पेपर लीक से परे: क्यों नीट को लेकर लड़ाई सिर्फ धोखाधड़ी से आगे की बात बन चुकी है

‘द टेलीग्राफ’ में परन बालाकृष्णन ने लिखा है कि भारत में चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश पाने के लिए राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) एक अनिवार्य बाधा बन चुकी है. अब केवल स्कूली प्रदर्शन या स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर प्रवेश संभव नहीं है. लगभग 22 लाख छात्र इस अति-प्रतिस्पर्धी परीक्षा में भाग लेते हैं, जहाँ महज़ कुछ अंकों का अंतर एक सस्ते सरकारी कॉलेज और अत्यंत महंगे निजी कॉलेज के बीच का अंतर तय करता है.

सरकार ने न केवल एलोपैथिक एमबीबीएस, बल्कि बीडीएस (दंत चिकित्सा), पशु चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी अन्य सभी प्रणालियों को भी इसी एकल परीक्षा के तहत ला दिया है. इसके अलावा, परीक्षा देने की अधिकतम आयु सीमा (25 वर्ष) और प्रयासों की सीमित संख्या के प्रतिबंध को हटा दिया गया है, जिससे हर साल पुराने और नए उम्मीदवारों की भीड़ एक साथ सीमित सीटों के लिए होड़ लगाती है.

एक सरकारी मेडिकल डिग्री पर 5 लाख से 10 लाख रुपये के बीच खर्च आ सकता है. वहीं, एक निजी (प्राइवेट) चिकित्सा शिक्षा की लागत 1 करोड़ रुपये से अधिक और कुछ संस्थानों में तो कई करोड़ रुपये तक हो सकती है. लिहाजा, सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस में भारी अंतर ने इस परीक्षा को आर्थिक रूप से अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है.

नीट केवल दो अलग-अलग वर्गों के लिए काम करती है: शीर्ष रैंक धारक: जो अत्यधिक सब्सिडी वाली सरकारी सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं. केवल अर्हता प्राप्त छात्र: निजी संस्थान कम अंक वाले लेकिन आर्थिक रूप से समृद्ध छात्रों के लिए प्रवेश के द्वार खोलते हैं. कम कट-ऑफ अंक होने के कारण समृद्ध परिवार भारी-भरकम फीस देकर सीटों के लिए बोली लगाते हैं, जिसे एक प्रकार से "चोर दरवाजे (साइड-डोर) से प्रवेश" कहा जा सकता है.

बालाकृष्णन के अनुसार, नीट की जटिलता ने अरबों रुपये के कोचिंग उद्योग को जन्म दिया है. यह व्यवस्था आर्थिक रूप से मजबूत छात्रों के पक्ष में झुकी हुई है, क्योंकि वे विशेषज्ञ शिक्षकों, आवासीय कोचिंग, अध्ययन सामग्री, प्राइवेट ट्यूशन और बार-बार परीक्षा देने के खर्चों का वहन कर सकते हैं.

इसके अतिरिक्त, नीट का पाठ्यक्रम मुख्य रूप से सीबीएसई और एनसीईआरटी पर आधारित है. इससे विभिन्न राज्य-बोर्डों (जैसे तमिलनाडु स्टेट बोर्ड) के छात्रों को संरचनात्मक नुकसान उठाना पड़ता है. यही कारण है कि तमिलनाडु जैसे राज्य, जो पहले स्कूली अंकों और आरक्षण के आधार पर प्रवेश देते थे, नीट का कड़ा विरोध कर रहे हैं.

सरकारी और निजी सीटों के बीच के विशाल अंतर के कारण प्रश्नपत्र लीक करने और धोखाधड़ी करने का वित्तीय लाभ बहुत बड़ा हो गया है.  आपराधिक गिरोह बेबस माता-पिता और छात्रों का फायदा उठाते हैं. वर्ष 2024 की परीक्षा में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कम से कम 155 उम्मीदवारों को पेपर लीक से लाभ मिला था, और ताज़ा मामलों में विषय विशेषज्ञों और कोचिंग संस्थानों के लोगों सहित कई गिरफ्तारियाँ हुई हैं.

राजनीतिक रूप से, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस नीट को पूरी तरह रद्द करने की मांग नहीं कर रहा है, क्योंकि 2013 में यूपीए सरकार के दौरान ही इसे लाया गया था. हालाँकि, कांग्रेस का आरोप है कि वर्तमान सरकार ने इसे कोचिंग सेंटरों के पक्ष में और गरीब छात्रों के खिलाफ एक केंद्रीकृत व्यावसायिक व्यवस्था बना दिया है. दूसरी ओर, नीट के समर्थकों का तर्क है कि इस परीक्षा ने देश भर में अलग-अलग फॉर्म भरने, विभिन्न राज्यों की यात्रा करने और निजी कॉलेजों की अपारदर्शी प्रवेश प्रक्रियाओं जैसी पुरानी समस्याओं को समाप्त किया है.

पेपर लीक और अनियमितताओं से निपटने के लिए सरकार जो कदम उठा रही है, उनमें सबसे पहला तो यही है कि इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कार्यबल का गठन किया गया है. 10 साल तक की जेल का कड़ा कानून बनाया है, बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी, मोबाइल जैमर और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. कागजी पुस्तिकाओं की छपाई और परिवहन के दौरान होने वाले लीक को रोकने के लिए डिजिटल मोड पर जोर दिया जा रहा है.

लेकिन, ऑनलाइन मोड में स्थानांतरित करने के बावजूद मानवीय हस्तक्षेप (जैसे प्रश्न तैयार करने वाले विशेषज्ञ और 13 भाषाओं में अनुवादक) पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकता. इसके अलावा, भारत का मौजूदा डिजिटल बुनियादी ढांचा एक समय में केवल 3,00,000 अभ्यर्थियों की ही परीक्षा ले सकता है. अतः 22 लाख छात्रों के लिए ऑनलाइन नीट आयोजित करने हेतु कई पालियों और बहुत बड़े रसद प्रबंधन की आवश्यकता होगी.

कुलमिलाकर, तकनीक और कड़े कानून सुरक्षा में सुधार कर सकते हैं, लेकिन वे प्रणाली को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं बना सकते. मूल प्रश्न यह बना हुआ है कि क्या इतने बड़े पैमाने की एकल परीक्षा प्रणाली भारत के भविष्य के डॉक्टरों के चयन का सही तरीका है, जहाँ परीक्षा का विशाल पैमाना ही इसमें हेरफेर और भ्रष्टाचार करने के बड़े अवसर और प्रोत्साहन पैदा करता है.

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