सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की संभल हिंसा के आरोपी अफरोज की एनएसए हिरासत, यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना

‘आर्टिकल 14’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा के आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत 351 दिनों की निवारक हिरासत को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है. अदालत ने कहा कि हिरासत का आदेश “निवारक नहीं, बल्कि दंडात्मक” था और एनएसए का इस्तेमाल जमानत के आदेशों को निष्प्रभावी करने के लिए किया गया.

अफरोज को संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा का “मुख्य सूत्रधार” बताया गया था. वह संपत्ति कारोबारी और व्यवसायी हैं और इलाहाबाद हाई कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार नियमित रूप से आयकर का भुगतान करते थे. 29 सितंबर 2026 की रात मुरादाबाद जिला जेल से रिहा होने से पहले वह कुल 585 दिन जेल में रह चुके थे.

संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हुए सर्वे के बाद 24 नवंबर 2024 को हिंसा भड़की थी. इसके बाद अफरोज के खिलाफ छह प्राथमिकी दर्ज हुईं. हालांकि, पहली प्राथमिकी में उनका नाम नहीं था और पुलिस ने उन्हें घटना के 54 दिन बाद 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया. उनके वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत के दौरान उन्हें प्रताड़ित किया गया और दबाव में उनसे कथित स्वीकारोक्ति कराई गई.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 9 सितंबर 2025 को एक मामले में अफरोज को नियमित जमानत दी थी. इसके 34 दिन बाद 13 अक्टूबर को संभल के जिलाधिकारी ने एनएसए के तहत उन्हें निवारक हिरासत में लेने का आदेश दिया. जून 2026 तक अफरोज को सभी छह आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी थी, लेकिन वह एनएसए के कारण जेल में रहे.

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि पुलिस के सामने की गई कथित स्वीकारोक्ति अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकती. अदालत ने यह भी पाया कि पुलिस द्वारा हिरासत में कथित दबाव और प्रताड़ना के आरोपों का राज्य सरकार ने संतोषजनक खंडन नहीं किया था.

अदालत ने मामले में पेश किए गए अन्य सबूतों पर भी सवाल उठाए. हिरासत आदेश में सीसीटीवी और वीडियो रिकॉर्डिंग को मामले का प्रमुख आधार बताया गया था, लेकिन ये रिकॉर्ड 22 दस्तावेजों में शामिल नहीं थे और न ही अफरोज या अदालतों को उपलब्ध कराए गए. अदालत ने सवाल उठाया कि अगर इन रिकॉर्डिंग से अफरोज को हिंसा का “मुख्य सूत्रधार” साबित किया जा सकता था, तो उनकी गिरफ्तारी में 54 दिन की देरी क्यों हुई.

मोबाइल फोन से जुड़े साक्ष्यों में भी विरोधाभास पाया गया. आदेश में अफरोज और एक अज्ञात “बॉस” के बीच संदेशों को साजिश का आधार बताया गया, जबकि उसी आदेश में कहा गया था कि फोन का डेटा मिटा दिया गया था और संदेश बरामद नहीं हुए थे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनएसए का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामलों में मिली जमानत को निष्प्रभावी करने के लिए नहीं किया जा सकता. अदालत ने अफरोज को हुई “स्वतंत्रता की भारी क्षति” को देखते हुए 10 लाख रुपये का भुगतान एक महीने के भीतर करने का आदेश दिया. फैसले ने निवारक हिरासत के लिए पुलिस स्वीकारोक्ति और कमजोर या अप्रमाणित साक्ष्यों के इस्तेमाल पर भी महत्वपूर्ण कानूनी सवाल स्पष्ट किए.

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