यूरोप में प्रतिबंधित, भारत में निगरानी का हथियार. कैसे हजारों कैमरों से चेहरों की पहचान कर रही है स्पेन की कंपनी

सिटी" प्रोजेक्ट और रेलवे स्टेशन आधुनिकीकरण परियोजनाओं में भी किया जा रहा है. हालांकि संबंधित सरकारी एजेंसियों ने इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी.

कंपनी ने भारत में अपनी तकनीक के इस्तेमाल की पुष्टि की है, लेकिन यह कहकर ग्राहकों की जानकारी साझा करने से इनकार कर दिया कि यह गोपनीय है. कंपनी का कहना है कि उसके उत्पाद यूरोपीय डेटा सुरक्षा सिद्धांतों के अनुरूप विकसित किए जाते हैं, लेकिन सार्वजनिक संस्थाएं उनका उपयोग कैसे करती हैं, इस पर उसका नियंत्रण नहीं होता.

रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि जिन दो परियोजनाओं में इस तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. पूर्वी रेलवे की निगरानी व्यवस्था और अहमदाबाद का सेफ सिटी प्रोजेक्ट उन्हें यूरोपीय संघ में लागू करना संभवतः गैरकानूनी माना जाता. यूरोपीय संघ का एआई एक्ट 2025 से सार्वजनिक स्थानों पर कानून-व्यवस्था के लिए रियल टाइम फेशियल रिकग्निशन के उपयोग पर लगभग पूर्ण प्रतिबंध लगाता है.

ईयू कानून केवल तीन विशेष परिस्थितियों में इसकी अनुमति देता है. इनमें मानव तस्करी या अपहरण के पीड़ितों की तलाश, आसन्न आतंकवादी खतरे को रोकना और हत्या, बलात्कार या आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों के संदिग्धों की पहचान शामिल है. इसके लिए भी हर मामले में पहले न्यायिक अनुमति और विस्तृत निगरानी प्रक्रिया अनिवार्य है.

इसके विपरीत भारत में ऐसा कोई व्यापक कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है. डिजिटल अधिकार संगठन ‘इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन’ के संस्थापक अपार गुप्ता के अनुसार भारत दुनिया के उन देशों में है जहां फेशियल रिकग्निशन तकनीक का उपयोग बड़े पैमाने पर हो रहा है, लेकिन उसके लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और जवाबदेही की व्यवस्था नहीं है.

रिपोर्ट यह भी सवाल उठाती है कि ये कैमरे आखिर किस डेटाबेस से जुड़े हैं. भारत में गृह मंत्रालय अपराध संबंधी डेटाबेस संचालित करता है, जबकि आधार और चुनाव आयोग जैसे संस्थानों के पास भी करोड़ों नागरिकों की तस्वीरों वाले डेटाबेस मौजूद हैं. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम किन डेटाबेस का उपयोग करते हैं और किसी नागरिक के पास गलत पहचान या निगरानी को चुनौती देने का क्या अधिकार है.

इस तकनीक के विस्तार का एक बड़ा हिस्सा निर्भया फंड से जुड़ा बताया गया है. 2012 के दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाए गए इस फंड का उद्देश्य पीड़ित सहायता, कानूनी मदद और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना था. लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार मार्च 2025 तक वितरित लगभग 5,800 करोड़ रुपये में से करीब आधी राशि निगरानी और पुलिसिंग से जुड़ी परियोजनाओं पर खर्च हुई, जबकि लगभग 31 प्रतिशत धनराशि सीधे पीड़ित सहायता और हेल्पलाइन सेवाओं पर लगी.

महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर निगरानी व्यवस्था का विस्तार तो हुआ, लेकिन इससे महिलाओं के खिलाफ अपराधों में उल्लेखनीय कमी के प्रमाण नहीं मिले. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2014 में महिलाओं के खिलाफ लगभग 3.4 लाख अपराध दर्ज हुए थे, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 4.5 लाख हो गए.

मुंबई की वरिष्ठ वकील फ्लाविया एग्नेस का कहना है कि महिलाओं के खिलाफ अधिकांश अपराध सार्वजनिक स्थानों पर नहीं बल्कि परिचित लोगों द्वारा घरों या निजी स्थानों पर किए जाते हैं. ऐसे में रेलवे स्टेशन या सार्वजनिक स्थानों पर लगे कैमरे इस समस्या का सीमित समाधान ही दे सकते हैं.

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि हर्टा सिक्योरिटी को पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय संघ से 30 लाख यूरो से अधिक का शोध अनुदान मिला. इन परियोजनाओं का उद्देश्य भीड़ के व्यवहार का विश्लेषण और संभावित खतरों की पहचान करने वाली तकनीक विकसित करना था. आलोचकों का कहना है कि जिस प्रकार की तकनीक को यूरोप ने अपने नागरिकों के लिए अत्यधिक जोखिमपूर्ण मानते हुए सीमित कर दिया, वही तकनीक अब दूसरे देशों में निर्यात की जा रही है.

यूरोपीय संसद के सदस्य ब्रांडो बेनिफेई ने इसे "दोहरा मापदंड" बताया है. उनका कहना है कि यदि कोई तकनीक यूरोप के नागरिकों के लिए अस्वीकार्य है तो उसे दूसरे देशों में निर्यात करने की अनुमति भी नहीं दी जानी चाहिए.

यह पड़ताल भारत में तेजी से फैल रही निगरानी व्यवस्था, निजता के अधिकार और तकनीक के नियमन पर गंभीर सवाल खड़े करती है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे नागरिक स्वतंत्रता, गोपनीयता और सरकारी जवाबदेही को लेकर बहस भी तेज होगी.

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