भाजपा के केंद्रीय मंत्री के बेटे को पॉक्सो केस में क्यों गिरफ़्तार नहीं कर रही रेवंता सरकार?
बांदी संजय कुमार का बेटा, नाबालिग़ लड़की और सिस्टम की खामोशी
हैदराबाद की एक नाबालिग़ लड़की. उम्र 17 साल. और एक ऐसा आरोपी जिसके पिता देश के गृह मंत्रालय में राज्यमंत्री हैं. यह सिर्फ़ एक पॉक्सो केस नहीं है. यह उस पूरे तंत्र का आईना है जो तब अपनी आँखें मूँद लेता है जब आरोपी के पीछे राजनीतिक ताक़त खड़ी हो. यह रिपोर्ट साउथ फर्स्ट और स्वतंत्र पत्रकार रेवती (@revathitweets) की ज़मीनी दस्तावेज़ों पर आधारित है.
8 मई 2026 की रात तक़रीबन 10 बजे, हैदराबाद के पेट बशीराबाद पुलिस स्टेशन में एक माँ ने अपनी बेटी के साथ हुए ज़ुल्म की शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में आरोप था कि 25 साल के बंदी साई भगीरथ — जो केंद्रीय गृह राज्यमंत्री बंदी संजय कुमार के बेटे हैं — ने जून 2025 से नाबालिग़ लड़की को भावनात्मक रूप से फँसाया, शादी का झाँसा दिया, उसे परिवार और दोस्तों से अलग-थलग किया और हैदराबाद के बाहरी इलाक़ों में स्थित फ़ार्महाउसों और अपार्टमेंट्स में बार-बार उसके साथ यौन उत्पीड़न किया.
शिकायत की भाषा साफ़ थी — "ग्रूमिंग, इमोशनल मैनीपुलेशन और सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन का सुनियोजित सिलसिला." अदालत को सौंपे गए दस्तावेज़ों में पुलिस इंस्पेक्टर के. विजयवर्धन ने बताया कि माँ की चार पेज लंबी शिकायत में उन तमाम जगहों के नाम दर्ज हैं जहाँ कथित उत्पीड़न हुआ. पीड़िता की तरफ़ से सबूत के तौर पर जमा की गई चैट्स में कथित तौर पर आरोपी ने खुद स्वीकार किया कि वो उसे "टॉर्चर" कर रहा था.
एफ.आई.आर. से लेकर भागने तक — पाँच दिनों की कहानी
जिस रात एफ.आई.आर. दर्ज हुई, उसी रात आरोपी भगीरथ का फ़ोन बंद हो गया. पुलिस ने कहा वो "अनट्रेसेबल" है. पॉक्सो क़ानून के तहत ऐसे मामलों में त्वरित गिरफ़्तारी की अपेक्षा होती है, मगर यहाँ पुलिस ने पहले तीन दिन यह कहते हुए बिता दिए कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हैदराबाद दौरे में "व्यस्त" थी. इस दौरान आरोपी के ख़िलाफ़ कोई ठोस क़दम नहीं उठाया गया.
इसी बीच एक और एफ.आई.आर. दर्ज हुई — इस बार पीड़िता और उसके परिवार के ख़िलाफ़. आरोप था "हनी-ट्रैप और ब्लैकमेल" का. तेलंगाना के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक "चिट-चैट" कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाया. उन्होंने बंदी संजय को अपना "बेस्ट फ्रेंड" बताया. एक कांग्रेस मंत्री पोनम प्रभाकर ने तो यह सुझाया कि "मुन्नुरू कापू" समुदाय के नेता मामले का "सेटलमेंट" करवाएँ — यानी आरोपी की पीड़िता से शादी. यौन उत्पीड़न के एक गंभीर मुक़दमे में "समझौते" की बात ने देशभर में गहरा आक्रोश पैदा किया.
