व्यापम घोटाले की तह तक पहुंचना है तो सीबीआई को ‘ट्रेन और बोगी’ समझनी होगी

‘स्क्रोल’ के मुताबिक,मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले की जांच जब सीबीआई को सौंपी गई, तब यह केवल एक परीक्षा घोटाले की जांच नहीं थी. यह उस पूरे तंत्र की पड़ताल की जिम्मेदारी थी जिसने वर्षों तक मेडिकल कॉलेजों, सरकारी नौकरियों और पेशेवर पाठ्यक्रमों में प्रवेश की व्यवस्था को भ्रष्टाचार के हवाले कर दिया.

घोटाले की परतें जुलाई 2013 में खुलनी शुरू हुईं. एमबीबीएस प्रवेश परीक्षा से एक दिन पहले मध्य प्रदेश पुलिस की अपराध शाखा ने इंदौर के एक होटल पर छापा मारा. वहां ऐसे छात्र मिले जो उत्तर प्रदेश और बिहार से आए थे. पूछताछ में पता चला कि उनका उद्देश्य मध्य प्रदेश में पढ़ाई करना नहीं था. उन्हें इसलिए लाया गया था ताकि स्थानीय उम्मीदवार उनकी उत्तर पुस्तिकाओं से नकल कर सकें.

जांच आगे बढ़ी तो डॉक्टर जगदीश सागर तक पहुंची. उनके पास से 413 ऐसे अभ्यर्थियों की सूची मिली जिनके बारे में संदेह था कि उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए पैसे दिए थे. इसके बाद जांच की दिशा व्यापम के भीतर तक पहुंच गई और यह स्पष्ट होने लगा कि परीक्षा प्रणाली में बड़े पैमाने पर संगठित धांधली चल रही थी.

संदेह पहले से थे

व्यापम घोटाला अचानक पैदा नहीं हुआ था. प्रश्नपत्र लीक होने और परीक्षाओं में गड़बड़ी की शिकायतें 2000 के दशक की शुरुआत से लगातार सामने आ रही थीं. विधायक परस सकलेचा 2009 से विधानसभा में इस मुद्दे को उठा रहे थे.

फिर भी कार्रवाई सीमित रही. गिरफ्तारियां मुख्य रूप से दलालों, बिचौलियों और कुछ अधिकारियों तक सिमट गईं. आलोचकों का आरोप था कि जांच उन लोगों तक नहीं पहुंच रही थी जिन्होंने इस पूरे नेटवर्क को संरक्षण दिया.

यही वजह थी कि जब सुप्रीम कोर्ट ने मामला सीबीआई को सौंपा, तब भी कई व्हिसलब्लोअरों ने केवल एजेंसी बदलने को पर्याप्त नहीं माना. उनकी मांग थी कि जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो.

धांधली के कारोबार का उभार

व्यापम घोटाले को समझने के लिए इंदौर को समझना जरूरी है. यहीं से जगदीश सागर का नेटवर्क संचालित होता था. प्रमुख व्हिसलब्लोअर आनंद राय और परस सकलेचा भी यहीं सक्रिय थे.

सकलेचा के अनुसार 2000 के आसपास यह धंधा छोटे स्तर पर था. कोई छात्र किसी दूसरे छात्र से अपनी जगह परीक्षा दिलवा देता था. लेकिन 2004 के आसपास कोचिंग संस्थानों ने इसे संगठित रूप देना शुरू किया. वे मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए फर्जी परीक्षार्थियों की व्यवस्था करने लगे.

धीरे-धीरे बड़े गिरोह सामने आए. ये गिरोह उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से मेधावी छात्रों को लाते थे और उन्हें सॉल्वर के रूप में इस्तेमाल करते थे. एक गिरोह एक साल में दर्जनों सॉल्वर उपलब्ध करा सकता था.

इलाकों का बंटवारा

जैसे-जैसे कारोबार बढ़ा, प्रतिस्पर्धा भी बढ़ने लगी. छात्र अलग-अलग गिरोहों के बीच कीमतों की तुलना करने लगे. इससे विवाद पैदा हुए और अंततः गिरोहों ने मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों को आपस में बांट लिया.

