एस.वाई. कुरैशी | निर्वाचन आयोग के नाम पर लिए गए फैसले वास्तव में आयोग के अपने फैसले थे भी या नहीं?
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, हालिया खुलासे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से आगे बढ़कर निर्वाचन आयोग की संस्थागत अखंडता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. दो चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) द्वारा 10 महीनों में 14 बार दर्ज कराई गई आपत्तियों से स्पष्ट है कि आयोग में सामूहिक निर्णय लेने की संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार किया गया.
2023 के अधिनियम के अनुसार चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से होने चाहिए, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा. डिजिटल नियंत्रण और अनधिकृत अपीलों से जुड़ी ये अनियमितताएं चुनाव आयोग के भीतर एकतरफा फैसलों को उजागर करती हैं. लोकतंत्र में चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए आयोग को अपने सभी निर्णयों, आवंटनों और रिकॉर्डों में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही साबित करनी होगी.
कुरैशी लिखते हैं कि एक वर्ष से अधिक समय से मैं मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' के विभिन्न पहलुओं की आलोचनात्मक समीक्षा करता रहा हूँ—चाहे वह प्रक्रिया का पूरी तरह से नया स्वरूप हो, अत्यधिक दस्तावेजी बोझ हो, मतदाता पहचान पत्र की उपेक्षा हो, या फिर मतदाता सूचियों से नाम हटाने पर दिया गया अनुचित जोर. इसके चलते लाखों वास्तविक नागरिक चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो गए. लेकिन इस सप्ताह उजागर हुए तथ्यों ने एक कहीं अधिक मौलिक संवैधानिक प्रश्न खड़ा कर दिया है. अब विषय केवल यह नहीं है कि भारत निर्वाचन आयोग के निर्णय प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से सही थे या नहीं, बल्कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या आयोग के नाम पर क्रियान्वित किए गए फैसले वास्तव में स्वयं निर्वाचन आयोग के अधिकृत फैसले थे भी या नहीं?
फाइलों पर उठीं आपत्तियां और अनधिकृत फैसले
हालिया रिपोर्टों से यह गंभीर तथ्य सामने आया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने आधिकारिक फाइलों में दर्ज किया: "ईसीआई की ओर से ये अपीलें दायर करने के लिए किसे और किसके द्वारा अधिकृत किया गया था?" यह सवाल पश्चिम बंगाल में एसआईआर के संदर्भ में उठाया गया था. आँकड़े स्थिति की गंभीरता को उजागर करते हैं. एसआईआर के तहत हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22.21 लाख ने नाम पुनरुद्धार के लिए आवेदन किया. इसके विपरीत, 16.10 लाख अन्य अपीलें उन मतदाताओं को हटाने के लिए दायर की गईं जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने जाँच के बाद पात्र पाया था. आयोग ने यह कभी स्पष्ट नहीं किया कि इस दूसरी श्रेणी की अपीलें वास्तव में किसने दायर की थीं. संधू और दूसरे आयुक्त विवेक जोशी दोनों ने फाइलों पर दर्ज किया कि उन्हें अथवा पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं दी गई थी.
यह केवल अधिकारियों के बीच का आपसी मतभेद नहीं है, बल्कि यह आयोग की कानूनी और संवैधानिक पहचान पर सीधा आघात है. 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, संधू और जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं जिन्हें उनकी सहमति या जानकारी के बिना लागू किया गया था. ये मामले मतदाता पंजीकरण, फॉर्म 6 में संशोधन, नामों की बहाली और डिजिटल डेटाबेस (ECINet) के नियंत्रण जैसे अति-संवेदनशील चुनावी विषयों से जुड़े थे.
संवैधानिक प्रावधान और सामूहिक नेतृत्व का सिद्धांत
कुरैशी के मुताबिक, भारतीय कानून के तहत निर्वाचन आयोग के संचालन की रूपरेखा पूरी तरह स्पष्ट है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 के अनुसार, आयोग का कामकाज यथासंभव सर्वसम्मति से होना चाहिए. मतभेद की स्थिति में निर्णय बहुमत की राय के आधार पर लिया जाना अनिवार्य है. मुख्य चुनाव आयुक्त एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय के अध्यक्ष होते हैं, वे पूरी संस्था का विकल्प या अकेले सर्वाधिकार संपन्न प्राधिकारी नहीं हो सकते.
