2003 में आपके पिता ने कहाँ वोट दिया था? एसआईआर में लेगेसी दस्तावेज़ों की मांग का कानूनी आधार क्यों नहीं है
पंजाब में एसआईआर के दौरान मतदाताओं का सत्यापन करते निर्वाचन कर्मी.
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, पटियाला के एक 33 वर्षीय युवक का मामला इस पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए काफी है. वह जन्म से आज तक एक ही पते पर रह रहा है. उसकी मां दशकों से उसी पते पर मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं और वह स्वयं भी पिछले 15 वर्षों से लगातार मतदान करता आ रहा है. इसके बावजूद बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) उससे यह साबित करने को कह रहे हैं कि उसके पिता 2002-03 में किस निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज थे.
निर्वाचन आयोग के एन्यूमरेशन फॉर्म में "योग्य संबंधी" केवल पिता नहीं, बल्कि मां, दादा या दादी भी हो सकते हैं. यानी युवक की मां का नाम पर्याप्त आधार हो सकता है. लेकिन कई राज्यों में बीएलओ केवल पिता की पुरानी मतदाता प्रविष्टि या ईपीआईसी पर जोर दे रहे हैं. यह कानून की नहीं, बल्कि प्रशिक्षण की कमी का परिणाम है.
पत्रकार की गवाही
यह समस्या सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार गोपीकृष्ण ने भी ऐसा ही अनुभव साझा किया है. वह 1989 से केरल में मतदाता थे, लेकिन नौकरी के कारण दिल्ली आ गए. पड़ोसियों की सूचना पर उनका नाम केरल की मतदाता सूची से हटा दिया गया. जब उन्होंने केरल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी से शिकायत की तो उन्होंने सवाल किया कि तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी भी वर्षों से दिल्ली में रह रहे थे, फिर उनका नाम क्यों नहीं हटाया गया? इस सवाल का कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला.
बाद में गोपीकृष्ण ने दिल्ली में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराया. उनका निष्कर्ष था कि निर्वाचन आयोग की प्रक्रियाएं पहले भी जटिल थीं, लेकिन एसआईआर ने उन्हें आम मतदाताओं के लिए और अधिक कठिन बना दिया है. कानून स्पष्ट कहता है कि किसी व्यक्ति का सामान्य निवास उसकी वास्तविक मंशा और परिस्थितियों से तय होता है, न कि किसी पड़ोसी की सूचना से.
1.संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 स्पष्ट रूप से कहता है कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकरण का अधिकार रखता है. संविधान केवल कुछ सीमित आधारों पर अयोग्यता स्वीकार करता है, जैसे नागरिकता का अभाव, अस्वस्थ मानसिक स्थिति, अपराध या भ्रष्ट चुनावी आचरण.
कहीं भी यह नहीं कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता की 2003 की मतदाता सूची नहीं दिखा सकता तो उसका मतदाता अधिकार समाप्त हो जाएगा.
अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार नए पात्रता मानदंड बनाने का अधिकार नहीं है. सर्वोच्च न्यायालय ने 27 मई को एसआईआर की वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन उसने भी आयोग को कानून से बाहर जाकर नई पात्रता शर्तें तय करने का अधिकार नहीं दिया.
2. जन प्रतिनिधित्व कानून क्या कहता है
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 19 केवल दो शर्तें तय करती है. मतदाता की आयु 18 वर्ष या उससे अधिक हो और वह संबंधित निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी हो.
धारा 20(3) सशस्त्र बलों और अन्य सेवा-योग्यता वाले कर्मियों को विशेष संरक्षण देती है. कानून के अनुसार, उन्हें उस निर्वाचन क्षेत्र का सामान्य निवासी माना जाएगा, जहां वे अपनी सेवा के कारण तैनात न होते.
यानी यदि किसी पूर्व सैनिक या सरकारी अधिकारी का नाम सेवा के दौरान अलग-अलग स्थानों की मतदाता सूची में दर्ज रहा, तो यह पूरी तरह कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है. उसके बेटे या परिवार को बाद में इसी कारण संदेह के घेरे में नहीं लाया जा सकता.
धारा 22 भी स्पष्ट करती है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है. बिना सुनवाई के हटाया गया नाम कानूनन टिक नहीं सकता. मतदाता पंजीकरण नियमों में भी कहीं यह नहीं लिखा है कि 23 वर्ष पुराने पारिवारिक मतदाता रिकॉर्ड प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा.
3.2003 की आधार सूची
निर्वाचन आयोग ने 2025-26 के एसआईआर में 2003 की मतदाता सूची को आधार बनाया है. लेकिन यह केवल प्रशासनिक सत्यापन का तरीका हो सकता है, कानूनी पात्रता का आधार नहीं.
