सम्राट अशोक का 13वां मुख्य शिलालेख, जिसे 'कलिंग शिलालेख' भी कहा जाता है, इतिहास के सबसे चर्चित दस्तावेजों में से एक है. इस शिलालेख में अशोक उस भीषण जनसंहार का खुला विवरण देते हैं जो उनकी सेना ने कलिंग में किया था. एक दुर्लभ सार्वजनिक स्वीकारोक्ति में वे बताते हैं कि युद्ध के दौरान एक लाख लोग मारे गए, डेढ़ लाख को निर्वासित किया गया और अनगिनत अन्य लोगों की मृत्यु हुई. एक ऐसे दौर में जब सम्राट अपनी विजयों और बड़े दानों का ढिंढोरा पीटने में व्यस्त रहते थे, अशोक का अपनी प्रजा के सामने अपने अपराध को स्वीकार करना और पश्चाताप करना एक अभूतपूर्व घटना थी.
इस शिलालेख के शुरुआती हिस्से पर अक्सर चर्चा होती है, लेकिन इसके बाद आने वाली पंक्तियाँ आमतौर पर ध्यान आकर्षित नहीं कर पातीं. उसी शिलालेख में अशोक अचानक रुख बदलते हैं और जंगल में रहने वाले आदिवासियों को एक कड़ी चेतावनी जारी करते हैं. वे स्पष्ट करते हैं कि भले ही उन्होंने ‘अहिंसा’ का मार्ग अपना लिया है, लेकिन उनके पास दंड देने की पूरी शक्ति है और हिंसा आज भी उनके राजसी तंत्र का हिस्सा है. कुछ ही पंक्तियों में वे एक सम्राट के रूप में अपनी सर्वोच्च सत्ता को पुनः स्थापित करते हैं और पूर्ण आज्ञाकारिता की मांग करते हैं.
टी. एम. कृष्णा के अनुसार, अशोक द्वारा आदिवासियों को दी गई इस चेतावनी के पीछे मुख्य कारण संसाधन थे. वनों से ही इमारती लकड़ी, हाथी और अन्य बहुमूल्य सामग्रियां प्राप्त होती थीं. स्पष्ट है कि आदिवासियों ने अपने भू-भाग पर साम्राज्य के अतिक्रमण का विरोध किया होगा और सेना पर हमले भी किए होंगे. यह सम्राट की ओर से एक सख्त प्रतिक्रिया थी. संवाद और शांति की तमाम बातों के बावजूद, जब भी साम्राज्य के निहित स्वार्थों को संसाधनों की आवश्यकता पड़ी, उन्हें बलपूर्वक हासिल किया गया और प्रतिरोध का दमन किया गया.
समकालीन भारत और हाशिए के समुदायों की व्यथा
ऐतिहासिक घटनाओं की यह श्रृंखला आज के आधुनिक भारत में आदिवासियों, दलितों और मछुआरों की संघर्ष गाथा से हैरान कर देने वाली समानता रखती है. आज भी हम लगातार सुनते हैं कि कैसे उनकी कृषि भूमि छीनी जा रही है, जंगलों और पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है, गांव डुबाए जा रहे हैं और उनके आजीविका व पूजा-पाठ के स्थानों को मिटाया जा रहा है.
हममें से जो लोग सुरक्षित और संरक्षित शहरी परिवेश में रहते हैं, वे इस विनाश को विकास के नाम पर 'आवश्यक' ठहरा देते हैं. वास्तविक प्रतिरोध को राष्ट्रविरोधी करार दिया जाता है और हाशिए के इन नागरिकों के पक्ष में खड़े होने वाले कार्यकर्ताओं को अपराधी, धर्म परिवर्तन कराने वाला या विदेशी एजेंट बता दिया जाता है. इस प्रकार समाज और हम सब मिलकर राज्य के लिए दमन का काम आसान कर देते हैं. सैद्धांतिक रूप से भले ही हम इनकार करें, लेकिन सच यह है कि हम इस भूमि के मूल निवासियों की वास्तविक स्थिति को लेकर उदासीन हैं. पिछले एक दशक में उनकी पहचान, संस्कृति, भाषा और भूमि को व्यवस्थित रूप से छीना गया है. वे राष्ट्र के लिए केवल तभी उपयोगी माने जाते हैं जब हमें सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन करना होता है.
