अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रैट्स द्वारा संसद के दोनों सदनों (सीनेट और प्रतिनिधि सभा) पर कब्जा जमाने से भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते की बातचीत तेज हो सकती है. हालांकि, समझौता अंतिम रूप लेने तक भारत को उच्च शुल्कों (टैरिफ) का सामना भी करना पड़ सकता है.
टी. सी. ए. शरद राघवन के विश्लेषण के मुताबिक घरेलू स्तर पर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करने के लिए राष्ट्रपति ट्रम्प भारत पर जल्द समझौता करने का दबाव बढ़ा सकते हैं. दूसरी ओर, भारतीय वार्ताकार इस बदले राजनीतिक परिदृश्य को अपने पक्ष में एक बेहतर डील हासिल करने के अवसर के रूप में देख रहे हैं.
अमेरिका का बढ़ता दबाव और भारत की रणनीति
व्यापार थिंक-टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (जीटीआरआई) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, रूस, चीन और ईरान पर विदेश नीति का दबाव न चलने के बाद ट्रम्प को अपनी अमेरिकी साख साबित करने के लिए त्वरित आर्थिक जीत की दरकार है. वे अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल कर भारत से अमेरिकी कृषि और औद्योगिक उत्पादों के लिए बाजार पहुँच तथा अन्य रियायतें हासिल करने का दबाव बढ़ा सकते हैं.
‘कोआन एडवाइजरी ग्रुप’ के निदेशक दीप पाल का मानना है कि संसद में बहुमत खोने के बाद ट्रम्प के लिए अपनी नीतियों पर समर्थन जुटाना कठिन होगा, इसलिए भारतीय पक्ष इसे गतिरोध तोड़ने और अनुकूल समझौता हासिल करने के अवसर के रूप में देख सकता है. हालांकि, व्हाइट हाउस पीछे हटने के बजाय अपने रुख को और सख्त करने के लिए जाना जाता है.
भारत पर अतिरिक्त शुल्कों की आशंका
अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कानूनी प्रावधानों के तहत ट्रम्प के पास कांग्रेस की अनुमति के बिना भी भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के पर्याप्त अधिकार मौजूद हैं:
ग्राहम एक्ट (2026): रूसी तेल और गैस आयात करने वाले देशों (जैसे भारत) पर 100% तक शुल्क लगाने का प्रावधान. दोनों दलों का समर्थन प्राप्त होने के कारण ट्रम्प यदि इसे लागू करते हैं, तो डेमोक्रेट-नियंत्रित कांग्रेस इसका विरोध नहीं करेगी.
धारा 301 (ट्रेड एक्ट 1974): अमेरिका यह जाँच कर रहा है कि क्या भारत अपनी अतिरिक्त निर्माण क्षमता का इस्तेमाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने के लिए कर रहा है. इसके तहत ट्रम्प बिना संसदीय मंज़ूरी के नए शुल्क लगा सकते हैं. (बंधुआ श्रम रोकथाम से जुड़े 10% शुल्क पहले से लागू हैं).
धारा 232 (व्यापार विस्तार अधिनियम 1962): स्टील और एल्युमीनियम पर लगे 50% शुल्कों को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है, जिन्हें हटाना अब डेमोक्रेट्स के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए भी संभव नहीं होगा.