12 मई को पुलिस ने पीड़िता का अतिरिक्त बयान दर्ज किया और मामले की धाराएँ बदल दीं. शुरुआत में एफ.आई.आर. भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 और 75 तथा पॉक्सो की धारा 11 सहपठित 12 के तहत दर्ज की गई थी. अब इसमें पॉक्सो की धारा 5(ल) सहपठित धारा 6 जोड़ी गईं — यानी "नाबालिग़ पर एग्रेवेटेड पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट" — जिसमें न्यूनतम 20 साल की सज़ा का प्रावधान है और अधिकतम आजीवन कारावास. इसी दिन एक एस.आई.टी. (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम) भी गठित की गई — जो एक सामान्य पॉक्सो मामले में असाधारण क़दम माना जाता है — और आरोपी को 13 मई दोपहर 2 बजे तक पेश होने का नोटिस दिया गया. नोटिस उसके मामा, करीमनगर के डॉक्टर सी.एच. वमशी कृष्ण के ज़रिए तामील की गई.
13 मई को भगीरथ नहीं आया. उसने पेट बशीराबाद थाने के एस.एच.ओ. को एक पत्र भेजा जिसमें दो दिन और माँगे. पत्र में लिखा — "मुझे बेहद कम समय दिया गया है और एक पर्सनल इनकन्वीनिएंस है. मैं जाँच में सहयोग देना चाहता हूँ, मगर रेलेवेंट दस्तावेज़ जुटाने के लिए दो दिन चाहिए ताकि मैं जाँच में सार्थक मदद कर सकूँ." पत्र में उसने शिकायत को "झूठे आरोप" भी बताया. उधर उसकी एंटिसिपेटरी बेल पिटीशन तेलंगाना हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने पेश की गई, जिसकी सुनवाई 14 मई को होनी थी.
पिता का जवाब — सियासी ढाल और धार्मिक चादर
12 मई को हनुमान जयंती के मौक़े पर बंदी संजय कुमार एक "हिंदू एकता रैली" में आए. स्वामीजियों और भगवा झंडों से घिरे मंच पर खड़े होकर उन्होंने इस मामले की तुलना लंका दहन से की. उन्होंने कहा कि जिस तरह हनुमान ने लंका जलाई, वो भी अपने दुश्मनों को जलाकर रख देंगे. उन्होंने खुद को और अपने बेटे को राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार बताया — बिना यह स्पष्ट किए कि उनका बेटा जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहा.
बी.जे.पी. में अंदरूनी बेचैनी
साउथ फर्स्ट के वरिष्ठ पत्रकार जी.एस. वासु की रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना बी.जे.पी. के सात सांसदों (बंदी संजय को छोड़कर) और सात विधायकों में से किसी ने भी संजय के बचाव में एक शब्द नहीं कहा. कुछ नेता खामोशी से यह देख रहे थे कि संजय किस तरह खुद अपना नुक़सान कर रहे हैं, जबकि कुछ को पार्टी की दीर्घकालिक छवि की चिंता सताने लगी.
एक वरिष्ठ बी.जे.पी. नेता ने बेबाकी से कहा — "संजय ने ख़ुद ही इसे एक फेत अकोम्पली बना दिया है. जब कोई ख़ुद को फाँसी देना चाहे तो उसे कौन बचा सकता है?"
एक दूसरे नेता ने तर्क दिया — "जब दोनों पक्षों ने ख़ुद माना कि उनके बीच कोई रिश्ता था, तो कोई मुक़दमा कैसे गढ़ा जा सकता है? और जब पुलिस ने तमाम रेकॉर्ड्स की जाँच के बाद पॉक्सो में केस दर्ज किया, तो किस बात को 'झूठ' बताया जा रहा है?"
आर.एस.एस. पृष्ठभूमि के एक वरिष्ठ बी.जे.पी. पदाधिकारी ने संजय की भाषा पर भी सख़्त ऐतराज़ जताया. उन्होंने कहा — "यह वो संस्कृति नहीं जिसे संघ कभी प्रोत्साहित करता है. यह तो संघ को स्वीकार्य ही नहीं है."