ओडिशा से लेकर चेन्नई तक: विकास बनाम अधिकार
कलिंग यानी आज का ओडिशा, अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है, जो इस विडंबना का सबसे बड़ा केंद्र है. हाल ही में ओडिशा की सिजीमाली पहाड़ियों में आदिवासी और दलित भूमि अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले रैंडल सिकेरा और लक्ष्मण नायक को गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कई आपराधिक मामले लाद दिए गए. उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे कॉरपोरेट घरानों द्वारा जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ आदिवासियों के साथ खड़े थे. डॉक्टर सिकेरा स्थानीय समुदायों की स्वास्थ्य सेवाओं में भी योगदान दे रहे थे. सिजीमाली, कुटरूमाली और नियमगिरी की पहाड़ियों में अडानी और वेदांता जैसे बड़े निगमों द्वारा बॉक्साइट खनन के दावे किए गए हैं, और इसका विरोध करने वालों पर दमनकारी कार्रवाई आम बात है.
यह प्रवृत्ति केवल ओडिशा तक सीमित नहीं है. बिहार में पहाड़िया और संताल समुदाय की जमीनें थर्मल पावर प्लांट के नाम पर सौंपी जा रही हैं, निकोबार के आदिवासियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर खामोश कर दिया गया है, और चेन्नई में मछुआरे अपनी आजीविका और स्वास्थ्य को तबाह करने वाले थर्मल पावर स्टेशनों तथा तटों को पाटने वाली सड़कों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. दूसरी ओर, विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग अपने अवकाश के लिए पार्कों की मांग करता है, जबकि हाशिए के लोग समुद्र तट की रेत पर भी अपना हक नहीं जता सकते. प्रकृति के साथ सदियों से तालमेल बिठाकर रहने वाले इन समुदायों की उपेक्षा करके हम पर्यावरण या ग्रह को नहीं बचा सकते.
राजनीतिक सीमाएं और राज्य-निगम गठजोड़
हाशिए के लोगों पर होने वाला यह हमला किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है. विपक्ष में रहते हुए जो दल आदिवासियों के पक्ष में खड़े होते हैं, वे सत्ता में आते ही अपनी नीति बदल लेते हैं. गरीबों को बेहतर जीवन का सपना दिखाया जाता है, लेकिन अंततः वे अपनी ही जमीन पर बाहरी लोगों की दया पर निर्भर मजदूर बनकर रह जाते हैं. सरकारें और निगम मिलकर ऐसा जटिल कानूनी जाल बुनते हैं, जिससे निकलना असंभव हो जाता है. जब मानवाधिकार कार्यकर्ता या गैर-सरकारी संगठन इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं, तो उन्हें सुनियोजित तरीके से बदनाम किया जाता है.
एक संवेदनशील समाज की आवश्यकता
न्यूयॉर्क की एक सभा में चर्चा के दौरान एक युवा ने टिप्पणी की थी कि एक 'दयालु राज्य' का विचार अपने मूल स्वरूप में ही एक भ्रम है, क्योंकि सरकारी संस्थान स्वभाव से पदानुक्रमित और दमनकारी होते हैं. ऐसे में दया और न्याय की उम्मीद केवल राज्य से नहीं, बल्कि पूरे समाज से की जानी चाहिए. अधिकार, समानता और सांस्कृतिक पहचान जैसे मूल्य जब तक समाज के एक छोटे से कुलीन वर्ग द्वारा नियंत्रित होते रहेंगे—चाहे वे राजनीतिक मंच हों या कॉरपोरेट बोर्डरूम—तब तक एक मानवीय और संवेदनशील राज्य एक अधूरा सपना ही रहेगा. जब तक हम समाज के हर सदस्य को समान मानकर उनका सम्मान करना नहीं सीखेंगे, तब तक वास्तविक न्याय संभव नहीं है.
(टी.एम. कृष्णा एक प्रमुख भारतीय संगीतकार और प्रसिद्ध सार्वजनिक विचारक हैं. यह हिंदी में अनूदित और संपादित है, अंग्रेजी में मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है.)

