आईडीबीआई में केंद्र और एलआईसी की हिस्सेदारी औने-पौने दाम पर बेचने से जनहित को नुकसान और गंभीर कानूनी सवाल 

पूर्व केंद्रीय सचिव ई. ए. एस. सरमा ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर आईडीबीआई बैंक में केंद्र सरकार और एलआईसी की हिस्सेदारी फेयरफैक्स को बेचने की प्रस्तावित योजना पर गंभीर आपत्तियां जताई हैं. उनका आरोप है कि निवेश और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन विभाग यानी डीआईपीएएम बैंक की हिस्सेदारी उसकी वास्तविक क्षमता और संपत्तियों के मूल्य से काफी कम कीमत पर बेचने की तैयारी कर रहा है. उन्होंने इसे जनहित के खिलाफ बताते हुए सौदे को रोकने की मांग की है.

सरमा के अनुसार, आईडीबीआई के पास देश के कई बड़े शहरों में बेहद मूल्यवान जमीन और भवन हैं. इनमें से कई संपत्तियां भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत "सार्वजनिक उद्देश्य" के लिए अधिग्रहित की गई थीं. उस समय सरकारी नियंत्रण वाली कंपनी के लिए किया गया अधिग्रहण निजी स्वामित्व में हस्तांतरण की स्थिति में कानूनी सवाल खड़े करता है. उनका कहना है कि यदि आईडीबीआई किसी निजी कंपनी के नियंत्रण में चला जाता है, तो ऐसी जमीनों के स्वामित्व और संभावित वापसी की स्थिति स्पष्ट करनी होगी. इसके बावजूद बोली दस्तावेजों में इस मुद्दे का पर्याप्त उल्लेख नहीं है.

उन्होंने आईडीबीआई की हैदराबाद स्थित 50 एकड़ से अधिक जमीन का उदाहरण दिया है. तेलंगाना सरकार की हालिया नीलामी में उस क्षेत्र की जमीन का मूल्य लगभग 269 करोड़ रुपये प्रति एकड़ सामने आया था. इस आधार पर केवल हैदराबाद की जमीन का मूल्य लगभग 13,450 करोड़ रुपये हो सकता है. देश के अन्य शहरों में स्थित संपत्तियों को जोड़ने पर बैंक की जमीनों का कुल मूल्य बहुत अधिक हो सकता है. सरमा का कहना है कि जमीन और भवनों के अलावा बैंक के मानव संसाधन, शाखाओं के नेटवर्क तथा सरकारी विकास योजनाओं में उसकी भूमिका का भी आर्थिक महत्व है. इसलिए बिना पर्याप्त प्रतिस्पर्धा के कम आरक्षित मूल्य पर हिस्सेदारी बेचना सरकारी संपत्ति के साथ अन्याय होगा.

सरमा ने आईडीबीआई के कर्मचारियों और आरक्षण व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव को भी महत्वपूर्ण बताया है. वर्तमान में केंद्र सरकार और एलआईसी के पास बैंक की 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है. इस कारण आईडीबीआई सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था के रूप में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए संवैधानिक आरक्षण तथा कल्याणकारी नीतियों का पालन करता है. प्रस्तावित 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी के निजीकरण के बाद इन व्यवस्थाओं के समाप्त होने का खतरा है. इससे वंचित वर्गों के लिए रोजगार के अवसर प्रभावित होंगे और आईडीबीआई में काम कर रहे लगभग 9,500 अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों के भविष्य में अनिश्चितता पैदा होगी.

बैंक की 6,911 महिला कर्मचारी और 884 दिव्यांग कर्मचारी भी उसकी समावेशी रोजगार नीति का हिस्सा हैं. निजीकरण के बाद इन नीतियों के जारी रहने की कोई निश्चित गारंटी नहीं होगी. सरमा ने कहा कि सरकार को कर्मचारियों की आशंकाओं को नजरअंदाज करने के बजाय उनके अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए.

