाहे उसके मंत्री हों, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य हों, या उसके राज्य विधायक.
गोमांस रखने को अपराध बनाने वाले क़ानून 2015 में आए, जिनके साथ गोमांस के नाम पर लिंचिंग शुरू हुई. अंतरधार्मिक विवाह को अपराध बनाने वाले क़ानून 2018 में आए. सबूत का बोझ उलट दिए जाने और अपराध की पूर्वधारणा के बारे में जानकर वह भौंचक्का रह गया. उसने पूछा, यह सब होते हुए आप ख़ुद को लोकतंत्र कैसे कह सकते हैं. मैंने कंधे उचका दिए.
फिर उसने हिंदुत्व की राजनीति को सामान्य बना देने में प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल किया, और यह भी कि यह राजनीतिक परियोजना चुनावी तौर पर कामयाब क्यों रही. मैंने कहा कि मोदी अपने से पहले के बीजेपी नेताओं के मुक़ाबले हिंदुत्व की वकालत को लेकर कहीं ज़्यादा खुले और साफ़ रहे हैं. इससे वे अपने समर्थकों के बीच लोकप्रिय हुए और बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर 38% तक पहुँची, जहाँ वह अब भी टिकी हुई है.
मैंने यह भी कहा कि बीजेपी क़ानून और नीति के ज़रिए स्थायी ध्रुवीकरण को लेकर उत्साहित रही है. (मैंने बुलडोज़र और उचित प्रक्रिया की ग़ैरहाज़िरी का ज़िक्र किया, और वह सन्न रह गया.)
फिर उसने पूछा कि हिंदुत्व ने भारत के मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों पर क्या असर डाला है, और क्या बहुसंख्यकवादी राजनीति के उभार से यह बदल रहा है कि अल्पसंख्यक भारतीय राज्य के भीतर अपनी जगह को किस तरह देखते हैं. मैंने जितना बेहतर हो सकता था, उतना जवाब दिया. सबसे अहम बात यह थी कि भारत के अल्पसंख्यकों की कुल आबादी पश्चिमी यूरोप की आबादी से ज़्यादा है.
भारत की सरहदों के पार हिंदुत्व के बारे में पूछे जाने पर मैंने उसे बताया कि फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ अपनी कार्रवाइयों को सही ठहराने की नौबत आने पर इज़राइल हमें अपने भरोसेमंद दोस्त और साझीदार के तौर पर पेश करता है.
मैंने कहा कि 2014 के बाद हमारी महत्वाकांक्षा वैश्विक से सिमटकर क्षेत्रीय हो गई है और अब हमारा जुनून पड़ोसियों से बेहतर साबित होने का है. चीन से मुक़ाबला हमने छोड़ दिया है. मैंने उसे अर्थव्यवस्था के आँकड़े दिए और 1991 के बाद की तस्वीर बताई.
उसने पूछा: क्या बीजेपी नेताओं को वह नुक़सान दिखाई नहीं देता जो वे कर रहे हैं? मैंने कहा कि मेरे अनुभव में वे अपनी विचारधारा पर सच्चे मन से यक़ीन करते हैं. उनके लिए यह किसी लक्ष्य तक पहुँचने का ज़रिया नहीं, ख़ुद में ही एक लक्ष्य है. यही वजह है कि बहिष्कार और उत्पीड़न की शक्ल में जो कुछ हो रहा है, वह नतीजा चाहे जो निकले, चलता रहेगा.
आख़िर में उसने कहा कि आगे की तरफ़ देखिए और भारत के भविष्य पर बात कीजिए — क्या देश बहुसंख्यकवादी राजनीति से पीछे लौट सकता है, विपक्ष और भारत के लोकतांत्रिक संस्थान इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं, और क्या भारत की बहुलतावादी परंपरा हिंदुत्व के बढ़ते असर का सामना कर सकती है.
मैंने कहा कि हमारी स्वाभाविक स्थिति बहुलतावाद की रही है और समाज मोटे तौर पर हमारी सरकार की विचारधारा का आईना नहीं है. लेकिन इतने बरसों तक ऊपर से नीचे थोपे जाने का मतलब यह हुआ कि यह विचारधारा संस्थानों और समाज में रच-बस गई है, और पार्टी के सत्ता से हटने के बाद भी बनी रहेगी.
जहाँ तक भविष्य का सवाल है, वह अंधकारमय है. आधे अरब लोग जिस ग़रीबी में आज भी हैं, उससे उन्हें कैसे बाहर निकाला जाए, इसका हमारे पास कोई ख़ाका नहीं है. इससे भी अहम यह कि अब हम इस पर किसी जल्दबाज़ी के साथ बात तक नहीं करते, न ही यह हमारे यहाँ की राजनीति का बुनियादी आधार है. हम ग़रीब और अप्रासंगिक बने रहेंगे — इस बात से संतुष्ट कि हमारे अल्पसंख्यकों का हाल हमसे भी बुरा है.

