शरावती परियोजना: विशेषज्ञों ने एनआईएएस की रिपोर्ट पर उठाए सवाल, पश्चिमी घाट में पर्यावरणीय नुकसान की चेतावनी
‘साउथ फर्स्ट’ में कीर्तिवास के रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक के पश्चिमी घाट में प्रस्तावित 2,000 मेगावाट की पंप्ड-स्टोरेज जलविद्युत परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं बढ़ गई हैं. विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय उन्नत अध्ययन संस्थान (एनआईएएस) के आकलन पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इसमें संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं किया गया. 12 अक्टूबर 2026 को जारी 60 पन्नों की पीपुल्स रिव्यू ऑफ द एनआईएएस रिपोर्ट ऑन द शरावती पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट में परियोजना के पर्यावरणीय जोखिमों की व्यापक समीक्षा और वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करने की मांग की गई है.
कर्नाटक पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (केपीसीएल) की प्रस्तावित इस परियोजना की अनुमानित लागत 10,240 करोड़ रुपये है. यह शिवमोग्गा और उत्तर कन्नड़ जिलों के कुछ हिस्सों में फैले शरावती लायन-टेल्ड मकाक वन्यजीव अभयारण्य और उसके इको-सेंसिटिव जोन में स्थित है. विवाद का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या बिजली भंडारण की जरूरत इस संवेदनशील क्षेत्र में बड़े बुनियादी ढांचे के निर्माण से होने वाले संभावित पर्यावरणीय नुकसान को उचित ठहराती है.
परियोजना की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के सदस्य डॉ. एच.एस. सिंह और प्रोफेसर रमन सुकुमार तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के एक अधिकारी की तीन सदस्यीय समिति ने 27 से 30 दिसंबर 2025 के बीच स्थल का निरीक्षण किया था. फरवरी 2026 में सौंपी गई समिति की रिपोर्ट ने परियोजना की सिफारिश नहीं की. इसमें कहा गया कि परियोजना के पक्ष में पर्याप्त तकनीकी औचित्य, पर्यावरणीय स्थिरता या जनहित से जुड़ा आधार नहीं है.
17 जुलाई 2025 को परियोजना को वन्यजीव संबंधी मंजूरी दी गई थी. हालांकि, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति के सदस्यों ने इस पर आपत्तियां उठाईं, जिसके बाद आगे जांच की गई और एनआईएएस से टिप्पणी मांगी गई. प्रोफेसर आर. श्रीकांत के नेतृत्व में एनआईएएस की टीम ने अप्रैल 2026 में स्थल का दौरा किया और केपीसीएल के अधिकारियों से चर्चा की.
पीपुल्स रिव्यू ने आरोप लगाया कि एनआईएएस ने परियोजना से होने वाले ऊर्जा संबंधी लाभों को पहले उठाई गई पारिस्थितिक चिंताओं से अधिक महत्व दिया. इसमें यह भी कहा गया कि परियोजना से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों की पर्याप्त जांच नहीं हुई और प्रस्तावित डिजाइन में बदलावों का स्वतंत्र मूल्यांकन नहीं किया गया.
एनआईएएस ने तर्क दिया था कि परियोजना से कर्नाटक को अतिरिक्त बिजली का प्रबंधन करने, नवीकरणीय ऊर्जा को बिजली व्यवस्था में शामिल करने और बैटरी भंडारण पर निर्भरता घटाने में मदद मिलेगी. महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर चिंताओं और भारत के 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य का भी उल्लेख किया गया. प्रस्तावित वन भूमि हस्तांतरण को 54.16 हेक्टेयर से घटाकर 38.98 हेक्टेयर किए जाने को भी परियोजना के पक्ष में रखा गया. एनआईएएस ने राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति से मंजूरी देने और पर्यावरण मंत्रालय से इको-सेंसिटिव जोन में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पर लागू प्रतिबंधों में अपवाद पर विचार करने की सिफारिश की थी. साउथ फर्स्ट के अनुसार, एनआईएएस के निदेशक शैलेश नायक ने इस संबंध में भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया.
भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु से जुड़े पारिस्थितिकीविद् एम. सुभाष चंद्रन ने कहा कि आकलन में केवल निर्माण स्थलों या काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या पर ध्यान देने के बजाय पूरी शरावती नदी प्रणाली पर बुनियादी ढांचे के संचयी प्रभावों का अध्ययन होना चाहिए. उनके अनुसार, एनआईएएस का आकलन पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक समीक्षा करने के बजाय पेड़ों की कटाई कम करने पर केंद्रित है.
