मुंबई लंदन से बेहतर, गोरखपुर स्पेन से आगे: हकीकत छिपाने के लिए राष्ट्रवाद का इस्तेमाल
'स्क्रोल' में बिक्रम वोहरा ने लिखा है कि सरकारी अधिकारियों और नेताओं की ओर से भारतीय शहरों की तुलना दुनिया के विकसित शहरों और देशों से करने का चलन कई बार वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाने का तरीका बन जाता है.
मुंबई की नगर आयुक्त अश्विनी भिडे ने हाल ही में शहर के हरित क्षेत्रों पर सवाल के जवाब में कहा कि प्रति व्यक्ति हरित क्षेत्र की उपलब्धता के मामले में मुंबई न्यूयॉर्क और लंदन से बेहतर है. उन्होंने कहा कि उपलब्ध जमीन के हिसाब से मुंबई ने काफी कुछ किया है.
लेकिन शहरी शोधकर्ता हुसैन इंदौरेवाला ने ‘मुंबई मिरर’ में अपने विश्लेषण में इस तुलना के लिए इस्तेमाल की जा रही परिभाषाओं पर सवाल उठाया. उनके मुताबिक, मुंबई के कुल क्षेत्रफल का 31.5 प्रतिशत हिस्सा नगर निगम हरित क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करता है, लेकिन इसका 27.8 प्रतिशत हिस्सा मुख्य रूप से जंगल, मैंग्रोव, जलाशयों और अन्य प्राकृतिक क्षेत्रों का है, जो आम लोगों के लिए खेल या मनोरंजन के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं हैं.
वास्तविक खुले और मनोरंजन योग्य स्थान की तस्वीर अलग है. मुंबई में प्रति व्यक्ति करीब 1.58 वर्ग मीटर खुली जगह उपलब्ध है, जबकि लंदन में यह 31.68 वर्ग मीटर और न्यूयॉर्क में 26.2 वर्ग मीटर है. मुंबई के कुल क्षेत्रफल का केवल करीब 3.7 प्रतिशत हिस्सा खुले स्थान के रूप में उपलब्ध है, जबकि लंदन में यह लगभग 33 प्रतिशत और न्यूयॉर्क में करीब 27 प्रतिशत है.
यानी केवल आंकड़ों की परिभाषा बदलने से शहरों के बीच मौजूद बड़ा अंतर खत्म नहीं हो जाता.
गोरखपुर की स्पेन से तुलना
ऐसी तुलना का एक और उदाहरण उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से सामने आया. पिछले महीने सांसद रवि किशन ने एक कार्यक्रम में अपने संसदीय क्षेत्र को स्पेन से बेहतर बताया. उन्होंने कहा कि उन्होंने दुनिया के कई स्थान देखे हैं और उन्हें गोरखपुर एक स्मार्ट सिटी जैसा लगता है.
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे और रवि किशन की टिप्पणी पर हंसे. हालांकि ऐसी टिप्पणियां तथ्यात्मक तुलना के बजाय राजनीतिक और सार्वजनिक विमर्श में चर्चा पैदा करने का माध्यम बन जाती हैं.
राष्ट्रवाद बनाम वास्तविक सवाल
ऐसी तुलना का असर केवल हंसी या प्रचार तक सीमित नहीं रहता. जब किसी शहर की बुनियादी समस्याओं पर सवाल उठाए जाते हैं और जवाब में उसकी तुलना किसी विदेशी शहर या देश से बेहतर बताकर की जाती है, तो बहस का केंद्र बदल जाता है.
कचरा, वायु प्रदूषण, गड्ढे, सार्वजनिक स्थानों की कमी और शहरों की रहने योग्य स्थिति जैसे सवालों पर बात करने के बजाय राष्ट्रीय गौरव को सामने रखा जाता है. इससे आलोचना को भी देश या शहर विरोधी भावना के रूप में पेश करने की गुंजाइश बनती है.
लेकिन विदेश यात्रा करने वाले भारतीयों की संख्या बढ़ने के साथ ऐसी तुलना की सीमाएं ज्यादा स्पष्ट हो रही हैं. दुबई, वियतनाम और यहां तक कि श्रीलंका जाने वाले लोग दूसरे देशों के शहरों में मौजूद सार्वजनिक सुविधाओं, स्वच्छता और शहरी व्यवस्थाओं को प्रत्यक्ष रूप से देखते हैं.
इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि भारतीय शहरों की आलोचना देशभक्ति के खिलाफ है या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या हम अपनी समस्याओं को स्वीकार कर उनके समाधान की दिशा में काम कर सकते हैं.
मुंबई और गोरखपुर को बेहतर शहर बनाया जा सकता है. पार्क बढ़ाए जा सकते हैं, हवा साफ की जा सकती है और शहरों को अधिक रहने योग्य बनाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए पहले वास्तविक स्थिति को स्वीकार करना जरूरी है, न कि तुलना के जरिए उसे बेहतर साबित करने की कोशिश करना.
(यह बिक्रम वोहरा के मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.)