बी.जे.पी. के तेलंगाना प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र राव ने कहा कि पार्टी या संजय को उनके बेटे के आचरण के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराना चाहिए — मगर इस पर भी पार्टी में नाराज़गी थी. नेताओं का कहना था कि उन्हें बस इतना कहना था कि "क़ानून अपना काम करेगा." कई नेताओं ने यह भी पूछा कि जब बेटा बेगुनाह है, तो फिर वो छुप क्यों रहा है — "से कम से कम अदालत उसे पुलिस के सामने पेश होने का निर्देश देती. वो उस निर्देश का इंतज़ार क्यों कर रहा है?"
सोशल मीडिया, धमकियाँ और पीड़िता की पहचान का उल्लंघन
13 मई को हैदराबाद में "बंदी भगीरथ मिसिंग" के पोस्टर लग गए. पुलिस स्टेशन के बाहर महिला संगठनों का प्रदर्शन हुआ जिसे लाठीचार्ज से तितर-बितर किया गया. सोशल मीडिया पर संजय के समर्थकों और कुछ पत्रकारों ने पीड़िता की "दो जन्मतिथियों" का मुद्दा उठाया — एक 2008, एक 2010. साउथ फर्स्ट की रिपोर्ट में साफ़ कहा गया कि दोनों में से किसी भी साल के हिसाब से वो अभी भी नाबालिग़ है, और उम्र तय करना अदालत का नहीं बल्कि पुलिस का काम है — जो वो कर चुकी है.
इससे भी गंभीर यह है कि पीड़िता की पहचान, तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल की गईं — जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है. पीड़िता के परिवार को धमकियाँ मिल रही हैं. मुख्यधारा का तेलुगू मीडिया इस मामले पर बड़े पैमाने पर खामोश रहा या काउंटर-नैरेटिव को आगे बढ़ाता रहा.
इस पूरे मामले में जब मेनस्ट्रीम मीडिया चुप रहा, तब स्वतंत्र पत्रकार रेवती (@revathitweets) ने अपने ट्विटर थ्रेड के ज़रिए पूरे घटनाक्रम को दस्तावेज़ीकृत किया. पुलिस की वीडियो, रैली की क्लिप्स, शिकायत की डिटेल्स, और टाइमलाइन — सब कुछ उनके ट्वीट्स में दर्ज है. यही सार्वजनिक दबाव था जिसने पुलिस को धाराएँ अपग्रेड करने और एस.आई.टी. गठित करने पर मजबूर किया.
भगीरथ पहले भी विवादों में रहा है. वो कॉलेज ड्रॉपआउट है और पहले असॉल्ट के आरोप में रस्टिकेट भी हो चुका है. कर्नाटक में जे.डी.(एस.) के एम.पी. प्रज्वल रेवन्ना के बलात्कार मामले में त्वरित कार्रवाई हुई और उन्हें आजीवन कारावास मिला. यहाँ भगीरथ अभी भी आज़ाद है.
बंदी साई भगीरथ एस.आई.टी. के सामने पेश नहीं हुआ. उसकी एंटिसिपेटरी बेल पिटीशन तेलंगाना हाई कोर्ट की वेकेशन बेंच के सामने 14 मई को सुनवाई के लिए लंबित थी. पीड़िता का परिवार धमकियों और पब्लिक विलिफिकेशन झेल रहा है. बंदी संजय कुमार केंद्रीय मंत्री बने हुए हैं. और पॉक्सो — जो इसीलिए बना था कि ताक़तवर लोग भी बच न सकें — एक बार फिर ताक़त के सामने घुटने टेकता दिख रहा है.
सवाल सीधे हैं — तेलंगाना पुलिस, डी.जी.पी., सी.एम. रेवंत रेड्डी और बी.जे.पी. नेतृत्व से: क़ानून कब सबके लिए बराबर होगा? एक नाबालिग़ को न्याय कब मिलेगा जब उसके ज़ख्मों को राजनीतिक चारे में बदल दिया गया हो?