चंद्रन ने नदी के निचले हिस्सों में पानी के प्रवाह को लेकर भी चिंता जताई. उनका कहना है कि मीठे पानी का प्रवाह बदलने से खारे पानी का प्रवेश ऊपर की ओर बढ़ सकता है, जिससे होन्नावर के आसपास कुओं, खेतों और पेयजल आपूर्ति पर असर पड़ सकता है. उन्होंने शरावती नदी के मुहाने को समुद्री मछलियों के प्रजनन और उनके बच्चों के विकास के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए कहा कि प्रस्तावित परियोजना के प्रभावों के साथ मौजूदा जलविद्युत ढांचे के असर को भी ध्यान में रखना चाहिए.
पर्यावरणविद् भारत शेट्टूर ने चेतावनी दी कि खुदाई और इससे जुड़ा निर्माण केवल बांध क्षेत्र तक सीमित नुकसान नहीं पहुंचाएगा, बल्कि आसपास की जैव विविधता और पारिस्थितिकी को भी प्रभावित कर सकता है. उन्होंने अभयारण्य में पाए जाने वाले संकटग्रस्त लायन-टेल्ड मकाक का उल्लेख किया, जो पश्चिमी घाट में पाई जाने वाली स्थानिक प्रजाति है और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल है. शेट्टूर ने सवाल उठाया कि जब सौर और पवन ऊर्जा जैसे विकल्प उपलब्ध हैं, तो एक और बड़ी परियोजना की जरूरत क्यों है. उन्होंने स्थानीय जल सुरक्षा के लिए झीलों के पुनरुद्धार और भूजल पुनर्भरण जैसे विकल्पों पर भी विचार करने का सुझाव दिया.
परियोजना के डिजाइन में बदलाव के बाद प्रस्तावित वन भूमि हस्तांतरण 54.16 हेक्टेयर से घटकर 38.98 हेक्टेयर रह गया है. हालांकि, पीपुल्स रिव्यू का तर्क है कि सतह पर निर्माण के लिए कम जमीन की जरूरत होने के बावजूद भूमिगत निर्माण का दायरा बढ़ने से पर्यावरणीय नुकसान कम नहीं माना जा सकता. भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी और समीक्षा पैनल के सदस्य बृज किशोर सिंह ने कहा कि भूमिगत निर्माण भी जंगलों को नुकसान पहुंचा सकता है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या क्षतिपूरक वनीकरण पुराने जंगलों की पारिस्थितिक विविधता की भरपाई कर सकता है. उनके अनुसार, तटीय जंगल समुद्र से नमी वाली हवा को अंतर्देशीय क्षेत्रों तक पहुंचाने और वर्षा के स्वरूप को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ऐसे जंगलों के विनाश से प्रायद्वीपीय भारत के कुछ हिस्सों में वर्षा प्रभावित हो सकती है.
पीपुल्स रिव्यू ने समग्र पर्यावरणीय आकलन, स्वतंत्र भूवैज्ञानिक और जलभूवैज्ञानिक अध्ययन तथा बैटरी भंडारण और अन्य स्थानों पर परियोजना स्थापित करने जैसे विकल्पों की समीक्षा की मांग की है. इसमें बेलगावी जिले की 1,600 मेगावाट की सौंदत्ती पंप्ड-स्टोरेज परियोजना का भी उल्लेख है, जिसकी 700 मेगावाट क्षमता के लिए ही अनुबंध किए जाने की बात कही गई है.
इस बीच, परियोजना को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट में कानूनी चुनौती भी दी गई है. 10 मार्च 2026 को अदालत ने अगले आदेश तक परियोजना से संबंधित किसी भी जमीनी गतिविधि पर रोक लगाने का निर्देश दिया था. यह अंतरिम आदेश परियोजना की अंतिम मंजूरी की स्थिति पर फैसला नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या कम करना पर्याप्त नहीं है. परियोजना पर फैसला लेते समय नदी, जंगलों, वन्यजीवों और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले परस्पर जुड़े प्रभावों का आकलन करना जरूरी है. बिजली भंडारण के संभावित लाभों और पर्यावरणीय लागत के बीच संतुलन तय करने के लिए स्वतंत्र और व्यापक मूल्यांकन की मांग की जा रही है.