आनंद राय के अनुसार जगदीश सागर ने शुरुआत भिंड से की थी लेकिन बाद में विवादों के कारण इंदौर में अपना आधार बनाया. अन्य लोग भोपाल और प्रदेश के दूसरे हिस्सों में सक्रिय थे.

इस दौर तक फर्जी परीक्षार्थी मॉडल की अपनी सीमाएं थीं. इसके लिए लगातार मेधावी छात्रों की जरूरत पड़ती थी. साथ ही उम्मीदवार और सॉल्वर के बीच पहचान छिपाना भी मुश्किल होता जा रहा था.

इसी दौरान प्रश्नपत्र लीक करने का मॉडल भी समानांतर रूप से चल रहा था. कुछ छात्रों को परीक्षा से ठीक पहले प्रश्नपत्र दिखाए जाने के आरोप लगते रहे.

केंद्रीकरण का उदय

2007 के आसपास व्यापम की कहानी ने नया मोड़ लिया.

रिपोर्टों के अनुसार इसी दौर में पंकज त्रिवेदी व्यापम के परीक्षा नियंत्रक बने. आरोप रहे कि उनकी नियुक्ति राजनीतिक प्रभाव के कारण हुई थी.

यहीं से धांधली का केंद्र परीक्षा केंद्रों से हटकर व्यापम के प्रशासनिक और कंप्यूटर सिस्टम तक पहुंच गया. अब खेल मैदान में नहीं बल्कि नियंत्रण कक्ष में खेला जाने लगा.

‘ट्रेन और बोगी’ मॉडल

व्यापम घोटाले की सबसे चर्चित व्यवस्था "ट्रेन और बोगी" कहलाती थी.

इस मॉडल में प्रत्येक भुगतान करने वाले उम्मीदवार को एक मेधावी सॉल्वर के साथ जोड़ा जाता था. दलालों द्वारा उम्मीदवारों और सॉल्वरों की सूची व्यापम के भीतर पहुंचाई जाती थी. इसके बाद रोल नंबर और सीटिंग व्यवस्था इस तरह तैयार की जाती थी कि उम्मीदवार अपने सॉल्वर के पास बैठे.

परीक्षा के दौरान उम्मीदवार आसानी से सॉल्वर की उत्तर पुस्तिका देखकर उत्तर लिख सकता था.

यह मॉडल केवल तभी संभव था जब व्यापम के भीतर बैठे लोग रोल नंबर आवंटन और सीटिंग प्लान में बदलाव करें.

बढ़ती महत्वाकांक्षा

धांधली का दूसरा मॉडल और भी खतरनाक था.

पैसे देने वाले उम्मीदवारों को निर्देश दिया जाता था कि वे अपनी ओएमआर शीट लगभग खाली छोड़ दें. बाद में सही उत्तर भर दिए जाते थे.

इस मॉडल ने पूरे खेल को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया. अब परीक्षा हॉल में नकल कराने की जरूरत भी कम हो गई थी. नियंत्रण पूरी तरह उन लोगों के हाथ में था जो परीक्षा प्रणाली के भीतर मौजूद थे.

धीरे-धीरे यह व्यवस्था राज्य के प्रभावशाली वर्ग तक पहुंच गई. शुरुआत में लोग अपने बच्चों के लिए प्रवेश दिलाने का अनुरोध करते थे. बाद में कई प्रभावशाली लोग खुद प्रवेश और भर्ती के सौदों में शामिल होने लगे.

तीन मॉडल

2012 तक व्यापम में धांधली के तीन प्रमुख मॉडल स्थापित हो चुके थे.

पहला मॉडल था प्रश्नपत्र लीक करना.

दूसरा मॉडल था "ट्रेन और बोगी", जिसमें उम्मीदवार सॉल्वर के पास बैठकर उत्तर नकल करता था.

तीसरा मॉडल था ओएमआर शीट को खाली छोड़ना और बाद में उसमें उत्तर भरना.

