अरुण श्रीवास्तव | मोहन भागवत का विरोध प्रदर्शनों और सत्ता परिवर्तन पर दोहरा रवैया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का इस वर्ष विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजा के दौरान दिया गया भाषण राजनीतिक दोहरेपन और रणनीतिक रुख का उदाहरण है. नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों और शासन की विफलताओं के खिलाफ युवा, खासकर जेन जी, सड़कों पर उतरकर विरोध कर रहे हैं. ऐसे में भागवत के लिए विरोध की राजनीति को पूरी तरह खारिज करना मुश्किल था. उन्होंने बीच का रास्ता अपनाते हुए प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी कि वैश्विक स्तर की कथित “आसुरी” ताकतें नफरत फैलाने, सामाजिक विभाजन गहरा करने और सत्ता परिवर्तन की कोशिशों के लिए उनका इस्तेमाल कर सकती हैं.

इससे करीब एक महीने पहले, समाज के संपन्न और उच्चवर्गीय परिवारों से आने वाले युवाओं के बीच बोलते हुए भागवत ने कहा था कि विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा हैं. नागपुर में विजयादशमी के भाषण के दौरान भी उन्होंने विरोध को संवाद का एक रूप बताया. जब सरकार नागरिकों की आवाज नहीं सुनती और संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो आंदोलन करना लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बन जाता है. उन्होंने यह भी कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र में अलग-अलग विचारों के लिए जगह होनी चाहिए और चर्चा के जरिए सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए.

ऐसे में यह सवाल उठता है कि जो विरोध प्रदर्शन एक समय लोकतांत्रिक संवाद का वैध माध्यम था, वह अचानक नफरत फैलाने या विदेशी ताकतों से प्रेरित सत्ता परिवर्तन की साजिश कैसे बन गया? भागवत का यह रुख उन आंदोलनों के प्रति संघ परिवार की असहजता को उजागर करता है, जो भाजपा सरकार की नीतियों और कामकाज पर सवाल उठाते हैं. हालांकि, घरेलू असंतोष और बड़े जन आंदोलनों को बाहरी ताकतों द्वारा कथित रूप से प्रभावित किए जाने के बीच अंतर करना जरूरी है.

विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में जनता की शिकायतों को सामने रखने का एक वैध माध्यम हैं. भागवत ने शिक्षा और परीक्षा संबंधी अनियमितताओं के खिलाफ जेन जी छात्रों के आंदोलनों को भी उचित ठहराया था. उन्होंने कहा था कि छात्रों की शिकायतें वास्तविक हैं और विरोध करने से कोई नागरिक राष्ट्रविरोधी नहीं हो जाता. शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक व्यवस्था के भीतर समस्याओं के समाधान के लिए संवाद का माध्यम हो सकते हैं.

हालांकि, लेखक का तर्क है कि आरएसएस की संगठनात्मक परंपरा जन आंदोलनों के बजाय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, शाखाओं और कार्यकर्ताओं के माध्यम से अनुशासन तथा शीर्ष से नीचे तक निर्देशों के पालन पर आधारित रही है. महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले भारत छोड़ो आंदोलन जैसे जन आंदोलनों से संघ दूर रहा और उसने प्रत्यक्ष जन संघर्षों के बजाय संगठन निर्माण को प्राथमिकता दी. आपातकाल के दौरान तत्कालीन संघ प्रमुख बालासाहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर समझौते, संगठन पर लगे प्रतिबंध को हटाने और मुख्यधारा के आंदोलनों से दूरी बनाने की कोशिश की थी. लेखक के अनुसार, सत्ता से टकराव के बजाय संस्थागत सहयोग और संगठन विस्तार संघ की परंपरा का हिस्सा रहे हैं.

विरोध प्रदर्शनों के प्रति संघ का समर्थन लेखक की नजर में एक राजनीतिक छलावा है. आंदोलनों से दक्षिणपंथी सरकारों की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है, क्योंकि इनके जरिए मध्यम वर्ग और श्रमिक वर्ग अपनी आर्थिक तथा राजनीतिक शिकायतें सामने रखते हैं. जब संस्थागत माध्यम जवाबदेही सुनिश्चित करने में विफल रहते हैं, तब सामूहिक कार्रवाई सरकारों पर नीतिगत बदलाव का दबाव बनाती है.

भारत में परीक्षा संबंधी अनियमितताओं और बेरोजगारी के खिलाफ युवाओं के प्रदर्शनों ने सरकारों पर दबाव बनाया है. लेख में ‘कॉकरोच’ आंदोलन का उल्लेख करते हुए दावा किया गया है कि छात्र आंदोलनों के दबाव में एक शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. इसी तरह, लंबे समय तक चले किसान आंदोलन ने तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए सरकार को मजबूर किया. व्यापक जन आंदोलन अलग-अलग विपक्षी दलों को एक मंच पर ला सकते हैं और चुनावों में सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी दलों के खिलाफ माहौल बना सकते हैं.

