एनसीएल के खदान विस्तार में शहरी-ग्रामीण इलाक़े प्रभावित, कम मुआवज़े पर लोगों की ज़मीन ली जा रही
आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़ मध्य प्रदेश के सिंगरौली शहर में बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं. शहर का लगभग एक चौथाई हिस्सा कोयला खदान बढ़ाने के लिए खाली कराया जा रहा है. यह खदान नॉर्थेर्न कोलफ़ील्ड्स (एनसीएल) चलाती है, जो कोल इंडिया लिमिटेड की कंपनी है. यह विस्तार जयंती और दुधिचुआ ओपनकास्ट खदानों के लिए किया जा रहा है, जबकि जयंती खदान 2034 तक खत्म होने वाली है, यानी आठ साल से भी कम समय में. इसके बावजूद, हज़ारों लोगों को हटाया जा रहा है. वार्ड 3 से 10 तक के लगभग 50,000 निवासी और 22,000 से अधिक घरों व व्यावसायिक ढांचों को हटाने की योजना है.
मेधौली गांव, जो सिंगरौली नगर निगम के वार्ड 10 में आता है, इस विस्थापन के केंद्र में आता है. यहां के निवासी राजेंद्र प्रसाद बासोर को 2021 में NCL से एक दस्तावेज़ मिला, जिसमें उनके मुआवज़े को 20% घटा दिया गया. 2017 में उन्हें 0.05 एकड़ जमीन के लिए लगभग 8 लाख रुपये मिलने की उम्मीद थी, लेकिन नई गणना के बाद यह राशि घटकर 6,00,847 रुपये कर दी गई है. एनसीएल ने 2020 में किए गए पुनः सर्वे को इसका कारण बताया है. बासोर और अन्य ग्रामीणों का कहना है कि 2011 में सर्वे और 2017 में सत्यापन के बाद अब उसी को गलत बताकर मुआवज़ा कम करना अनुचित है. कई ज़मीन मालिकों को भी इसी तरह के दस्तावेज़ मिला है कि 2017 में घोषित अधिक मुआवज़े को 2020 के बाद 20% घटा दिया गया है.
ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया 2010 में कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957 के तहत शुरू हुई थी, जिसमें मुआवज़ा सरकारी गाइडलाइन दरों पर तय होता है और ज़मीन मालिकों की सहमति ज़रूरी नहीं होती. बाद में 2013 में भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन अधिनियम 2013 (एलएआरआर) लागू हुआ, जिसमें बाज़ार दर के क़रीब ग्रामीण में चार गुना, शहरी में दो गुना मुआवज़ा देने का प्रावधान है. 2017 में कानून मंत्रालय ने आदेश दिया कि जहां मुआवज़ा तय नहीं हुआ है, वहां 2013 का अधिनियम लागू होगा. इसी कारण 2017 में मुआवज़ा बढ़ा और कुछ मामलों में 17% तक अधिक भुगतान तय हुआ. लेकिन 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार ने ज़मीन की गाइडलाइन दरों को 20% घटा दिया, जिससे 2019-20 में सिंगरौली के लगभग सभी वार्डों में ज़मीन की कीमतें 19-20% कम हो गईं. एनसीएल ने इसी का फायदा उठाते हुए 2020 में नया सर्वे कराया और मुआवज़ा घटा दिया है.
कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पहले से घोषित मुआवज़ा बाद में कम किया जाए, लेकिन एनसीएल ने बदली हुई गाइडलाइन दरों के आधार पर यह कदम उठाया है. विशेषज्ञ वासुधा छोटराय का कहना है कि कंपनियां खर्च कम करना चाहती हैं, जबकि लोगों का हित अधिक मुआवजे में है, और दोनों के बीच बराबरी नहीं होती.
यह मामला इसलिए भी अलग है क्योंकि आमतौर पर खनन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में ज़मीन ली जाती है, लेकिन यहां शहरी इलाका प्रभावित हो रहा है., शहरी क्षेत्रों में खनन के लिए ज़मीन अधिग्रहण के मामले बहुत कम देखे गए हैं. सिंगरौली, जो पहले बांध और खदानों से विस्थापित लोगों का पुनर्वास केंद्र था, अब खुद विस्थापन झेल रहा है. यहां की नगर निगम मध्य प्रदेश में इंदौर के बाद दूसरी सबसे अमीर है, लेकिन मेधौली जैसे अनुसूचित जाति बहुल गांव विकास से वंचित रहे हैं और खदान के बिल्कुल किनारे बसे हैं, जहां सुरक्षा नियम भी लागू नहीं किए गए.
ऊर्जा ज़रूरतों के कारण भारत अभी भी कोयले पर निर्भर है, और एनसीएल का कहना है कि अगर खदान का विस्तार नहीं किया गया तो एनटीपीसी का पावर प्लांट बंद हो सकता है. हालांकि, विशेषज्ञ सुगंधा श्रीवास्तव के अनुसार यह विस्तार आर्थिक और पर्यावरणीय दोनों दृष्टि से उचित नहीं है. एनसीएल की 2024-25 की रिपोर्ट के अनुसार कंपनी का मुनाफा घट रहा है, फिर भी वह इस परियोजना को आगे बढ़ा रही है.
स्थानीय लोगों ने शिकायतें दर्ज कराई हैं, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई. NCL की 2023-24 की रिपोर्ट में भी कैग ने मुआवज़े में गड़बड़ियों की ओर इशारा किया है. सिंगरौली निवासी संघ के नेता राजेश सिंह ने कहा कि यह पहली बार है जब कोल इंडिया के इतिहास में शहरी घरों और दुकानों को इस तरह हटाया जा रहा है. उन्होंने यह भी मांग की कि किरायेदारों को भी मुआवज़े में शामिल किया जाए.

