अरुण श्रीवास्तव | धर्मनिरपेक्ष भारत की पहचान बदलने की दक्षिणपंथी योजना उजागर
‘काउंटरकरंट्स’ में अरुण श्रीवास्तव ने लिखा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की ओर से शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के पीछे कथित राजनीतिक मंशा उजागर होने से भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान और चुनावी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. उनका आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल 2029 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत सुनिश्चित करने और देश को हिंदू राष्ट्र की दिशा में ले जाने के लिए किया जा रहा है.
श्रीवास्तव के मुताबिक, विपक्षी दलों ने एसआईआर को मुख्य रूप से दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से वंचित किए जाने के रूप में देखा, लेकिन मतदाता सूची से हटाए गए लगभग 18 करोड़ नामों की पृष्ठभूमि की पड़ताल नहीं की. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इन सभी मतदाताओं को रोहिंग्या या बांग्लादेशी घुसपैठिया मान लिया गया था. लेख में बांग्लादेश की आबादी लगभग 11 करोड़ और भारत में रह रहे रोहिंग्या लोगों की संख्या करीब 5,000 बताई गई है. लेखक का कहना है कि दोनों समूहों की कुल संख्या हटाए गए मतदाताओं से बहुत कम है.
उनका तर्क है कि विपक्ष एसआईआर के व्यापक राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को समझने में विफल रहा. उनके मुताबिक, गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से वंचित करने से अमीरों, सामंतों और बड़े पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ सकता है. वह इस संभावित व्यवस्था को ऐसी “नई भारत” की कल्पना से जोड़ते हैं, जिसमें हिंदुत्व और कॉरपोरेट पूंजी को प्राथमिकता मिलेगी. लेख में बड़े उद्योग समूहों को सरकारी समर्थन, कॉरपोरेट करों में कटौती, भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों में बदलाव को आर्थिक असमानता बढ़ाने वाली नीतियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
राजग सहयोगियों की चिंता
लेख के अनुसार, विपक्ष के विरोध के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के तीन सहयोगी दलों—तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा—ने भी चुनाव आयोग से पारदर्शिता की मांग की है. क्षेत्रीय दल स्थानीय जातीय समीकरणों और सीमित अंतर वाले निर्वाचन क्षेत्रों पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में मतदाता सूची में बदलाव उनके चुनावी आधार को प्रभावित कर सकते हैं.
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि सरकार का हिस्सा होने का अर्थ किसी संवैधानिक संस्था का बिना सवाल समर्थन करना नहीं है. पासवान ने मुख्य चुनाव आयुक्त से आयोग का पक्ष स्वयं सामने रखने को भी कहा. श्रीवास्तव इन मांगों को क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक स्वायत्तता और चुनावी अस्तित्व से जुड़ी चिंता के रूप में देखते हैं.
चुनाव आयोग के भीतर असहमति
लेख में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर 10 महीनों में दर्ज 14 आपत्तियों का उल्लेख है. भारत में मतदाता सूची का संशोधन परंपरागत रूप से विकेंद्रीकृत व्यवस्था के तहत होता रहा है. निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ), जिनमें उप-मंडल मजिस्ट्रेट भी शामिल हैं, अपने क्षेत्र में नाम जोड़ने, सुधारने और हटाने के वैधानिक अधिकार रखते हैं.
लेकिन लेख में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग ने एक सूचना प्रौद्योगिकी इकाई बनाकर धीरे-धीरे ये अधिकार दिल्ली स्थित केंद्रीय आईटी विभाग में केंद्रित कर दिए. इसके चलते स्थानीय अधिकारियों को सॉफ्टवेयर तक पहुंच नहीं मिली और वे अपने स्तर पर त्रुटियां सुधारने या बदलाव करने में असमर्थ हो गए.
एसआईआर के तहत 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 18 करोड़ नाम हटाए जाने का दावा किया गया है. दो असहमत चुनाव आयुक्तों ने बड़े पैमाने पर नाम हटाने और नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में बदलावों पर आपत्ति जताई. उनका कहना था कि ये निर्णय उचित अनुमति के बिना एकतरफा तरीके से लागू किए गए, जिससे पात्र मतदाता मताधिकार से वंचित हो सकते हैं.
सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका
श्रीवास्तव का कहना है कि प्रशासनिक केंद्रीकरण और जवाबदेही की कमी से सार्वजनिक संस्थाओं का इस्तेमाल नागरिकों के विरुद्ध किया जा सकता है. उन्होंने पश्चिम बंगाल में पुलिस कार्रवाई का भी उल्लेख किया है. साथ ही, चुनाव आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि दोनों आयुक्तों को महत्वपूर्ण डेटाबेस बदलावों और प्रक्रियागत निर्णयों की जानकारी से दूर रखा गया.
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने दोनों आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की सराहना की. लेख में राहुल गांधी के उस बयान का भी जिक्र है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कथित चुनावी साजिश की जांच के दायरे में लाने की बात कही थी.
अब सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका पर ध्यान केंद्रित है. पश्चिम बंगाल एसआईआर की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा था कि किसी मौजूदा चुनाव में मतदान न कर पाना नागरिक का मताधिकार हमेशा के लिए समाप्त नहीं करता और सत्यापन लंबित होने पर नाम भविष्य के चुनावों के लिए बहाल किए जा सकते हैं.
इस बीच, तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने 44 पन्नों की पुलिस शिकायत में मुख्य चुनाव आयुक्त को 2023 के कानून के तहत मिली अभियोजन से सुरक्षा के दायरे को चुनौती दी है. उन्होंने आरोप लगाया कि आंतरिक असहमति के बावजूद एकतरफा फैसले लेकर मतदाता सूची में कथित हेरफेर किया गया. शिकायत में जालसाजी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों की जांच तथा प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई है.
इस पूरे विवाद के केंद्र में मतदाता सूची में बदलाव की पारदर्शिता, स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के अधिकार और चुनाव आयोग की जवाबदेही के प्रश्न हैं.
(यह अरुण श्रीवास्तव के मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.)