2003 के विशेष पुनरीक्षण में मतदाता अपना ईपीआईसी दिखाकर सत्यापन करा सकते थे. मौजूदा प्रक्रिया में शुरुआत में ईपीआईसी को ही मान्य दस्तावेजों की सूची से बाहर रखा गया था. बाद में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद आयोग को इसे स्वीकार करना पड़ा.
यानी आयोग स्वयं अपनी पुरानी व्यवस्था से अलग रास्ता अपना चुका है. ऐसे में 2008, 2012 या 2018 में वैध प्रक्रिया के तहत मतदाता बने लोगों को आज नए मानदंडों के आधार पर संदिग्ध नहीं माना जा सकता.
4.पैतृक कड़ी की मांग क्यों समस्या है
2003 की मतदाता सूची से पारिवारिक संबंध साबित करने की शर्त कई वर्गों के लिए अनुचित बोझ बन जाती है.
सेवा में रहे सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों के परिवार, अलग-अलग राज्यों में स्थानांतरित हुए नागरिक, विवाह के बाद दूसरे घर गई महिलाएं, अनाथ, गोद लिए गए बच्चे और वे परिवार जिनके पुराने दस्तावेज समय के साथ नष्ट हो चुके हैं—इन सभी के लिए 23 वर्ष पुराने रिकॉर्ड जुटाना बेहद कठिन हो सकता है.
राजस्थान के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को अलग से स्पष्ट करना पड़ा था कि विवाहित महिलाएं अपने मायके के आधार पर लेगेसी कड़ी दिखा सकती हैं, न कि ससुराल के आधार पर. इसके बावजूद कई जगह बीएलओ महिलाओं से पति या ससुर के पुराने मतदाता रिकॉर्ड मांग रहे हैं, जो स्वयं निर्वाचन आयोग के निर्देशों के विपरीत है.
5.एसआईआर और कानून
एसआईआर के तहत निर्वाचन आयोग मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित कर सकता है. वह घर-घर सत्यापन करा सकता है, मृत मतदाताओं, दोहरी प्रविष्टियों या अयोग्य व्यक्तियों के नाम हटा सकता है.
लेकिन आयोग यह मानकर नहीं चल सकता कि जो व्यक्ति 2003 की मतदाता सूची से अपने परिवार का संबंध साबित नहीं कर पा रहा, वह स्वतः संदिग्ध मतदाता है.
ऐसा कोई प्रावधान न संविधान में है, न जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में और न ही मतदाता पंजीकरण नियमों में. किसी मतदाता का नाम हटाने का दायित्व निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी पर है, न कि मतदाता पर अपनी पात्रता बार-बार सिद्ध करने का.
6.मतदाता क्या करें
यदि कोई बीएलओ आपसे 2003 की पारिवारिक मतदाता प्रविष्टि मांगता है तो सहयोग करने से इनकार न करें. अपना एन्यूमरेशन फॉर्म भरें, ईपीआईसी और आधार की प्रतियां दें तथा लिखित रूप में दर्ज करें कि यदि माता-पिता का 2003 का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है तो उसका कारण सेवा, स्थानांतरण या अन्य वैध परिस्थितियां हैं.
31 जुलाई को प्रकाशित होने वाली प्रारूप मतदाता सूची अवश्य जांचें. यदि नाम हटा दिया गया हो तो तुरंत निर्धारित प्रपत्र के माध्यम से दावा या आपत्ति दाखिल करें और यह स्पष्ट करें कि कानून केवल आयु और सामान्य निवास की शर्त रखता है. यदि बिना सुनवाई के नाम हटाया गया है तो मुख्य निर्वाचन अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी और आवश्यकता पड़ने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है.
7.एसआईआर जिस सीमा को पार नहीं कर सकता
2003 के बाद लाखों भारतीय पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत मतदाता बने हैं. उन्होंने वर्षों तक चुनावों में मतदान किया है. केवल इसलिए कि आज वे 23 वर्ष पुराने पारिवारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सकते, उन्हें संदिग्ध मतदाता नहीं माना जा सकता.
पटियाला के इस परिवार की तरह देश में असंख्य परिवार हैं, जिनकी जड़ें एक ही पते पर दशकों से हैं, जिनके पास वैध पहचान पत्र हैं और जिनका मतदाता रिकॉर्ड निर्विवाद है.
ऐसे में 2025 की प्रशासनिक कार्यप्रणाली संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकती. निर्वाचन आयोग के पास व्यापक अधिकार अवश्य हैं, लेकिन वे असीमित नहीं हैं. मतदाता का अधिकार संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम से मिलता है. कोई प्रशासनिक प्रक्रिया उस अधिकार पर ऐसी अतिरिक्त शर्त नहीं लगा सकती, जिसका कानून में कोई आधार ही मौजूद न हो.

