'कॉकरोच' पलटकर लड़ रहे हैं: बॉस्टन के एक कमरे से दिल्ली की सड़कों तक

तीस साल के अभिजीत दीपके बॉस्टन में रहने वाले एक ताज़ा पोस्ट-ग्रैजुएट हैं. उनकी योजना भारत में कोई युवा आंदोलन खड़ा करने की कभी नहीं थी. न्यूयॉर्क टाइम्स के ओपिनियन वीडियो में वे ख़ुद बताते हैं कि वे बॉस्टन के अपने कमरे में बैठे रहने वाले एक अंतर्मुखी आदमी थे और दिमाग़ में बस दो चीज़ें थीं. नौकरी और एजुकेशन लोन की अदायगी.

मोड़ तब आया जब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोज़गार नौजवानों के एक हिस्से को 'कॉकरोच' कहा — ऐसे नौजवान जिन्हें रोज़गार नहीं मिलता और जिनके लिए किसी पेशे में कोई जगह नहीं. दीपके ने एक्स पर लिखा कि क्या हो अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएँ. पोस्ट वायरल हो गई. पाँच दिन के भीतर उनके साथ एक करोड़ लोग जुड़ चुके थे. यानी देश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी से भी ज़्यादा. दीपके कहते हैं कि उन्होंने सिर पकड़ लिया कि अब करें क्या. दो महीने में यह संख्या लगभग 2.6 करोड़ तक पहुँच गई.

इसी से 'कॉकरोच जनता पार्टी' बनी युवाओं की अगुवाई वाला एक राजनीतिक आंदोलन. इसका फ़ौरी कारण था लाखों छात्रों की दी हुई राष्ट्रीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा का नतीजा सरकार द्वारा रद्द कर दिया जाना, क्योंकि पेपर लीक होने के आरोप लगे थे. रिपोर्टों के मुताबिक़ इस विवाद के बाद 20 से ज़्यादा परीक्षार्थियों ने अपनी जान दे दी. बहुत से नौजवानों के लिए यह उस शिक्षा व्यवस्था का एक और सबूत था जिसमें मेहनत का बदला अवसर के रूप में नहीं मिलता. आंदोलन बढ़ा तो माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े तक पहुँच गई, और ग़ुस्सा पूरी व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक सामूहिक ग़ुस्से में बदल गया.

वीडियो में दीपके अपने तीन सबक़ बताते हैं.

पहला - क़िस्मत और सही वक़्त ज़रूरी है. वे अमेरिका में बैठे थे, फिर भी उन्होंने फ़ौरन प्रतिक्रिया दी. वे कहते हैं कि भारत का नौजवान महसूस करता है कि सरकार में बैठे लोग उसे ख़ारिज कर रहे हैं और हर रात हिंदू-मुसलमान की बहस के ज़रिए साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति कर रहे हैं, जबकि असली मुद्दे पीछे धकेल दिए गए हैं. लेकिन जेन ज़ी मुखर है और कम पर राज़ी नहीं होती.

दूसरा सबक़ - हिम्मत. सरकार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रही थी. दीपके पूछते हैं कि महज़ राजनीतिक व्यंग्य के इस्तेमाल पर उनकी अपनी सरकार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा का ख़तरा कैसे कह सकती है. उन्होंने भारत लौटने का फ़ैसला किया. वकील ने कहा कि यह पागलपन है, अभी मत लौटिए. जिन पत्रकारों से उन्होंने बात की, उन्होंने कहा कि जिस दिन उतरेंगे, जेल में होंगे. माँ को बताया तो वे टूट गईं; दीपके ने उनसे कहा कि ख़तरा है, मगर यह ख़तरा उठाने लायक़ है. जहाज़ से हिमालय दिखा तो उन्हें लगा कि शायद यह आख़िरी बार है जब वे खुला आसमान देख रहे हैं.

हवाई अड्डे पर उतरते ही विमान में एक ख़ास घोषणा हुई और उन्हें समझ आ गया कि अधिकारी उन्हें लेने आए हैं. अधिकारियों ने कहा कि वे गिरफ़्तार करने नहीं आए, बस प्रदर्शन की अनुमति माँगने वाले एक पत्र पर दस्तख़त कर दीजिए. वकील ने कहा कि यह जाल है. दीपके ने दस्तख़त से इनकार कर दिया और 15-20 पुलिसकर्मियों से घिरे उसी कमरे में बैठकर अपना पत्र लिखा कि वे भारत के नागरिक हैं, प्रदर्शन उनका लोकतांत्रिक और मौलिक अधिकार है, इसलिए अनुमति दी जाए; और अगर हस्तलिखित पत्र मंज़ूर नहीं है तो वे यहीं से गिरफ़्तार करने के लिए स्वतंत्र हैं. जवाब मिला - आप जा सकते हैं.

