बांग्लादेश ने भारत के फरक्का बांध के ‘नकारात्मक’ प्रभाव को खत्म करने के लिए नई बैराज परियोजना को मंजूरी दी

बांग्लादेश ने बुधवार को पद्मा नदी पर एक मेगा बैराज परियोजना के निर्माण को मंजूरी दे दी है. बांग्लादेश का कहना है कि यह परियोजना ऊपरी प्रवाह में स्थित भारत के फरक्का बांध के "नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने" में मदद करेगी.

‘पीटीआई’ के मुताबिक, यह घटनाक्रम भारत-बांग्लादेश गंगा जल साझाकरण संधि के दिसंबर में समाप्त होने से कुछ महीने पहले आया है. भारत में जिसे गंगा कहा जाता है, उसे बांग्लादेश में पद्मा के नाम से जाना जाता है.

प्रधानमंत्री तारिक रहमान की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आर्थिक परिषद की कार्यकारी समिति ने पद्मा बैराज परियोजना के पहले चरण को मंजूरी दी है, जिसकी अनुमानित लागत 34,497.25 करोड़ टका (लगभग 280 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है.

जल संसाधन मंत्री शाहिदउद्दीन चौधरी एनी ने पत्रकारों को बताया कि इस परियोजना का एक मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश की ओर पानी का संचय करना है ताकि गंगा पर "फरक्का बांध के नकारात्मक प्रभाव को खत्म" किया जा सके. हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत और बांग्लादेश के बीच साझा की जाने वाली 54 नदियों से जुड़े मुद्दे इस परियोजना से संबंधित नहीं हैं.

मंत्री ने कहा कि बैराज का निर्माण बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित में किया जा रहा है और इसके लिए भारत के साथ किसी चर्चा की आवश्यकता नहीं है. उन्होंने कहा, “पद्मा बैराज बांग्लादेश के अपने हित का मामला है और इस मुद्दे पर भारत के साथ किसी भी चर्चा की जरूरत नहीं है.”

हालांकि, एनी ने कहा कि गंगा जल पर भारत के साथ चर्चा जारी है.  उन्होंने कहा, "गंगा के संबंध में बातचीत आवश्यक है और वह चल रही है."

भारत ने 1975 में पश्चिम बंगाल में 2,240 मीटर लंबे फरक्का बैराज को चालू किया था ताकि गंगा के पानी को हुगली नदी की ओर मोड़कर तलछट को हटाया जा सके और कोलकाता बंदरगाह की नौगम्यता (जलयान के आवागमन) को बनाए रखा जा सके.

बांग्लादेश में फरक्का का मुद्दा लंबे समय से एक संवेदनशील विषय रहा है. वहां की सरकारों और विशेषज्ञों का आरोप रहा है कि शुष्क मौसम में पानी के कम बहाव के कारण खारेपन की समस्या, नदियों का क्षरण और कृषि एवं पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है.

वहीं, भारत का लगातार यह रुख रहा है कि फरक्का बैराज मुख्य रूप से कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए बनाया गया था और जल-साझाकरण के मुद्दों को द्विपक्षीय तंत्र और समझौतों (जैसे 1996 की गंगा जल संधि) के माध्यम से सुलझाया गया है.

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