निधीश त्यागी | किसका चुनाव, किसका रेफ़री?
हरकारा रोज़ाना के इस एपिसोड में निधीश त्यागी चर्चा कर रहे हैं भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठ रहे गंभीर सवालों पर.
सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि वोटर लिस्ट में कितने नाम कटे. बड़ा सवाल यह है कि देश में यह तय करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और भरोसेमंद है. विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान करोड़ों नामों के हटने, नोटिस जारी होने और मतदाताओं से दस्तावेज़ मांगे जाने को लेकर विपक्ष और नागरिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं. वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची से मृत, स्थानांतरित और दोहरे नामों को हटाकर उसे साफ़ करना है.
इस बातचीत में ज्ञानेश कुमार की प्रशासनिक पृष्ठभूमि और उनकी उन महत्वपूर्ण तैनातियों पर भी चर्चा होगी, जिनमें जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन, अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट और सहकारिता मंत्रालय जैसे मामले शामिल रहे हैं. इसके साथ ही 2023 के चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून और उनकी मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति को लेकर उठे सवाल भी बातचीत का हिस्सा हैं.
चर्चा का एक अहम हिस्सा चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों से जुड़ा है. रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं. आयोग ने इसे सामान्य संस्थागत मतभेद बताते हुए कहा कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए.
इसके अलावा ज्ञानेश कुमार के पारिवारिक रिश्तों और उनसे जुड़े प्रशासनिक मामलों पर भी सवाल उठे हैं. हालांकि, इन मामलों में आरोप, तथ्य और अनुमान के बीच अंतर बनाए रखना बेहद जरूरी है.
आख़िर में सवाल लोकतंत्र के सबसे बुनियादी अधिकार पर लौटता है—वोट देने का अधिकार. अगर मतदाता सूची लोकतंत्र की नींव है, तो उसे तैयार करने वाली संस्था पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहे? यही आज की बातचीत का सबसे बड़ा सवाल है.
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