इसरो का निजीकरण: वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता पर हमला और नव-उपनिवेशवाद की ओर कदम?

‘कॉउंटरकरंट्स’ में डॉ. अरुण मित्रा लिखते हैं कि भारत की स्वतंत्रता का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं था. स्वतंत्रता आंदोलन का सपना ऐसा भारत बनाना था जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो, अपनी वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएं विकसित कर सके, विश्व राजनीति में स्वतंत्र निर्णय ले सके, सभी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखे और साम्राज्यवाद तथा युद्ध के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे.

गदर आंदोलन, क्रांतिकारी आंदोलनों, कम्युनिस्ट धारा तथा गांधी और नेहरू की राजनीतिक सोच जैसी स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं ने अपने-अपने तरीके से भारतीय स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के विचार को विकसित किया. आजादी के बाद इसी दृष्टि ने देश की आर्थिक, औद्योगिक और वैज्ञानिक नीतियों को दिशा दी.

स्वतंत्र भारत में विज्ञान और तकनीक को राष्ट्र निर्माण की बुनियाद माना गया. बड़े बांधों, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों, दवा उत्पादन और शोध संस्थानों का निर्माण इसी सोच का हिस्सा था.

वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की इसी यात्रा के दौरान भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम विकसित हुआ. सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय वैज्ञानिकों ने जिस तरह अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में देश को आगे बढ़ाया, वह दुनिया के सामने एक उल्लेखनीय उदाहरण बना.

भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां दशकों के सार्वजनिक निवेश, वैज्ञानिक शोध, संस्थान निर्माण और हजारों वैज्ञानिकों तथा तकनीकी कर्मचारियों की मेहनत का परिणाम हैं. जब भारत को उन्नत अंतरिक्ष तकनीक हासिल करने के प्रयासों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और तकनीकी नियंत्रणों का सामना करना पड़ा, तब भारतीय वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक विकसित करने का रास्ता चुना. इसी आत्मनिर्भरता की भावना ने भारत को आज अंतरिक्ष प्रक्षेपण, उपग्रह तकनीक और विभिन्न अंतरिक्ष अभियानों में वैश्विक पहचान दिलाई है.

इसलिए इसरो को केवल सरकारी विभाग या शोध संस्थान मानना भूल होगी. यह भारत की वैज्ञानिक संप्रभुता और रणनीतिक क्षमता की महत्वपूर्ण बुनियाद है. यही कारण है कि इसरो की भूमिका या संरचना में किसी भी बड़े बदलाव पर देश में व्यापक और गंभीर सार्वजनिक बहस होनी चाहिए.

हाल के समय में इसरो के वैज्ञानिकों के निजी अंतरिक्ष कंपनियों और स्टार्ट-अप में जाने की खबरें सामने आई हैं. साथ ही अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाने की नीति भी तेजी से आगे बढ़ रही है.

यदि इसरो को धीरे-धीरे केवल शोध तक सीमित कर दिया गया और रॉकेट निर्माण, प्रक्षेपण तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी क्षमताएं निजी कंपनियों को सौंप दी गईं, तो सवाल उठेगा कि लंबे समय में इन क्षमताओं पर नियंत्रण किसका होगा.

यदि सार्वजनिक धन से विकसित तकनीक, बुनियादी ढांचा और मानव संसाधन अंततः निजी मुनाफे का आधार बन जाते हैं, तो यह महज प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं रहेगा. यह सार्वजनिक संसाधनों से विकसित वैज्ञानिक क्षमताओं के निजी हस्तांतरण का प्रश्न बन जाएगा. यदि इसका लाभ कुछ चुनिंदा बड़े कॉरपोरेट घरानों को मिलता है, तो चिंता और गंभीर हो जाती है.

इस संदर्भ में इसरो के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को याद करना जरूरी है, जिसे एस. नंबी नारायणन जासूसी मामले के रूप में जाना जाता है. वरिष्ठ इसरो वैज्ञानिक एस. नंबी नारायणन को नवंबर 1994 में गिरफ्तार किया गया था. उन पर इसरो से जुड़ी महत्वपूर्ण तकनीकी जानकारी विदेशी ताकतों को देने का आरोप लगाया गया था. इस मामले में इसरो के अन्य वैज्ञानिकों को भी गिरफ्तार किया गया.

बाद में जांच सीबीआई को सौंपी गई. सीबीआई को आरोपों की पुष्टि के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले और उसने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की. मई 1996 में एर्नाकुलम के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया.

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में नंबी नारायणन को 50 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. अदालत ने उनकी गिरफ्तारी और उनके साथ किए गए व्यवहार से उनकी गरिमा तथा करियर को हुए नुकसान पर गंभीर चिंता जताई.

यह मामला एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि वैज्ञानिक संस्थानों और वैज्ञानिकों की गरिमा तथा स्वतंत्रता की रक्षा करना राष्ट्रीय हित का विषय है. इसलिए यह पूछना जरूरी है कि क्या भारत के वैज्ञानिक संस्थानों को कभी राजनीतिक या बाहरी दबावों का सामना करना पड़ा है और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.

