'गोबर में पैसा दिखाने का सबूत लाओ'—अयोध्या राम मंदिर निधि घोटाले के आरोपियों के परिवारों का तीखा पलटवार
लवकुश मिश्रा के घर के बाहर वह स्थान, जहां गोबर डाला जाता है. फोटो: आकांक्षा कुमार.
"अच्छा! आप उसी के घर का रास्ता पूछ रहे हैं जिसके यहाँ गोबर के उपलों में छिपाकर रखे गए पैसे मिले हैं? भैया, ऐसे लोगों से तो हम दूरी ही बनाकर रखते हैं." अयोध्या के एक स्थानीय निवासी ने चेहरे पर व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ यह बात कही, जब उनसे इस मामले के मुख्य आरोपी लवकुश मिश्रा के गाँव का रास्ता पूछा गया.
अयोध्या में बने भव्य राम मंदिर के दानपात्र से करोड़ों रुपये की कथित हेराफेरी ने न सिर्फ पूरे देश को झकझोर दिया है, बल्कि धर्मनगरी की साख पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस मामले की जाँच के लिए गठित विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने शुक्रवार (26 जून) को मुख्य आरोपी लवकुश मिश्रा और अनुकल्प मिश्रा सहित आठ लोगों को गिरफ्तार किया है.
"लेकिन, इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा चर्चा उस 'गोबर' की हो रही है, जिसमें कथित तौर पर चोरी की रकम छिपाई गई थी. 'वायर' की टीम ने इस सच्चाई की तह तक जाने के लिए अयोध्या से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित आरोपियों के गाँवों का दौरा किया, जहाँ बदनामी और खौफ के बीच घिरे परिवारों ने एक अलग ही कहानी बयां की.
"वीडियो या फोटो दिखाओ, मीडिया झूठ बोल रहा है" — लवकुश का परिवार
अयोध्या शहर से दूर मीनापुर फगाउली गाँव के एक बेहद साधारण, उखड़े हुए पेंट वाले मकान में लवकुश मिश्रा का परिवार रहता है. पुलिसिया कार्रवाई और मीडिया के कैमरों से डरा यह परिवार अब किसी भी अनजान दस्तक पर सहम जाता है.
लवकुश की बहन स्नेहा (बदला हुआ नाम) के भीतर मीडिया और समाज के तानों को लेकर भारी आक्रोश है. उसने बेहद तीखे लहजे में कहा:
"चाहे मीडिया वाले हों या गाँव के लोग, मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि अगर उनके पास कोई वीडियो या फोटो सबूत है कि पैसा गोबर से या घर के अंदर से बरामद हुआ है, तो उसे सोशल मीडिया पर डाल दें. सच सामने लाएं, झूठ क्यों फैला रहे हैं."
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लवकुश के घर से 10 लाख रुपये बरामद हुए, जिसमें से कुछ कैश घर के अंदर बक्से में और कुछ बाहर गोबर के ढेर में छिपा था. इस पर पलटवार करते हुए स्नेहा कहती हैं:
"हम खुद चाहते हैं कि भगवान राम को न्याय मिले. आखिर हम भी ब्राह्मण हैं. एक शरीफ आदमी को बदनाम किया जा रहा है. अगर हमारे पास इतना पैसा होता, तो क्या आज भी हमारी रसोई में इस काले चूल्हे पर खाना बनता? जो चीज़ बाहर खुले में पड़ी है, कोई वहाँ पैसा क्यों छिपाएगा."
ब्राह्मण अस्मिता और समाज के सवाल
लवकुश का परिवार 'शाकद्वीपीय गोत्र' से आता है, जिनका पारंपरिक काम पूजा-पाठ कराना रहा है. उनके दादा गाँव में पुरोहित थे, जबकि पिता बच्चू लाल पिछले तीन दशकों से गाजियाबाद की लोहा मंडी में मात्र 12,000 रुपये महीने पर काम करते हैं. माँ भी गाजियाबाद में घरों में झाड़ू-पोछा करती हैं.
ऐसे में अयोध्या के चौराहों पर यह चर्चा गर्म है कि "जो कौम रक्षक थी, वह भक्षक कैसे बन गई?" हालांकि, एक वायरल वीडियो में लवकुश के पिता बच्चू लाल ने घर के अंदर से पैसे मिलने की बात स्वीकारी थी, लेकिन उन्होंने गोबर में पैसा छिपाने के दावे का कोई जिक्र नहीं किया था.
जीवनशैली में अचानक बदलाव और 40 लाख की जमीन का रहस्य
लवकुश पहले एक साधारण कार मैकेनिक था और महीने के 10 से 12 हजार रुपये कमाता था. लेकिन जैसे ही उसे राम मंदिर ट्रस्ट में दान के नोटों की गिनती के काम पर रखा गया, उसकी जिंदगी बदल गई.
पड़ोस में रहने वाले जाँगीर बहादुर सिंह बताते हैं:
"जब भी वह छुट्टी पर गाँव आता था, दोस्तों के साथ महफिलें जमती थीं. खाने-पीने और उड़ाने में वह काफी पैसे खर्च करने लगा था. पहले वह सीधा अपने काम पर जाता था, लेकिन नौकरी मिलने के बाद उसके ठाट-बाहर बदल गए थे. हमने सुना है कि उसने फैजाबाद के शहादतगंज इलाके में 40 लाख रुपये की जमीन भी खरीदी है."
