ज्ञानेश कुमार: बीजेपी क्यों एक दुविधापूर्ण स्थिति में फंसी हुई है
सत्तारूढ़ दल के लिए धर्मेंद्र प्रधान को हटाना राजनीतिक रूप से संभालना आसान था, लेकिन ज्ञानेश कुमार के मामले में स्थिति अलग है. उन्हें पद पर बनाए रखने या हटाने—दोनों में ही जोखिम हैं.
‘द हिंदू’ में वर्गीस के. जॉर्ज ने लिखा है कि जुलाई में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा जानती थी कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के आगे झुकने से भले ही एक संकट टल जाए, लेकिन इससे एक नया संकट शुरू हो जाएगा. यही वजह थी कि प्रधान को पद से हटाने में आनाकानी की जा रही थी. अब मोदी सरकार के सामने अगला संकट आ खड़ा हुआ है, क्योंकि विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के लिए दबाव बना रहा है.
तकनीकी रूप से कहें तो, ज्ञानेश कुमार के बने रहने या उनके जाने का मोदी सरकार से कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन वास्तव में, यह पूरी तरह से मोदी सरकार से जुड़ा है: इसके राजनीतिक और प्रशासनिक निहितार्थ हैं, और इसकी छवि पर भी असर पड़ता है. अगर प्रधान से हटने के लिए कहना सरकार के लिए कठिन था, तो कुमार से हटने के लिए कहना सरकार के लिए और भी अधिक कठिन है.
प्रधान न केवल युवा प्रदर्शनकारियों के निशाने पर थे, बल्कि भाजपा के भीतर सवर्ण लॉबी के भी निशाने पर थे. एक ओबीसी नेता होने के नाते, विश्वविद्यालयों में भेदभाव-विरोधी व्यवस्था का विस्तार करने वाले यूजीसी दिशानिर्देशों के लिए प्रधान को दोषी ठहराया गया था. उनके जाने का जश्न भाजपा के सवर्ण समर्थकों के एक बड़े वर्ग द्वारा मनाया गया था. प्रधान ने अपनी तरफ से कोई नीति नहीं बनाई थी, क्योंकि शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी कड़ी निगरानी आरएसएस, भाजपा और सरकार के उच्च पदस्थ लोग करते हैं. फिर भी, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ी. मोदी या भाजपा को कोई खास राजनीतिक नुकसान पहुँचाए बिना, पार्टी के बड़े हितों के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया जा सकता था.
ज्ञानेश कुमार के मामले में स्थिति बिल्कुल अलग है, हालांकि सरकार या प्रधानमंत्री के पास उन्हें हटाने को लेकर कोई सीधा निर्णय लेने का अधिकार नहीं है. सरकार उन्हें बर्खास्त नहीं कर सकती, उन्हें केवल एक संसदीय प्रक्रिया के माध्यम से महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है. फिर भी, यदि भाजपा या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि वे पद छोड़ दें, तो कुमार ऐसा करेंगे. उनका पद पर बने रहना पूरी तरह से भाजपा के राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करता है, और भाजपा परस्पर विरोधी विचारों के बीच फंसी हुई है. यह कुछ ऐसी स्थिति है कि "कुंआ इधर तो खाई उधर" (यानी दोनों तरफ नुकसान).
उनके जाने और बने रहने—दोनों से ही मोदी सरकार को भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी. यदि ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह उन सभी अधिकारियों के लिए एक संदेश होगा जो नियमों का पालन करने और राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाओं को पूरा करने के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष करते हैं. ऐसा नहीं है कि भारत की नौकरशाही ने कभी राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम नहीं किया है, लेकिन वर्तमान भाजपा व्यवस्था इसकी सीमाओं की परीक्षा ले रही है. यदि ज्ञानेश कुमार को बीच मझधार में छोड़ दिया जाता है, तो इसका नौकरशाही के भीतर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा. यह प्रभाव हर जगह महसूस किया जाएगा, लेकिन चुनावों के संचालन पर इसका सबसे गंभीर असर पड़ेगा. कुमार के बाद जो भी आएगा, उसके पास यह मानने का कोई कारण नहीं होगा कि वह उतना ही अनुकूल (सुविधाजनक) साबित हो जितना हाल के वर्षों में चुनाव आयोग भाजपा के लिए रहा है.
लेकिन क्या होगा अगर ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में बने रहने की अनुमति दी जाती है? क्या वे अपने आलोचकों को गलत साबित करने की कोशिश करेंगे और अपनी निष्पक्षता साबित करना चाहेंगे? यह मानते हुए भी कि वे पक्षपाती बने रहना चाहते हैं, जैसा कि उन पर आरोप लगाया जाता है, क्या वे अगले चुनाव चक्र में ऐसा कर पाएंगे? यदि वे ऐसा नहीं कर सकते, तो उनके बचाव में जनता का आक्रोश झेलने का क्या फायदा?
ये वे सवाल हैं जो ज्ञानेश कुमार के बारे में अपने समीकरण बनाते समय भाजपा को परेशान कर रहे हैं. अब तक उनके प्रति इसका सार्वजनिक रुख उनके पक्ष में है, और पार्टी से जुड़े कुछ समूह उनके समर्थन में जुलूस निकालकर उन्हें हिंदुओं का उद्धारकर्ता बता रहे हैं! भाजपा यह भी मानती है कि विरोध प्रदर्शन इतने बड़े पैमाने पर लोकप्रिय नहीं हुआ है कि उसे कोई निर्णय लेने के लिए मजबूर होना पड़े, जैसा कि प्रधान के मामले में हुआ था. लेकिन इन सब के बावजूद, भाजपा के लिए इस मामले में कोई भी फैसला आसान नहीं है. और भले ही वे पद छोड़ दें, भाजपा अपनी वैधता और अधिकार की वापसी को लेकर आश्वस्त महसूस नहीं कर सकती.

