ईरान युद्ध के बाद भारत-अमेरिका रिश्तों में दरार, भरोसे का संकट गहराया
अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी में प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि ईरान युद्ध भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके कारण भारत और अमेरिका के रिश्तों में आई खटास लंबे समय तक बनी रह सकती है. लेखक का तर्क है कि हालिया घटनाओं ने दोनों देशों के बीच मौजूद रणनीतिक भरोसे को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.
लेख के अनुसार, तनाव की शुरुआत तब हुई जब 9 जून को ओमान की खाड़ी में अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई. भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से इस घटना पर कड़ा विरोध दर्ज कराया, लेकिन अमेरिका की ओर से न तो माफी मांगी गई और न ही भविष्य में ऐसी घटनाएं रोकने का कोई आश्वासन दिया गया. इससे नई दिल्ली में असंतोष बढ़ा.
विश्लेषण में कहा गया है कि ईरान युद्ध का सबसे बड़ा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 89 प्रतिशत आयात करता है, इसलिए युद्ध के दौरान तेल की कीमतों में उछाल ने महंगाई बढ़ा दी. उर्वरक, रसोई गैस और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हुईं. पश्चिम एशिया में काम कर रहे भारतीयों से आने वाली धनराशि (रेमिटेंस) भी प्रभावित हुई. इसके साथ ही समुद्री व्यापार की लागत बढ़ने और आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा आने से भारतीय निर्यात क्षेत्र पर दबाव बढ़ा.
लेख में दावा किया गया है कि इन परिस्थितियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को झटका दिया, रुपये पर दबाव बढ़ा और विदेशी निवेशकों ने पूंजी निकालनी शुरू कर दी. ऐसे समय में सरकार के लिए राहत पैकेज या बड़े सार्वजनिक निवेश कार्यक्रम चलाना भी मुश्किल हो गया है.
राजनीतिक स्तर पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने चुनौती बढ़ी है. लेखक के अनुसार, मोदी ने लंबे समय से भारत को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन भारतीय नाविकों की मौत और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या भारत अपने नागरिकों और अपने समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहा है.
लेख पाकिस्तान की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताता है. लेखक के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई, जिससे इस्लामाबाद की कूटनीतिक अहमियत बढ़ी. यह भारत की उस नीति के उलट माना गया है जिसके तहत वह पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिश करता रहा है.
मई में भारत आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की यात्रा को भी इस पृष्ठभूमि में देखा गया है. लेख का कहना है कि दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से रिश्तों को मजबूत बताया, लेकिन वास्तविक उपलब्धियां सीमित रहीं. वहीं अमेरिका द्वारा भारत से अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की अपेक्षा भी नई दिल्ली के लिए असहज करने वाली मानी गई.
विश्लेषण में यह भी कहा गया है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीति बदल रही है. ट्रंप प्रशासन चीन के खिलाफ व्यापक रणनीतिक गठबंधन की जगह अधिक लेन-देन आधारित संबंधों पर जोर दे रहा है. इसका असर क्वाड और भारत-अमेरिका साझेदारी पर भी पड़ सकता है.
हालांकि रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और महत्वपूर्ण तकनीकों पर काम जैसी परियोजनाएं जारी रहेंगी, लेकिन लेखक का मानना है कि भरोसे की कमी इन पहलों की गति को धीमा कर सकती है. लेख के अंत में कहा गया है कि भारत को अब केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय अपनी घरेलू आर्थिक और सामरिक क्षमता मजबूत करनी होगी तथा वैश्विक स्तर पर अपने विकल्पों का विस्तार करना होगा.