इन तीनों व्यवस्थाओं ने अलग-अलग तरह के ग्राहकों को आकर्षित किया. किसी के पास राजनीतिक पहुंच थी, कोई दलालों के नेटवर्क से जुड़ा था और कुछ लोग केवल पैसे के बल पर व्यवस्था में घुस रहे थे.

और भी विकल्प

समय के साथ यह पूरा नेटवर्क एक व्यवस्थित बाजार में बदल गया.

मेडिकल छात्रों के अनुसार पोस्टग्रेजुएट मेडिकल सीटों के लिए करोड़ों रुपये तक की रकम ली जाती थी. रेडियोलॉजी, मनोरोग, नेत्र रोग, ऑर्थोपेडिक्स और डर्मेटोलॉजी जैसी शाखाओं की सबसे अधिक मांग थी क्योंकि इनमें भविष्य की कमाई ज्यादा मानी जाती थी.

कुछ छात्रों को परीक्षा से पहले पूरा प्रश्नपत्र दिखाने का वादा किया जाता था. जो इतनी बड़ी रकम नहीं दे सकते थे, उन्हें सीमित प्रश्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी थी.

सामान्य और आरक्षित वर्ग के छात्रों के लिए भी अलग-अलग दरें बताई जाती थीं.

इस बीच आरोप यह भी लगे कि कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों ने सरकारी कोटे की सीटें बेचने के लिए व्यापम नेटवर्क का इस्तेमाल किया.

व्यापम के भीतर

मध्य प्रदेश पहले से डॉक्टरों की भारी कमी झेल रहा था. ऐसे में यदि अयोग्य उम्मीदवार मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पा रहे थे तो इसका असर पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक था.

फिर भी सवाल यह है कि किसी स्तर पर प्रभावी रोकथाम क्यों नहीं हुई.

व्यापम एक स्वायत्त संस्था थी. इसके शीर्ष पर वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होते थे. एक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स भी था जिसमें तकनीकी शिक्षा मंत्री शामिल रहते थे.

लेकिन पूरे घोटाले में सबसे प्रभावशाली भूमिका परीक्षा नियंत्रक की दिखाई देती है.

एक और सवाल 413 संदिग्ध छात्रों की सूची को लेकर उठता है. परीक्षा हो चुकी थी और परिणाम आ चुके थे. सरकार ने जांच पूरी होने तक इन छात्रों को पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी. इस फैसले का विरोध भी हुआ और कई छात्रों ने आंदोलन किया.

सवाल सत्ता के शीर्ष तक

व्यापम घोटाले से जुड़े कई प्रश्न तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार तक पहुंचते हैं.

2008 से 2012 के दौरान शिक्षा विभाग उनके पास था. पंकज त्रिवेदी की नियुक्ति कैसे हुई? भ्रष्टाचार की शिकायतों के बावजूद व्यापम का दायरा लगातार क्यों बढ़ाया गया? मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के अलावा पुलिस, वन विभाग और अन्य सरकारी नौकरियों की भर्ती भी उसी संस्था को क्यों सौंपी गई?

एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि घोटाले से अर्जित धन आखिर किन-किन स्तरों तक पहुंचा.

इसी के साथ यह भी जांच का विषय है कि जब अखिल भारतीय मेडिकल प्रवेश परीक्षा व्यवस्था लागू होने वाली थी, तब उसे टालने का फैसला किसने लिया और क्यों लिया.

व्यापम घोटाले की असली कहानी कुछ छात्रों, दलालों और अधिकारियों तक सीमित नहीं है. यह उस संस्थागत विफलता की कहानी है जिसमें शिकायतें वर्षों तक आती रहीं, लेकिन व्यवस्था बदलने की जगह और मजबूत होती गई.

यही वजह है कि यदि सीबीआई को इस घोटाले की असली तह तक पहुंचना है तो उसे सिर्फ आरोपियों की सूची नहीं, बल्कि उस पूरे "ट्रेन और बोगी" सिस्टम को समझना होगा जिसने व्यापम को भारत के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में बदल दिया.

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