नीट-यूजी आंदोलन: 'जेन ज़ी को सुनिए, उनका दमन मत कीजिए' - सुप्रीम कोर्ट

‘द हिन्दू’ के मुताबिक, नीट-यूजी पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलनों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को अहम संदेश दिया है. अदालत ने कहा कि युवाओं के विरोध का जवाब बल प्रयोग नहीं, बल्कि संवाद, समझाइश और संयम होना चाहिए. मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, "सबसे शक्तिशाली माध्यम तर्क है. युवाओं को सुनिए, उनसे बात कीजिए और उन्हें शांत कीजिए."

सुप्रीम कोर्ट यह टिप्पणी 20 जुलाई को दिल्ली में हुए नीट-यूजी विरोध प्रदर्शन और उसके दौरान हुई हिंसा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान कर रहा था. यह याचिका सेवानिवृत्त वायुसेना अधिकारी मनीष कुमार सोलंकी ने दायर की है. याचिका में प्रदर्शन के आयोजकों की जवाबदेही तय करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है. याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि घटना के 15 दिन बाद भी आयोजकों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, जिससे गलत संदेश जा रहा है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि हिंसा में शामिल लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में ऐसे आंदोलन और बढ़ सकते हैं. उन्होंने कहा कि पत्थरबाजी करने वालों को बख्शना खतरनाक परंपरा बन सकती है. उन्होंने सुझाव दिया कि आंदोलन में शामिल युवाओं से सात दिन की सामुदायिक सेवा कराई जाए.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील से सहमति नहीं जताई. मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "युवाओं को शांत करना जरूरी है, भले ही उनमें से कुछ पत्थरबाजी जैसी घटनाओं में शामिल हों. उन्हें सलाह और काउंसलिंग की जरूरत है. किसी भी तरह की आक्रामकता स्थिति को और बिगाड़ सकती है."

अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक आंदोलनों की शुरुआत अक्सर शांतिपूर्ण उद्देश्य से होती है, लेकिन यदि किसी कारण से तनाव बढ़ता है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. "ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षा बलों को अधिक संयम बरतना चाहिए ताकि हालात नियंत्रण से बाहर न जाएं." अदालत ने स्पष्ट किया कि संवाद और धैर्य किसी भी टकराव को कम करने के सबसे प्रभावी तरीके हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है. अदालत ने इस याचिका को नीट-यूजी आंदोलन से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ते हुए 18 अगस्त को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है.

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी केवल नीट-यूजी आंदोलन तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और युवाओं के बीच संवाद की आवश्यकता पर भी जोर देती है. अदालत का स्पष्ट संदेश है कि "नई पीढ़ी के आक्रोश का समाधान दमन नहीं, बल्कि बातचीत, विश्वास और संवेदनशीलता के जरिए निकाला जाना चाहिए."

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