लेखक का आरोप है कि दक्षिणपंथी ताकतें अक्सर विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने के लिए हिंसा और अव्यवस्था का सहारा लेती हैं. हाल के महीनों में जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन को बदनाम करने की कोशिशों का उल्लेख करते हुए वह अक्टूबर 2026 में चुनाव आयोग के खिलाफ हुए प्रदर्शन की घटनाओं की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनके अनुसार, केंद्रीय दिल्ली में सीजेपी के प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों पर हमले हुए. हनुमान सेना से जुड़े लोगों पर कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शनकारियों का पीछा करने, धमकाने और उन पर शारीरिक हमला करने के आरोप लगाए गए. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दक्षिणपंथी ताकतें छात्र आंदोलनों और आर्थिक असंतोष का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करती रही हैं. फ्रांस में हिंसक छात्र प्रदर्शनों और आर्थिक दंगों से मरीन ले पेन की दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली को राजनीतिक लाभ मिलने का उदाहरण दिया गया है.

भागवत ने अपने भाषण में पश्चिमी देशों से आने वाले कथित “तूफान” का जिक्र करते हुए कहा कि सामाजिक अशांति और सत्ता परिवर्तन के आंदोलन फ्रांस, अल्बानिया, बांग्लादेश और नेपाल जैसे देशों में सांस्कृतिक मूल्यों को कमजोर कर रहे हैं और भारत को भी निशाना बना सकते हैं. लेखक के अनुसार, इस भाषा का उद्देश्य लोगों में भय पैदा करना और घरेलू असंतोष, शासन की विफलताओं तथा जवाबदेही की मांग से ध्यान हटाना है. भागवत ने सत्ता परिवर्तन की आशंका को राष्ट्रीय चेतना, एकता और गौरव से जोड़ते हुए कहा कि मजबूत नेतृत्व और बढ़ती जन जागरूकता के कारण भारत में ऐसा परिवर्तन नहीं होगा.

लेखक इस दावे को भी चुनौती देते हैं कि प्रदर्शन किसी विदेशी साजिश का हिस्सा हैं. उनके अनुसार, भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं ने राहुल गांधी और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में एसआईआर तथा चुनाव संबंधी मुद्दों पर हो रहे प्रदर्शनों को कथित सत्ता परिवर्तन अभियान से जोड़ने की कोशिश की है. वह सवाल उठाते हैं कि यदि विदेशी ताकतों की कोई ठोस साजिश है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पास इसके प्रमाण क्यों नहीं हैं. लेख में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मोदी के संबंधों का उल्लेख करते हुए इसी दावे पर सवाल खड़े किए गए हैं.

लेख में आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का भी जिक्र है. लेखक का कहना है कि संघ की राष्ट्रवादी विचारधारा पर बीसवीं सदी के शुरुआती यूरोपीय राष्ट्रवादी विचारों का प्रभाव रहा है और पश्चिमी देशों में उससे जुड़े प्रवासी भारतीय संगठनों के जरिए उसका प्रभाव तथा धन जुटाने की क्षमता भी मौजूद है. ऐसे में विदेशी हस्तक्षेप के बारे में ठोस जानकारी सामने रखने के बजाय जनता के सामने भ्रामक संदेश पेश करना विरोधाभासी है.

लेखक के अनुसार, ‘रेजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का अर्थ किसी सरकार या शासक व्यवस्था को बदलना है. प्रशांत भूषण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि यदि सरकार मतदाता सूचियों के मामले में कथित मनमानी जारी रखती है, तो सत्ता परिवर्तन अपरिहार्य हो सकता है. उन्होंने सरकार बदलने की मांग को लोकतंत्र में नागरिकों का बुनियादी अधिकार बताया. इसका अर्थ संवैधानिक व्यवस्था को खत्म करना या हिंसा के जरिए सरकार गिराना नहीं, बल्कि शासक दल को बदलना भी हो सकता है.

सत्ता परिवर्तन चुनाव और मतपत्र के जरिए शांतिपूर्ण ढंग से भी हो सकता है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता चुनाव के माध्यम से सत्तारूढ़ दल, सरकार या नेतृत्व को बदल सकते हैं, बिना संविधान को उलट-पलट किए. इसलिए सत्ता परिवर्तन को अपने आप में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा या विदेशी साजिश का पर्याय मानना लोकतांत्रिक अधिकारों की अनदेखी होगी.

(अरुण श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं. मूल लेख अंग्रेजी में यहां पढ़ा जा सकता है.)

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