अमरेंद्र किशोर | जब पहाड़ बिकते हैं, तो धूल का कर्ज कौन चुकाता है?

‘डाउन टू अर्थ’ में अमरेंद्र किशोर की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के रोहतास जिले की कैमूर पहाड़ियों में पत्थर खनन के लिए नए ब्लॉकों की नीलामी ने पर्यावरण, स्थानीय आजीविका और ऐतिहासिक विरासत को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. वर्ष 2007 में क्षेत्र के कुछ हिस्सों में खनन पर प्रतिबंध लगाया गया था, लेकिन अब गायघाट और गिजवाही में खनन की प्रक्रिया दोबारा शुरू होने से स्थानीय लोगों के सामने रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल खड़ा हो गया है.

रोजगार की उम्मीद और प्रदूषण का डर

बंसा गांव के बंधु साह के अनुसार, खनन से पहले स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन खदानें बंद होने के बाद आजीविका के लिए पलायन करना पड़ा. दूसरी ओर, गोपी बिगहा के संदीप चंद्रवंशी ने खनन से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों की ओर ध्यान दिलाया. उनका कहना है कि क्षेत्र में सैकड़ों परिवार सिलिकोसिस से प्रभावित हुए हैं.

वर्ष 2016 के एक अध्ययन में सासाराम-डेहरी क्षेत्र के 505 क्रशर संयंत्रों से निकलने वाली धूल, शोर और जल प्रदूषण का असर 21 गांवों पर दर्ज किया गया था. ऐसे में नए खनन ब्लॉकों से स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

हजारों लोगों पर पड़ सकता है असर

सितंबर 2026 में गायघाट और गिजवाही में दो खनन ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया शुरू हुई. ये ब्लॉक लगभग 13 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हैं और इनकी शुरुआती निविदा राशि करीब 24 करोड़ रुपये बताई गई है. रिपोर्ट के अनुसार, आसपास के गांवों और परिवहन मार्गों को देखते हुए 15,000 से 20,000 लोग प्रभावित हो सकते हैं.

खनन का प्रभाव केवल पट्टे की सीमा तक सीमित नहीं रहता. भारी वाहनों, क्रशर संयंत्रों और विस्फोटों से धूल, शोर तथा कंपन बढ़ सकते हैं. स्थानीय लोगों को खेतों तक पहुंचने, बच्चों के स्कूल जाने और मवेशियों के चरने वाले रास्तों पर असर पड़ने की भी आशंका है.

जलस्रोतों और ऐतिहासिक विरासत पर संकट

कैमूर की पहाड़ियां वर्षा जल के बहाव और भूजल पुनर्भरण के लिए महत्वपूर्ण हैं. खनन से प्राकृतिक जल निकासी प्रभावित हो सकती है. विशेषज्ञों ने पीएम10, पीएम2.5 और सिलिका युक्त धूल की नियमित निगरानी तथा आंकड़ों को सार्वजनिक करने की आवश्यकता बताई है.

पुरातत्वविद् श्यामसुंदर तिवारी के मुताबिक, इस क्षेत्र के सौ से अधिक प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों में हजारों साल पुराने चित्र और उत्कीर्ण निशान मौजूद हैं. खनन गतिविधियों से इस ऐतिहासिक विरासत को नुकसान पहुंचने का खतरा है. धूल, शोर और कंपन का असर पास स्थित नारायण मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में भर्ती मरीजों पर भी पड़ सकता है.

विकास की कीमत कौन चुकाएगा?

खनन शुरू करने के लिए स्वीकृत खनन योजना, पर्यावरणीय मंजूरी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की आवश्यक सहमति जरूरी है. रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि क्या नए ब्लॉकों की नीलामी से पहले पूरे क्षेत्र पर खनन के संयुक्त पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन किया गया है.

खनन से राजस्व और रोजगार मिल सकता है, लेकिन इसकी कीमत स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य, खेती, जलस्रोतों और ऐतिहासिक धरोहर को नहीं चुकानी चाहिए. पहाड़ों से पत्थर निकालने की आर्थिक गणना में उनके पारिस्थितिक और सामाजिक महत्व को भी शामिल करना जरूरी है.

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