मोदी सरकार का चुनाव कानून अब भी लागू, सुप्रीम कोर्ट में दो साल से फैसला लंबित

‘आर्टिकल 14’ में सार्थक गुप्ता और प्रन्नव धवन लिखते हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में ढाई साल से फैसला लंबित है. 23 सितंबर 2026 को दो जजों की पीठ ने इस मामले पर विभाजित फैसला दिया. जस्टिस दीपांकर दत्ता ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने की जरूरत नहीं मानी, जबकि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने संविधान पीठ के सामने सुनवाई को जरूरी माना. अब मामला मुख्य न्यायाधीश के पास है, लेकिन अगली सुनवाई की तारीख तय नहीं हुई है.

2023 के कानून ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाली समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया. अब समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं. इस कानून को 2 जनवरी 2024 को लागू किया गया और उसी दिन इसे चुनौती सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी. जनवरी 2024 में अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

लेखकों के अनुसार, इस मामले में देरी केवल एक कानूनी विवाद का मामला नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में मामलों को किस पीठ के सामने रखा जाए और कब सुनवाई हो, इसमें मुख्य न्यायाधीश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन इस प्रक्रिया के लिए स्पष्ट सार्वजनिक नियम उपलब्ध नहीं हैं. इससे ऐसी स्थिति बन सकती है जिसमें किसी कानून की संवैधानिकता पर फैसला लंबित रहते हुए वह कानून लागू रहे.

इस कानून के तहत मार्च 2024 से चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां हुईं और फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया. यह नियुक्ति ऐसे समय हुई जब इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी थी. इसके बाद चुनाव आयोग ने बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का बचाव किया. ड्राफ्ट सूची से करीब 65 लाख नाम बाहर किए गए थे और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को प्रत्येक नाम हटाने का कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया.

मामले की सुनवाई शुरू होने के बाद भी प्रक्रिया में नया मोड़ आया. याचिकाकर्ताओं की दलीलें पूरी होने के बाद अटॉर्नी जनरल ने संविधान के अनुच्छेद 145(3) का हवाला देते हुए कहा कि मामले की सुनवाई पांच जजों की पीठ को करनी चाहिए. सॉलिसिटर जनरल ने भी इसका समर्थन किया. इससे पहले सरकार की लिखित दलीलों और शुरुआती बहस में बड़ी पीठ की मांग नहीं की गई थी. 30 जुलाई को जजों ने केवल इसी सवाल पर फैसला सुरक्षित रखा और 55 दिन बाद दोनों जजों ने इस मुद्दे पर अलग-अलग राय दी.

जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को मामला भेजने से इनकार किया, जबकि जस्टिस शर्मा ने इसे जरूरी माना. दत्ता ने अपने आदेश में नियुक्ति समिति की संरचना पर भी कई टिप्पणियां कीं. उन्होंने अटॉर्नी जनरल की उस दलील का उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री संभवतः प्रधानमंत्री के खिलाफ मतदान नहीं करेंगे. हालांकि, ये टिप्पणियां अंतिम फैसला नहीं थीं और मामले की संवैधानिक वैधता पर बाध्यकारी निष्कर्ष भी नहीं थीं.

लेखक सुप्रीम कोर्ट की बेंच आवंटन व्यवस्था को लेकर पुराने विवादों का भी उल्लेख करते हैं. 2018 में जस्टिस बीएच लोया की मौत की जांच से जुड़ी याचिकाओं को लेकर बेंच आवंटन पर सवाल उठे थे. मेडिकल कॉलेज रिश्वत मामले और 2019 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों से जुड़े मामले में भी बेंच गठन को लेकर विवाद हुआ था. लेखकों के अनुसार, इनमें से कोई घटना अपने आप में कदाचार साबित नहीं करती, लेकिन ये मामले बेंच आवंटन की पारदर्शिता पर सवाल जरूर उठाते हैं.

लेख में सुप्रीम कोर्ट के नियमों और संविधान के अनुच्छेद 13 के बीच संबंध पर भी सवाल उठाया गया है. अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कानून शून्य होता है. लेकिन यदि किसी कानून की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई ही लंबे समय तक लंबित रहे, तो उसके लागू रहने की स्थिति बनी रहती है.

लेखकों का निष्कर्ष है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में किसी खास नतीजे का वादा करने की जरूरत नहीं है, लेकिन चुनौती को समयबद्ध तरीके से सुनने वाली पीठ और निर्णय मिलना जरूरी है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून की वैधता का सवाल जितना लंबा लंबित रहेगा, उतना ही यह सवाल बना रहेगा कि संवैधानिक चुनौती का फैसला कब और किस प्रक्रिया के तहत होगा.

सार्थक गुप्ता और प्रन्नव धवन नई दिल्ली स्थित अधिवक्ता हैं और दोनों पहले सुप्रीम कोर्ट में लॉ क्लर्क के रूप में काम कर चुके हैं.

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