हवाई अड्डे से वे सीधे धरनास्थल पहुँचे. हर कोई कह रहा था कि इस्तीफ़ा नहीं होगा, यह सरकार किसी की नहीं सुनती. दीपके कहते हैं कि उन्होंने ख़ुद से कहा कि नतीजे के बारे में मत सोचो; इस्तीफ़ा होगा या नहीं, यह उनके हाथ में नहीं, लड़ना उनके हाथ में है.

तीसरा सबक़ - ज़िद. आंदोलनकारी 36 दिन से ज़्यादा धरनास्थल पर जमे रहे. शुरू में लगभग 200 लोग आ रहे थे; बाद के दिनों में यह संख्या हज़ारों में पहुँच गई. एक निर्णायक मोड़ तब आया जब पुलिस ने सोनम वांगचुक को उठा लिया. 18 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे वैज्ञानिक और कार्यकर्ता. दीपके बताते हैं कि वे रो पड़े और उन्हें अपराधबोध हुआ कि अगर वे नहाने के लिए धरनास्थल से न हटे होते तो शायद ऐसा न होता.

उसी दिन पाँच-छह पुलिसवालों ने उन्हें पकड़कर धरनास्थल जाने से रोका और फिर पीटना शुरू कर दिया. मदद के लिए चिल्लाने पर उनका मुँह दबा दिया गया और सड़क पर घसीटा गया. दीपके कहते हैं कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर बेहद क्रूर बल का इस्तेमाल किया और सरकार का संदेश साफ़ था. हमारे ख़िलाफ़ सड़क पर उतरने की हिम्मत मत करना. वे बताते हैं कि लोग टूटे हुए पैरों, हाथों और सिर पर चोट के साथ धरनास्थल पहुँच रहे थे और कह रहे थे कि यह लड़ाई वे लड़ेंगे.

21 जुलाई के बाद अब तक की सबसे बड़ी भीड़ जुटी. जो आंदोलन सिर्फ़ दिल्ली में था, वह पूरे देश में फैल गया. लोगों ने पुलिस की मार का जवाब मीम और तंज़ से दिया कि पीटना है तो पीट लीजिए, मगर इस्तीफ़ा हुए बिना धरना ख़त्म नहीं होगा. और 25 जुलाई को इस्तीफ़ा हो गया. दीपके कहते हैं कि किसी को इसकी उम्मीद नहीं थी और उस दिन उन्होंने पागलों की तरह जश्न मनाया.

उनके लिए सबसे बड़ी जीत इस्तीफ़ा नहीं है. वे कहते हैं कि एक दशक से ज़्यादा वक़्त तक भारत के लोग सरकार से सवाल पूछने में डरते रहे; अब यह डर टूट गया है. वे मीडिया संस्थानों को भी सुनाते हैं कि देश के लोग उनसे नाराज़ हैं क्योंकि वे उनकी बात नहीं करते और उनका प्रतिनिधित्व नहीं करते और वे ही बहुसंख्यक हैं, इसलिए उन्हें सुनना पड़ेगा. दीपके का कहना है कि शिक्षा धंधा नहीं, भारत में जन्मे हर बच्चे का मौलिक अधिकार है.

अब कॉकरोच जनता पार्टी देशव्यापी अभियान की तैयारी में है, हर राज्य में जाकर लोगों की तकलीफ़ें और उम्मीदें समझने की. दीपके कहते हैं कि जेन ज़ी अपने मोबाइल और लैपटॉप की स्क्रीन से देख रही है कि बाक़ी दुनिया में क्या चल रहा है. उसे बेहतर शिक्षा, बेहतर सार्वजनिक ढाँचा और बेहतर अवसर चाहिए, और वह लोकतंत्र की सीमाओं को लगातार धकेलती रहती है. उनका सबसे बड़ा सबक़ यही है कि कम पर राज़ी नहीं होना चाहिए, क्योंकि दाँव पर अपनी ही ज़िंदगी और अपना ही भविष्य लगा है. वे पूछते हैं, जब न रोज़ी-रोटी सँभल रही है, न बच्चों की पढ़ाई, न नौकरी मिल रही है, तो क्या हमसे यह उम्मीद की जाती है कि हम चुपचाप बैठे रहें और शिकायत न करें? 

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