'मार देंगे, रेप करेंगे': मोदी के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली युवतियों को कैसे बनाया जा रहा है निशाना

‘स्क्रोल’ में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में पत्रकार आयुषी तिवारी ने जंतर-मंतर छात्र आंदोलन के बाद महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बढ़ते ऑनलाइन उत्पीड़न, धमकियों और कानूनी कार्रवाई की पड़ताल की है. उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारेबाजी या आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाली कई युवा महिलाओं को सोशल मीडिया पर संगठित ट्रोलिंग, बलात्कार और हत्या की धमकियों, निजी जानकारी सार्वजनिक किए जाने (डॉक्सिंग) और पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है.

मध्य प्रदेश की 23 वर्षीय कंटेंट क्रिएटर और योग प्रशिक्षक श्रद्धा सिंह प्रश्नपत्र लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन में शामिल हुई थीं. प्रदर्शन के दौरान उन्होंने नई दिल्ली के कनॉट प्लेस में रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के जवानों के साथ सात सेकंड की एक इंस्टाग्राम रील बनाई. वीडियो में उन्होंने एक लोकप्रिय विज्ञापन के ऑडियो का इस्तेमाल किया था. श्रद्धा का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन था, सुरक्षा बलों का अपमान करना नहीं.

लेकिन कुछ ही घंटों में कई अनाम मीम पेजों ने इस वीडियो को इस दावे के साथ वायरल करना शुरू कर दिया कि उन्होंने आरएएफ का अपमान किया है. अगले ही दिन न्यूज18 इंडिया और दूरदर्शन सहित कई टीवी चैनलों ने भी वीडियो प्रसारित किया और उसे आपत्तिजनक बताया. इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ अभियान शुरू हो गया.

श्रद्धा के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट से उनकी कार का नंबर निकाला गया और उसके जरिए मोबाइल नंबर तथा घर का पता तलाश लिया गया. इसके बाद उन्हें लगातार फोन कॉल आने लगे, जिनमें हत्या और बलात्कार की धमकियां दी गईं. उनकी मां और दोस्तों के सोशल मीडिया अकाउंट भी खोज निकाले गए और वहां भी अभद्र टिप्पणियां की जाने लगीं.

श्रद्धा का दावा है कि उन्हें निशाना बनाने वाले कई सोशल मीडिया अकाउंट ऐसे थे, जिनके न कोई पोस्ट थे और न ही फॉलोअर्स, जिससे उन्हें संगठित ट्रोल नेटवर्क होने का संदेह हुआ. उन्होंने एक मीम पेज संचालक से वीडियो हटाने की अपील भी की, लेकिन उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि इससे उसकी कमाई हो रही है. श्रद्धा का यह भी आरोप है कि इंस्टाग्राम ने आंदोलन से जुड़े उनके 33 पोस्ट हटा दिए और उन्हें अपील का कोई प्रभावी विकल्प नहीं दिया.

इस दौरान एक और प्रदर्शनकारी रुचिका सिंह भी निशाने पर आ गईं. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान उनके कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल करती दिखाई देती हैं. इसके बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने उनके खिलाफ अभियान शुरू कर दिया. उनके इंस्टाग्राम अकाउंट की जानकारी साझा की गई, निजी जीवन पर टिप्पणियां की गईं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से उनका "मोस्ट वांटेड" पोस्टर तक तैयार कर दिया गया.

29 जुलाई को जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) महिला प्रकोष्ठ की गाजियाबाद जिला अध्यक्ष स्मृति सिंह ने रुचिका सिंह के खिलाफ नोएडा में छह प्राथमिकी दर्ज कराईं. इनमें से एक जीरो एफआईआर थी, जिसे बाद में दिल्ली पुलिस को स्थानांतरित किया जाना था. भारतीय न्याय संहिता की धारा 352, 353(1) और 356(1) के तहत मामला दर्ज किया गया. स्मृति सिंह का कहना था कि प्रधानमंत्री का अपमान देश का अपमान है और ऐसी कार्रवाई का उद्देश्य दूसरे युवाओं को सबक सिखाना है.

यहीं बात खत्म नहीं हुई. स्मृति सिंह अपने समर्थकों के साथ रुचिका सिंह के घर भी पहुंचीं. परिवार के घर पर नहीं मिलने के बाद उन्होंने पड़ोसियों के जरिए रुचिका से फोन पर बात की और माफी का वीडियो जारी करने को कहा. बाद में एक टीवी चैनल के संपादक ने रुचिका का वीडियो साझा किया, जिसमें वह हाथ जोड़कर प्रधानमंत्री से माफी मांगती दिखाई दीं. उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के दौरान वह दूसरे लोगों के प्रभाव में आ गई थीं और भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगी.

इस पूरे मामले में दर्ज एफआईआर पर संवैधानिक कानून विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता शाहरुख आलम ने भी सवाल उठाए हैं. उनके मुताबिक जिन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है, उनका इस्तेमाल इस मामले में उचित नहीं लगता. उनका कहना है कि धारा 352 तब लागू होती है जब किसी व्यक्ति का अपमान उसे सार्वजनिक शांति भंग करने के लिए उकसाए, जबकि यहां ऐसा तर्क लागू नहीं होता. इसी तरह धारा 353(1) झूठे तथ्यों के जरिए भय या अशांति फैलाने वाले मामलों से जुड़ी है, जबकि यह मामला किसी सार्वजनिक व्यक्ति की आलोचना या व्यंग्य का है. उन्होंने यह भी कहा कि मानहानि के मामलों में पुलिस स्वयं प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकती, बल्कि संबंधित व्यक्ति को अदालत में निजी शिकायत करनी होती है.

रुचिका सिंह का मामला सामने आने के बाद अन्य महिला प्रदर्शनकारियों को भी सोशल मीडिया पर निशाना बनाया जाने लगा. भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कुछ सोशल मीडिया कार्यकर्ताओं ने कई महिलाओं के वीडियो साझा करते हुए उनकी पहचान करने और उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने की अपील की. इनमें शामिल एक अन्य प्रदर्शनकारी रुचिका चावला ने वीडियो जारी कर कहा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने गुस्से में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया था, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके परिवार को भी गालियां दी जाएं या उन्हें निशाना बनाया जाए.

लेख के अंत में आयुषी तिवारी यह सवाल उठाती हैं कि क्या किसी राजनीतिक विरोध या अभद्र टिप्पणी के जवाब में महिलाओं को ऑनलाइन हिंसा, यौन हिंसा की धमकियों, डॉक्सिंग और कानूनी कार्रवाई के जरिए निशाना बनाना लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय नहीं है. श्रद्धा सिंह कहती हैं कि उन्हें आरएएफ पर बनाया गया वीडियो पोस्ट करने का अफसोस है, लेकिन छात्र आंदोलन में शामिल होने का नहीं. हालांकि लगातार मिल रही धमकियों और सामाजिक दबाव के कारण अब वह घर से बाहर निकलने से भी डरती हैं.

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