हालांकि, लवकुश की बहन इन दावों को पूरी तरह खारिज करती हैं और इसे विरोधियों की साजिश बताती हैं.
19 साल का 'मास्टरमाइंड' अनुकल्प और 65 लाख का फ्लैट
इस पूरे घोटाले का दूसरा और सबसे हैरान करने वाला सिरा मिल्कीपुर तहसील के बसावन गाँव में मिलता है. यहाँ का 19 वर्षीय युवक अनुकल्प मिश्रा इस कथित घोटाले का 'मास्टरमाइंड' बताया जा रहा है.
तकरीबन दो महीने पहले, अप्रैल 2026 में अनुकल्प ने गाँव में एक भव्य 'भागवत कथा' का आयोजन किया था, जिसका बजट 5 से 7 लाख रुपये था. 12वीं पास करने के महज दो साल के भीतर एक लड़के के पास इतना पैसा कहाँ से आया, इस पर गाँव के प्रधान पति धर्मेंद्र कुमार यादव कहते हैं:
"पहले वह बेहद सामान्य जीवन जीता था. ट्रस्ट में शामिल होने के तुरंत बाद हमें पता चला कि उसके पिता ने अयोध्या की आलीशान कौशल्यापुरी कॉलोनी में 65 लाख रुपये का फ्लैट खरीदा है. यही नहीं, छह महीने पहले उसने एक 'स्विफ्ट डिजायर' कार भी खरीदी. गाँव में यह सब चर्चा का विषय था."
चंपत राय से नजदीकी और इस्तीफा
चर्चा है कि अनुकल्प की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बड़ी थीं और इसी सिलसिले में वह राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के करीब आया था. दो साल पहले अनुकल्प के बुलावे पर चंपत राय खुद इस गाँव में एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे. इस घोटाले की आंच आते ही शुक्रवार को चंपत राय ने भी 'नैतिक आधार' पर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.
हालांकि, अनुकल्प के 70 वर्षीय बीमार दादा राजेंद्र प्रसाद मिश्रा इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि भागवत कथा का खर्च उन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई (सूरत और दिल्ली में गार्ड की नौकरी) से उठाया था.
बुनियादी ढाँचे का अभाव और भटके हुए युवा
यह घोटाला अयोध्या के विकास के उस चमकीले नैरेटिव पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है, जिसे योगी सरकार 'ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी' का इंजन बता रही है. एक तरफ सरकार का दावा है कि धार्मिक पर्यटन से अयोध्या को सालाना 4 लाख करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय युवाओं के लिए जमीनी हकीकत कुछ और है.
मीनापुर फगाउली और बसावन जैसे गाँवों में आज भी बच्चों को 10वीं और 12वीं से आगे की पढ़ाई के लिए रोज 20 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. एक स्थानीय एनजीओ 'साथी' की कार्यकर्ता रंजीता शुक्ला कहती हैं, "यहाँ उच्च शिक्षा या रोजगार के साधन नहीं हैं. लड़कियाँ 10वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं." अनुकल्प के दादा भी दर्द बयां करते हुए कहते हैं, "धार्मिक पर्यटन का फायदा नीचे के लोगों तक नहीं पहुँच रहा, हमें बहुत कम मिलता है."
रोजगार के इसी अभाव और रातों-रात अमीर बनने की चाहत ने शायद इन युवाओं को इस रास्ते पर धकेल दिया.
पुलिसिया कार्रवाई पर उठते गंभीर सवाल
उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं (चोरी, आपराधिक विश्वासघात) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है. लेकिन, इस एफआईआर के दर्ज होने की क्रोनोलॉजी पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
घोटाले की भनक लगने के 16 दिन बाद और एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट सौंपने के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई. पूर्व यूपी डीजीपी सुलखान सिंह ने बातचीत में कहा:
"इस मामले में एफआईआर तुरंत दर्ज होनी चाहिए थी. आरोपियों को इतना समय देने से महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो सकते हैं. चूंकि इस ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार द्वारा किया गया था, इसलिए ऐसा लगता है कि राज्य सरकार एफआईआर दर्ज करने में हिचकिचा रही थी."
इससे पहले पूर्व कारसेवक संतोष दुबे और अन्य राजनीतिक दलों ने शिकायतें दी थीं, लेकिन पुलिस ने उन्हें अनसुना कर दिया था. आखिरकार ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ.
साख और आस्था का सवाल
जैसे ही रिपोर्टर ने उस घर के आंगन में पड़े काले चूल्हे की तस्वीर लेने के लिए कैमरा उठाया, अंदर से एक बुजुर्ग महिला (लवकुश की दादी) चिल्लाईं "लो, आ गए आग लगाने!"
यह केवल एक परिवार का गुस्सा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति आक्रोश और शर्मिंदगी है जिसने आस्था के केंद्र को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है. कानून अब अपना काम कर रहा है, लेकिन 'राम नाम' की गूँज के बीच अयोध्या के ये भटके हुए नौजवान और मंदिर के धन पर लगी यह सेंध, आने वाले लंबे समय तक व्यवस्था पर सवाल दागती रहेगी.
आकांक्षा कुमार की यह लेख हिंदी में अनुदित सारांश है. मूल लेख अंग्रेजी में यहाँ पढ़ सकते हैं.