आज उपनिवेशवाद ने अपना रूप बदल लिया है. अब किसी देश पर कब्जा करने के लिए सेना भेजना जरूरी नहीं है. आर्थिक निर्भरता, तकनीकी निर्भरता, बाजारों पर नियंत्रण और रणनीतिक दबाव के जरिए भी किसी देश की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित किया जा सकता है. यही आधुनिक नव-उपनिवेशवाद है.

दुनिया आज बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है. नई आर्थिक और राजनीतिक शक्तियां उभर रही हैं. विकासशील देश अपनी स्वतंत्र आवाज मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे समय में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगा या विदेशी तकनीक, पूंजी और कॉरपोरेट हितों पर धीरे-धीरे निर्भर होता जाएगा.

अंतरिक्ष क्षेत्र इस मामले में बेहद संवेदनशील है. उपग्रह, संचार, नौवहन, मौसम विज्ञान, रक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्र अंतरिक्ष तकनीक पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं. इसलिए इस क्षेत्र पर नियंत्रण केवल व्यावसायिक मुद्दा नहीं है.

इसरो की वास्तविक ताकत उसकी प्रयोगशालाओं और रॉकेटों से भी अधिक उसके वैज्ञानिकों की बौद्धिक क्षमता में है. दशकों के अनुभव से विकसित ज्ञान को किसी कॉरपोरेट कंपनी को हस्तांतरित करना और फिर उसी क्षमता को निजी क्षेत्र से खरीदना देश के दीर्घकालिक हित में है या नहीं, इस पर गंभीर विचार होना चाहिए.

यदि बेहतर वेतन और सुविधाओं के नाम पर वैज्ञानिकों को सार्वजनिक संस्थानों से निजी कंपनियों की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो सार्वजनिक संस्थानों के संस्थागत ज्ञान का धीरे-धीरे क्षरण हो सकता है.

विज्ञान को केवल मुनाफे के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. कई महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियां वर्षों के धैर्यपूर्ण शोध का परिणाम होती हैं, जिनका तत्काल व्यावसायिक लाभ दिखाई नहीं देता. सार्वजनिक वैज्ञानिक संस्थानों की विशेष भूमिका इसी वजह से महत्वपूर्ण है.

सरकार को अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की वास्तविक सीमाएं स्पष्ट करनी चाहिए. इसरो की तकनीक, बुनियादी ढांचे और वैज्ञानिक क्षमताओं पर अंतिम नियंत्रण किसका रहेगा? सार्वजनिक धन से विकसित तकनीक का मालिक कौन होगा? वैज्ञानिकों की बौद्धिक संपदा की रक्षा कैसे होगी? राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी तकनीकों को कॉरपोरेट हितों से अलग कैसे रखा जाएगा?

ये सवाल केवल सरकार या इसरो अधिकारियों की चिंता नहीं हैं. संसद, राजनीतिक दलों, वैज्ञानिक समुदाय, ट्रेड यूनियनों और नागरिक समाज को भी इस बहस में शामिल किया जाना चाहिए.

यदि सरकार का कहना है कि इसरो का निजीकरण नहीं किया जा रहा है, तो उसे अपनी नीतियां और भविष्य की योजनाएं पूरी पारदर्शिता के साथ देश के सामने रखनी चाहिए.

क्योंकि मुद्दा केवल इसरो का नहीं है. असली सवाल यह है कि क्या भारत अपनी वैज्ञानिक क्षमताओं का मालिक बना रहेगा या धीरे-धीरे उन्हें निजी और विदेशी हितों को सौंप देगा.

यदि अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपने का अर्थ मुनाफे को सर्वोच्च उद्देश्य बनाना है, तो हमेशा यह खतरा बना रहेगा कि बड़े कॉरपोरेट समूह शक्तिशाली देशों के हितों के अनुरूप काम करने लगें. ऐसे में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और वैज्ञानिक स्वतंत्रता कमजोर हो सकती है.

इसरो भारतीय जनता के धन, भारतीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा और दशकों की मेहनत से बना है. इसे कॉरपोरेट मुनाफे की मशीन में बदलना देश की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता के साथ न्याय नहीं होगा.

इसरो को कमजोर करने की नहीं, बल्कि और मजबूत करने की जरूरत है. भारत को ऐसी अंतरिक्ष नीति चाहिए जो निजी नवाचार का स्वागत करे, लेकिन सार्वजनिक वैज्ञानिक संस्थानों की स्वायत्तता, राष्ट्रीय नियंत्रण और रणनीतिक स्वतंत्रता से कोई समझौता न करे.

आज सबसे बड़ा सवाल यही है:

क्या हम अपनी वैज्ञानिक संप्रभुता को मजबूत करेंगे या नव-उपनिवेशवाद के नए रास्तों के लिए दरवाजे खोल देंगे?

सरकार को इस सवाल का जवाब पूरे देश को देना चाहिए.

(डॉ. अरुण मित्रा पंजाब के लुधियाना में प्रैक्टिसिंग ईएनटी सर्जन हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुवाद है.)

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