सर्वोच्च न्यायालय ने 1995 के ऐतिहासिक 'टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ' मामले में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था कि व्यक्ति विशेष को मुख्य रखकर पूरी संस्था को ओझल करना पूर्णतः अनुचित है. यदि तीन सदस्यीय आयोग में दो आयुक्त किसी निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखे जाते हैं, तो वे कोई असहमत अल्पमत नहीं हैं, बल्कि वे कानूनन 'वैधानिक बहुमत' का निर्माण करते हैं.
उदाहरण के लिए, 'निर्वाचकों का पंजीकरण नियम, 1960' के तहत निर्धारित फ़ॉर्म 6 में बिना विधायी संशोधन के केवल प्रशासनिक आदेश से बदलाव किया गया, जिस पर जोशी और संधू ने कड़ी आपत्ति जताई. इसके बावजूद संशोधित फॉर्म पोर्टल पर जारी रहा, जिसे बाद में आयुक्तों द्वारा "अनधिकृत और अवैध" करार दिया गया. इसी तरह, कानूनन नाम जोड़ने और हटाने का वैधानिक अधिकार स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) के पास है, परंतु केंद्रीय स्तर पर डिजिटल नियंत्रण के कारण अधिकारियों के फैसले पोर्टल पर अपडेट नहीं हो सके. तकनीक का उद्देश्य वैधानिक प्राधिकार की सहायता करना है, न कि उसका स्थान लेना.
विरोधाभासी स्पष्टीकरण और पारदर्शिता की आवश्यकता
सामने आई रिपोर्टों के बाद आयोग का रुख और अधिक भ्रम पैदा करता है. शुरुआत में अनाम "सूत्रों" के हवाले से दावा किया गया कि सभी फैसले सर्वसम्मति से हुए थे. बाद में जारी आधिकारिक प्रेस नोट में कहा गया कि मतभेद स्वाभाविक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए थे. हालाँकि, यह वक्तव्य फाइल पर दर्ज दो आयुक्तों की लिखित आपत्तियों और इस दावे के बीच मौजूद स्पष्ट विरोधाभास का समाधान नहीं प्रस्तुत करता.
निर्वाचन आयोग इस विवाद को बेहद पारदर्शी तरीके से हल कर सकता है. आयोग को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि:
1. एसआईआर से जुड़े कौन-कौन से मुख्य फैसले पूर्ण आयोग द्वारा मंजूर किए गए थे?
2. किस आधिकारिक आवंटन नियम के तहत तीनों सदस्यों को शामिल किए बिना निर्णय लिए गए?
3. पश्चिम बंगाल में अपीलें दायर करने की स्वीकृति किसने दी थी?
4. डिजिटल पोर्टल ECINet पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ईआरओ) का वास्तविक अधिकार कितना बरकरार है?
कहने का सार यह है कि संस्थागत स्वतंत्रता का अर्थ केवल कार्यपालिका के दबाव से मुक्त होना ही नहीं है, बल्कि संस्था के भीतर एकतरफा फैसलों और स्वेच्छाचारिता के खिलाफ सुरक्षा कवच होना भी है. बहु-सदस्यीय आयोग की स्थापना सामूहिक बुद्धिमत्ता और संवैधानिक संतुलन सुनिश्चित करने के लिए की गई थी. जब निर्वाचन आयोग देश के लगभग 100 करोड़ मतदाताओं से चुनावी नियमों के कठोर पालन की अपेक्षा करता है, तो उसे स्वयं भी अपने प्रत्येक निर्णय में समान संवैधानिक पारदर्शिता और विधिक मर्यादा प्रदर्शित करनी होगी.
(एस.वाई. कुरैशी भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं. यह अंग्रेजी में उनके मूल लेख का हिंदी में अनूदित अंश है)

