हिंदी में लिखे कोर्ट के फैसले राष्ट्रीय बहस से क्यों गायब हो जाते हैं?

इस महीने मध्य प्रदेश की एक सत्र अदालत ने सिवनी मालवा के पास एक मुस्लिम मवेशी परिवहनकर्ता की पीट-पीटकर हत्या के मामले में सात लोगों को दोषी ठहराया. अदालत ने सबूतों की मजबूत श्रृंखला के आधार पर फैसला सुनाया और जहां पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले, वहां दोषसिद्धि से परहेज किया. ऐसे मामलों में, जहां अक्सर जांच कमजोर पड़ जाती है और आरोपी बरी हो जाते हैं, यह फैसला अलग नजर आता है.

इसके बावजूद इस फैसले पर राष्ट्रीय स्तर पर लगभग कोई चर्चा नहीं हुई. इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि फैसला हिंदी में लिखा गया था.

वी. वेंकटेशन के मुताबिक, भारत में कानून और न्याय से जुड़ी सार्वजनिक बहस अंग्रेजी के इर्द-गिर्द केंद्रित है. सुप्रीम कोर्ट और अंग्रेजी में आने वाले हाई कोर्ट के फैसलों पर व्यापक चर्चा होती है, जबकि जिला और सत्र अदालतों के फैसले लगभग नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. संविधान का अनुच्छेद 348(1)(क) भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्यवाही में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाता है.

लेकिन अधिकांश भारतीयों, खासकर गरीब और हाशिये पर रहने वाले लोगों के लिए न्याय व्यवस्था का वास्तविक चेहरा निचली अदालतें ही हैं. जमानत, दोषसिद्धि या बरी होने जैसे फैसले यहीं होते हैं. यानी कानून की असली परीक्षा जिला अदालतों में होती है, जहां फैसले भारतीय भाषाओं में लिखे जाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हजारों फैसलों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद कराने की पहल की है, ताकि वे आम लोगों और निचली अदालतों तक पहुंच सकें. मुख्य न्यायाधीश भी कह चुके हैं कि ‘कानूनी अंग्रेजी’ आम नागरिकों के लिए कठिन है. लेकिन यह व्यवस्था केवल एक दिशा में काम करती है. यदि किसी जिला अदालत ने हिंदी, मराठी या तमिल में कोई महत्वपूर्ण फैसला दिया है, तो उसे राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं है. ऐसे फैसले तभी सामने आते हैं, जब कोई पत्रकार या वकील निजी स्तर पर उनका अनुवाद करे.

निचली अदालतों की अनदेखी

वेंकटेशन लिखते हैं कि इस अनदेखी का असर न्यायिक जवाबदेही पर पड़ता है. निचली अदालतों की चर्चा तब होती है, जब उनसे कोई गलती होती है, जैसे जमानत से इनकार, लंबी न्यायिक हिरासत या गलत दोषसिद्धि. लेकिन यदि कोई न्यायाधीश कठिन परिस्थितियों में कानून और सबूतों के आधार पर सही फैसला देता है, तो उसकी शायद ही कभी चर्चा होती है. केवल विफलताओं को दर्ज करना जवाबदेही नहीं है.

मॉब लिंचिंग के मुकदमों में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है. ऐसे मामलों में गवाह अक्सर मुकर जाते हैं, जांच कमजोर होती है और आरोपी बरी हो जाते हैं. ऐसे में यदि कोई अदालत परखे हुए साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि करती है और जहां सबूत खत्म हो जाते हैं, वहीं रुक जाती है, तो वह कानून के शासन को मजबूत करती है. लेकिन यदि ऐसा फैसला केवल इसलिए राष्ट्रीय चर्चा से बाहर रह जाए कि वह किसी छोटे शहर की अदालत में हिंदी में लिखा गया है, तो यह न्याय व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा.

वेंकटेशन याद दिलाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के तहसीन पूनावाला मामले में मॉब लिंचिंग से जुड़े मामलों में गवाहों की सुरक्षा और पीड़ितों को मुआवजा देने जैसे निर्देश दिए थे. लेकिन इन निर्देशों का पालन वास्तव में जिला अदालतों में ही सुनिश्चित होता है. इसके बावजूद राष्ट्रीय कानूनी बहस का केंद्र केवल सर्वोच्च अदालत के आदेश बने रहते हैं.

वे उत्तर प्रदेश के हापुड़ की एक अदालत का उदाहरण भी देते हैं, जिसने मोहम्मद कासिम की हत्या के मामले में दस लोगों को दोषी ठहराया था और पुलिस जांच की खामियों को भी दर्ज किया था. दोषसिद्धि की खबर तो सुर्खियों में रही, लेकिन हिंदी में लिखा गया फैसला राष्ट्रीय स्तर पर लगभग अनदेखा रह गया.

समान ध्यान देने की ज़रूरत

वेंकटेशन का मानना है कि कानूनी पत्रकारिता और शोध को केवल सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक सीमित नहीं रहना चाहिए. जिला अदालतों को भी संवैधानिक न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखा जाना चाहिए. जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया जाता है, उसी तरह जिला अदालतों के महत्वपूर्ण फैसलों को भी राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए.

वे लेख के अंत में लिखते हैं कि सिवनी मालवा का फैसला उन्हें संयोग से मिला. लेकिन हर सप्ताह देशभर की अदालतों में ऐसे न जाने कितने महत्वपूर्ण फैसले लिखे जाते होंगे, जिन्हें केवल इसलिए नहीं पढ़ा जाता क्योंकि वे भारतीय भाषाओं में हैं. उनके अनुसार, कानून के समक्ष समान न्याय की शुरुआत समान ध्यान से होती है. जब तक निचली अदालतों के फैसलों को भी राष्ट्रीय विमर्श में उचित स्थान नहीं मिलेगा, तब तक न्याय व्यवस्था की पूरी तस्वीर हमारे सामने नहीं आ सकेगी.

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