सिर्फ पानी नहीं, अपना स्वास्थ्य भी ढो रही हैं महाराष्ट्र की आदिवासी महिलाएं
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले की पहाड़ियों में बसे आदिवासी गांवों की महिलाओं के लिए पानी लाना केवल एक घरेलू जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि एक ऐसा श्रम है जो धीरे-धीरे उनके शरीर को तोड़ रहा है. हर दिन कई किलोमीटर पैदल चलकर सिर पर भारी मटके ढोने वाली महिलाएं अब गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं. डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि पानी की यह पुरानी समस्या अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी है.
नंदुरबार जिले के अक्कलकुवा और धड़गांव तहसीलों के दर्जनों आदिवासी पाड़ों में गर्मियों के दौरान पानी की उपलब्धता बेहद सीमित हो जाती है. वडवी पाड़ा की महिलाएं हर दिन दोपहर की भीषण गर्मी में खाली बर्तन लेकर पहाड़ी से नीचे उतरती हैं. निकटतम जलस्रोत लगभग तीन किलोमीटर दूर है. वहां पहुंचने के बाद भी उन्हें तुरंत पानी नहीं मिलता. जमीन में बने छोटे प्राकृतिक गड्ढों में धीरे-धीरे रिसकर आने वाले पानी का इंतजार करना पड़ता है. कुछ बर्तन भरने के बाद पानी खत्म हो जाता है और फिर महिलाओं को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है.
इसके बाद सात से दस किलोग्राम पानी सिर पर रखकर खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए घर लौटना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. कई गांवों में महिलाएं दिन में एक से अधिक बार यह यात्रा करती हैं. कुछ स्थानों पर उन्हें सुबह तीन बजे अंधेरे में टॉर्च और लालटेन लेकर पानी भरने निकलना पड़ता है.
इस कठिन श्रम का असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर साफ दिखाई दे रहा है. 40 वर्षीय बाजूबाई धोमा वडवी बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें पानी ढोना पड़ता था. जैसे-जैसे उनकी उम्र बढ़ी, उनके सिर पर रखे जाने वाले बर्तनों का आकार और वजन भी बढ़ता गया. बारह वर्ष की आयु तक वे अपनी मां के बराबर बोझ उठाने लगी थीं.
कम उम्र में विवाह और लगातार गर्भधारण के बीच भी उन्हें पानी लाने का काम जारी रखना पड़ा. बाजूबाई बताती हैं कि अपनी पहली गर्भावस्था के दौरान नौवें महीने तक पानी ढोते रहने के बीच उनका गर्भपात हो गया था. इसके बावजूद परिवार की जरूरतों के कारण उन्हें काम जारी रखना पड़ा. बाद के वर्षों में उन्हें गर्भाशय के बाहर निकल आने की समस्या का सामना करना पड़ा और अंततः सर्जरी करवानी पड़ी.
बाजूबाई अकेली नहीं हैं. क्षेत्र के 20 से अधिक गांवों में महिलाओं ने लगातार पेट दर्द, कमर दर्द, गर्भाशय के खिसकने, बार-बार होने वाले संक्रमण, सफेद पानी की समस्या, गर्भपात, किडनी स्टोन और अन्य स्त्री रोग संबंधी परेशानियों की शिकायत की है. कई महिलाओं का मानना है कि वर्षों तक भारी पानी ढोने से उनके शरीर पर यह असर पड़ा है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी इस संबंध को गंभीरता से देखते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि कम उम्र से शुरू होने वाला कठिन शारीरिक श्रम, बार-बार गर्भधारण, कुपोषण, एनीमिया, खराब मासिक धर्म स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच मिलकर महिलाओं को गर्भाशय के बाहर निकल आने जैसी गंभीर समस्याओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं. गर्भावस्था के दौरान भी भारी श्रम करने और प्रसव के तुरंत बाद काम पर लौटने से यह जोखिम और बढ़ जाता है.
समस्या केवल पानी ढोने तक सीमित नहीं है. कई गांवों में महिलाएं मासिक धर्म के दौरान भी पशुओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले ठहरे हुए जलस्रोतों में स्नान और कपड़े धोने को मजबूर हैं. इससे संक्रमण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.
दूर-दराज के इन इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चुनौतीपूर्ण है. अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र कई किलोमीटर दूर हैं. ऐसे में बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वैद्यों और पुजारियों पर निर्भर रहते हैं. स्थानीय जड़ी-बूटियों से उपचार की परंपरा आज भी जारी है, लेकिन गंभीर स्त्री रोग संबंधी समस्याओं का समुचित इलाज अक्सर नहीं हो पाता.
आशा कार्यकर्ता फुलवंती सुधनयन वडवी बताती हैं कि सैकड़ों महिलाओं के बीच काम करने के बावजूद बहुत कम महिलाएं इलाज के लिए आगे आती हैं. अधिकांश महिलाएं दर्द को अपनी नियति मानकर उसके साथ जीना सीख लेती हैं. यही कारण है कि वास्तविक स्वास्थ्य संकट सरकारी आंकड़ों में पूरी तरह दिखाई नहीं देता.
जिला स्वास्थ्य विभाग के अनुसार अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के बीच 25 से 45 वर्ष आयु वर्ग की 20 महिलाओं में गर्भाशय के बाहर निकल आने के मामले दर्ज किए गए. पिछले छह वर्षों में ऐसे लगभग 160 मामलों का इलाज सरकारी अस्पतालों में किया गया है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है.
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस संकट का स्थायी समाधान केवल इलाज नहीं, बल्कि पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है. छोटे चेक डैम, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलस्रोतों के संरक्षण जैसी योजनाओं की मांग लंबे समय से की जा रही है.
जिला प्रशासन ने भूजल मानचित्रण, जल संरक्षण और स्रोत पुनर्जीवन जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं. नर्मदा आधारित पेयजल और सिंचाई परियोजना पर भी काम चल रहा है, जिसके तहत सैकड़ों पाड़ों तक पानी पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है. सरकार का दावा है कि इन प्रयासों से आने वाले वर्षों में स्थिति में सुधार होगा.
लेकिन फिलहाल नंदुरबार की पहाड़ियों में रहने वाली हजारों महिलाएं हर दिन पानी के साथ अपने शरीर पर बढ़ते दर्द का बोझ भी ढो रही हैं. उनकी कहानी यह याद दिलाती है कि पानी का संकट केवल संसाधनों की कमी का सवाल नहीं है, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा एक गंभीर सामाजिक और सार्वजनिक स्वास्थ्य मुद्दा भी है.