उन्होंने आईडीबीआई की विकास वित्त संस्था के रूप में भूमिका का भी उल्लेख किया. बैंक की देशभर में 2,122 शाखाएं हैं, जो दूरदराज के क्षेत्रों में भी बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं. आईडीबीआई में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत 18.72 लाख से अधिक खाते, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के 10.86 लाख से अधिक खाताधारक, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के 3.81 लाख से अधिक खाताधारक और अटल पेंशन योजना के 5.48 लाख से अधिक खाताधारक जुड़े हैं. बैंक 191 आधार नामांकन केंद्र भी संचालित करता है. सतारा जिले में उसके ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान ने 7,165 उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दिया है, जिनमें 5,241 लोगों को रोजगार मिला.

सरमा ने आशंका जताई कि निजी या विदेशी स्वामित्व के बाद बैंक किसानों, छोटे कारोबारियों और विद्यार्थियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती कर सकता है. महानगरों और शहरी शाखाओं में किसान क्रेडिट कार्ड ऋण पर ब्याज सहायता मार्च 2019 से बंद है. यदि बैंक पूरी तरह निजी नियंत्रण में चला जाता है, तो ग्रामीण और अर्धशहरी शाखाओं में किसानों को ऋण देने, मुद्रा तथा पीएम स्वनिधि जैसी योजनाओं और बिना गारंटी वाले शिक्षा ऋणों पर भी असर पड़ सकता है.

पत्र में 2003 के संसदीय आश्वासन का भी उल्लेख है. वित्त संबंधी स्थायी समिति ने सिफारिश की थी कि सरकार आईडीबीआई में अपनी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम न करे, क्योंकि आम जनता की लगभग 10,000 करोड़ रुपये की पूंजी बैंक में लगी हुई थी. इसके बाद तत्कालीन वित्त मंत्री ने लोकसभा और राज्यसभा में आश्वासन दिया था कि सरकार आईडीबीआई में हमेशा कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखेगी. सरमा के अनुसार, प्रस्तावित निजीकरण इस आश्वासन का उल्लंघन है.

31 मार्च 2026 तक आईडीबीआई में जनता की जमा राशि 3,47,163 करोड़ रुपये और बैंक का कुल कारोबार 6,00,789 करोड़ रुपये था. छोटे निवेशकों ने सरकारी समर्थन की उम्मीद में अपनी बचत बैंक में लगाई है. इसलिए निजीकरण से उनके भरोसे को नुकसान पहुंच सकता है. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बैंक और उसके शेयरधारकों को डीआईपीएएम की योजना की जानकारी नहीं थी, तो छोटे शेयरधारकों को विश्वास में क्यों नहीं लिया गया.

बोली प्रक्रिया पर भी सरमा ने सवाल उठाए हैं. शुरुआत में फेयरफैक्स, कोटक और एनडीबी के नाम सामने आए थे, लेकिन कोटक के हटने के बाद फेयरफैक्स प्रमुख दावेदार रह गया. फेयरफैक्स पहले से कैथोलिक सीरियन बैंक में बहुमत हिस्सेदारी रखता है. ऐसे में एक ही समूह के दो बैंकों पर नियंत्रण को हितों के टकराव और बैंकिंग क्षेत्र में स्वामित्व के केंद्रीकरण के रूप में देखा जा सकता है.

सरमा ने केंद्र सरकार से आईडीबीआई के निजीकरण का प्रस्ताव वापस लेने और बैंक को विकास वित्त संस्था के रूप में मजबूत करने की मांग की है. उनका कहना है कि जल्दबाजी में हिस्सेदारी बेचने से जनता, कर्मचारियों, छोटे निवेशकों और एलआईसी के लाखों पॉलिसीधारकों के हित प्रभावित होंगे. राजकोषीय संसाधन जुटाने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश एक प्रतिकूल नीति है, जिस पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए.

ई. ए. एस. सरमा भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित अंश है.

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