श्रवण गर्ग | राहुल गांधी छात्रों की बात सुन रहे हैं, मोदी को संवाद की भाषा बदलनी होगी
‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं श्रवण गर्ग के साथ बातचीत में देश की राजनीति में उभरते एक महत्वपूर्ण बदलाव पर चर्चा हुई. सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी छात्रों और युवाओं के बीच अपनी नई राजनीतिक जगह बना रहे हैं और क्या नरेंद्र मोदी की राजनीति का पारंपरिक सामाजिक आधार अब उनसे सवाल पूछने लगा है.
दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में राहुल गांधी के कार्यक्रम और नरेंद्र मोदी के भाषणों की तुलना करते हुए श्रवण गर्ग ने कहा कि दोनों नेताओं की राजनीतिक भाषा में बड़ा अंतर दिखाई देता है. राहुल गांधी छात्रों के बीच जाकर उनकी बातें सुनने, उनके सवालों को समझने और उनके साथ संवाद करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों में छात्रों और युवाओं को लेकर आक्रामकता तथा राजनीतिक आरोप अधिक दिखाई देते हैं. श्रीराम कॉलेज के मंच से मोदी द्वारा “दिमागी नक्सल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल इसी बदलाव का संकेत माना गया.
चर्चा में यह भी सवाल उठा कि क्या प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी अब युवाओं की बेचैनी को समझने के बजाय उसे राजनीतिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं. बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितता, पेपर लीक, शिक्षा की बढ़ती लागत और डिग्रीधारी युवाओं के सामने रोजगार का संकट लगातार गहरा रहा है. ऐसे समय में छात्रों के सवालों को राष्ट्रविरोध या किसी वैचारिक षड्यंत्र से जोड़ना सरकार के लिए उलटा असर पैदा कर सकता है.
बातचीत में दिल्ली के सत्य निकेतन में इमारत गिरने की घटना, हल्द्वानी में दर्ज एफआईआर और विभिन्न शहरों में छात्रों के कार्यक्रमों को अनुमति न मिलने जैसे प्रसंगों का भी उल्लेख हुआ. इन घटनाओं के जरिए यह सवाल उठाया गया कि क्या सत्ता युवाओं की आवाज से असहज हो रही है. राहुल गांधी का छात्रों के बीच जाना और उनके मुद्दों को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाना उन्हें एक नए युवा जनाधार की ओर ले जा सकता है.
श्रवण गर्ग ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक आधार पर भी चर्चा की. उनका तर्क था कि भाजपा का समर्थन करने वाला शिक्षित और मध्यवर्गीय तबका अब केवल भावनात्मक मुद्दों से संतुष्ट नहीं होगा. उसे रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान से जुड़े ठोस जवाब चाहिए. यदि सरकार इन सवालों से बचती है, तो उसके पारंपरिक समर्थकों में भी असंतोष पैदा हो सकता है.
चर्चा का एक अहम बिंदु यह रहा कि भाजपा देशभर में पार्टी कार्यालयों के निर्माण पर जोर दे रही है, लेकिन छात्रों के लिए पर्याप्त छात्रावास, पुस्तकालय और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने पर उतना ध्यान नहीं दिखता. युवाओं को केवल चुनावी भीड़ या सोशल मीडिया समर्थक मानने के बजाय उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का सक्रिय हिस्सा बनाना जरूरी है.
अंततः सवाल नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की व्यक्तिगत लोकप्रियता से आगे बढ़कर राजनीतिक भाषा का है. राहुल गांधी युवाओं के बीच सुनने और संवाद करने की जगह बना रहे हैं, जबकि मोदी सरकार पर युवाओं की नाराजगी को समझने के बजाय उसे दबाने का आरोप लग रहा है. आने वाले समय में यही तय करेगा कि युवा भारत की राजनीति किस दिशा में जाती है.
पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं.

