सीजेआई सूर्यकांत ने राहुल गांधी के मुलाकात के अनुरोध को ‘ना’ क्यों कहा

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विपक्ष के नेताओं के उस अनुरोध को खारिज कर दिया, जिसमें 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आचरण, प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और दिल्ली की नाकेबंदी पर चर्चा के लिए समय मांगा गया था. लेकिन सीजेआई ने ‘ना’ क्यों कहा? ‘द हिंदू’ में कृष्णादास राजगोपाल ने अपनी रिपोर्ट में इसी बात को समझाया है. रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई का यह फैसला राजनीति से तटस्थ दूरी बनाए रखने और संवैधानिक सीमाओं की रक्षा करने के सिद्धांत पर आधारित है.

10 अक्टूबर को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सीजेआई को एक संयुक्त पत्र लिखा. यह एक दुर्लभ अवसर था जब विपक्ष ने दूसरे संवैधानिक प्राधिकरण (सीईसी) की शिकायत के लिए सीधे देश के शीर्ष न्यायिक पद का रुख किया.

पत्र में कहा गया कि नागरिकों पर पुलिस की बर्बर कार्रवाई, छात्रों की मनमानी गिरफ्तारियों, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और बैरिकेडिंग से दिल्ली में "घेराबंदी का माहौल" बन गया है.

11 अक्टूबर को राहुल गांधी ने सीजेआई को एक और विस्तृत पत्र भेजा. करोड़ों मतदाताओं की चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि वे सीईसी चयन समिति के सदस्य थे और उन्होंने 17 फरवरी 2025 की बैठक में ज्ञानेश कुमार के चयन पर औपचारिक असहमति (डिसेंट नोट) जताई थी.

राहुल गांधी ने मांग की कि इस ज्ञापन को जनहित में 'लेटर पिटीशन' माना जाए. चुनाव आयोग (ईसीआई) को एसआईआर के सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश दिया जाए. सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में एक समिति बनाकर हटाए गए नामांकनों का ऑडिट कराया जाए. एसआईआर की प्रक्रिया पर तत्काल अंतरिम रोक लगाई जाए.

12 अक्टूबर को सीजेआई ने दोनों नेताओं के मुलाकात के अनुरोध को खारिज कर दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि सीईसी, गिरफ्तारियों और दिल्ली की नाकेबंदी से जुड़े मामले अदालत के समक्ष पहले से ही विचाराधीन हैं.

सीजेआई के जवाब के मुख्य बिंदु: विचाराधीन मामलों पर अदालत से बाहर चर्चा करना संविधान के मूल ढांचे और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन होगा. संवैधानिक ढांचा सुप्रीम कोर्ट को इन मुद्दों पर प्रशासनिक आधार पर हस्तक्षेप की शक्ति नहीं देता, हालांकि न्यायिक पक्ष से कोर्ट नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. सीजेआई ने नेताओं को सलाह दी कि प्रशासनिक ज्ञापन के बजाय वे न्यायिक याचिका दायर करें. उन्होंने आश्वासन दिया कि 12 अक्टूबर को दायर की जाने वाली किसी भी याचिका पर त्वरित सुनवाई की जाएगी.  इसके बाद राहुल गांधी और 12 अन्य विपक्षी नेताओं ने एक रिट याचिका दायर की, जो सुनवाई के लिए पंजीकृत हो चुकी है.

राजगोपाल की रिपोर्ट के मुताबिक, सीजेआई के इस निर्णय के पीछे तीन प्रमुख कानूनी आधार हैं: शक्तियों का पृथक्करण: न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के अपने-अपने स्पष्ट क्षेत्र हैं. कोर्ट केवल न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही समीक्षा कर सकता है, प्रशासनिक देखरेख के जरिए नहीं. अदालत के बाहर बैठकों पर रोक: पीठ का नेतृत्व कर रहे सीजेआई का अदालत कक्ष से बाहर किसी राजनीतिक दल से मिलना निष्पक्षता के सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय के खिलाफ है. बेंगलुरु सिद्धांत: न्यायिक आचरण के ये अंतर्राष्ट्रीय मानक न्यायाधीशों को किसी भी ऐसे कार्य से बचाते हैं जिससे उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे.

न्यायपालिका और राजनीति: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

न्यायपालिका और राजनीति के बीच संबंधों को लेकर पहले भी विवाद खड़े होते रहे हैं. 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तत्कालीन सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ के आवास पर गणेश पूजा में शामिल होने पर आलोचना हुई थी. एक अन्य अवसर पर, तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी ने सुप्रीम कोर्ट परिसर का दौरा किया था. न्यायमूर्ति गोगोई को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था. संयोग से, न्यायमूर्ति गोगोई उन चार वरिष्ठ सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों में से एक थे जिन्होंने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल में मामलों के आवंटन में कार्यपालिका के प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए जनवरी 2018 में एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी.

पूर्व जजों द्वारा सार्वजनिक रूप से राजनीतिक नेताओं की प्रशंसा (जैसे जस्टिस पी.एन. भगवती का इंदिरा गांधी को पत्र या जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा पीएम मोदी की तारीफ) भी चर्चा में रही है.

ऐतिहासिक टकराव: केशवानंद भारती फैसले के बाद इंदिरा गांधी सरकार द्वारा तीन वरिष्ठ जजों (शेलत, हेगड़े और ग्रोवर) की अनदेखी कर ए.एन. राय को सीजेआई बनाना न्यायपालिका पर कार्यपालिका के प्रभाव का एक बड़ा उदाहरण था, जिसके विरोध में तीनों जजों ने इस्तीफा दे दिया था.

इन्हीं ऐतिहासिक टकरावों और अतिक्रमण से न्यायपालिका को मुक्त रखने के लिए कॉलेजियम प्रणाली और बेंगलुरु सिद्धांतों को अपनाया गया था. सीजेआई सूर्यकांत का हालिया फैसला इसी न्यायिक स्वतंत्रता और मर्यादा को बनाए रखने की एक कड़ी है.

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